नई क़लम - उभरते हस्ताक्षर
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अरुण 'अद्भुत'
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अरुण 'अद्भुत'
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Monday, August 24, 2009
माटी मेरे देश की
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शत्रुओं को सदा मुँहतोड़ देती है जवाब किन्तु मित्र की है मित्र माटी मेरे देश की भारत की रक्षा करें मौत से कभी न डरें ऐसे देती है चरित्र...
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Friday, April 3, 2009
तुम्हारी याद आती है
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अभी झंकार उस पल की ह्रदय में गुनगुनाती है यही सच है मुझे अब भी तुम्हारी याद आती है नहाई हैं मधुर सी गंध के झरने में वो बातें तुम्हारे प...
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Saturday, March 14, 2009
जो सींच गए खूं से धरती
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नई कलम का प्रयास लगातार दिन -ब - दिन सफल हो रहा है। उभरते हस्ताक्षर , अपने हस्ताक्षर दर्ज करा रहा है और अपनी आत्मा की आवाज़ को ज़माने के साम...
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