Tuesday, November 1, 2016

गिरीश पंकज - जन्मदिन पर आदरांजली


गिरीश पंकज से मिलना आैर गिरीश पंकज काे पढ़ना ये दाे अलग अलग बात नही है, जैसा निर्मल इनका लेखन है उतना ही स्वच्छ इनका व्यक्तित्व है | जिस स्वरूप का, जिस संबंध का, जिस तेवर का, जिस शैली का, जिस काैशल का, जिस विचारात्मकता का लेखन गिरीश पंकज कर रहे हैं उसे पढना शाैक की सीमा से निकल कर आवश्यक आवश्यकता की हद मे शुमार हाे गया है | गिरीश पंकज काे पढ़ना स्वयं काे अपड़ेट करना है | गिरीश निरंतर लिखने वाले लेखक है, इनके पास व्यापकता आैर विविधता की असीमितता है | मंटाे, राही मासूम रज़ा, परसाई की तरह गिरीश भी सिर्फ इसलिसे नही लिखते क्याेकि वे लेखक है बल्कि इसलिये लिखते है कि इस तरह का लेखन समाज के प्रति उनकी नैतिक ज़िम्मेदारी है | गिरीश जी पञकार है, व्यंग्यकार है, गीतकार है, उपन्यासकार है, समीक्षक है, आलोचक है, कवि है, सम्पादक है...... इनका लेखन क्षेञ विविध है, विस्तृत है, किसी एक विधा का रचनाकार कहना इन्हें कम कर के आंकना हाेगा | यह समय गिरीश पंकज के मूल्यांकन करने का सही समय है ,उनसठ वर्ष की आयु मे प्रकाशित पुस्तकों की संख्या पचास हाेना आैर इसके अतिरिक्त फुटकर लेखन की संख्या तीन अंकाे मे हाेना आैर समूचा लेखन सुधारवादी हाेना, जनवादी हाेना, समाज , घर्म ,राजनीति, प्रशासन आैर बाजार मे फैल चुकी गंदगी काे साफ़ करना, खराबियाे की खबर लेना, आम आदमी के पक्ष मे खड़े हाे जाने वाला लेखन है | माैजूदा हालात की पड़ताल करता लेखन केवल अवरोध पैदा करने वाला लेखन नही है वरन ऩई राह तलाशने वाला लेखन है | गिरीश पंकज का लिखा बाजार मे बिकता ज़रूर है लेकिन ये बिक कर नही लिखते , लिखना इनका मिशन है उघाेग नही |
गिरीश जी के लेखन मे क्रोध भी कलात्मकता के साथ है. नाराज़गी भी लय मे है, चीख भी सुर मे है, विरोध मे भी पूरी शालीनता समाहित है , लेखन मे तन्मयता है | इनके व्यंग्य मे विस्फोट है लेकिन अनुशासित शब्दावली के साथ , विचाराे की अभिव्यक्ति प्रभावशाली रूप मे है लेकिन संयम के साथ | गिरीश पंकज के लेखन मे माैकापरस्त और फिरकापरस्त लाेगाे काे ललकार है ताे अच्छे लाेगाे का सत्कार और पारखी लाेगाे के लिये चमत्कार भी है |अदभुद कलम है इनकी जिससे नाराज़गी भी मुस्कान के साथ ज़ाहिर हाेती है | इस बात की खाेज की जानी चाहिये कि गिरीश लिखने के पहले कलम काे किस चाशनी मे ड़ुबाेते है ?
गिरीश पंकज का समूचा लेखन विकृतियाे के खिलाफ आम आदमी के पक्ष मे लिखा गया दस्तावेज है |
अखतर अली
आमानाका
कांच गोदाम के पास,
रायपुर ( छत्तीसगढ़ ) 492001
माे. न. 9826126781

Monday, October 31, 2016

आजा चल दीवाली मना ले

आजा चल दीवाली मना ले


हुआ जो अस्त कामनाओं का सूरज
दीप जूनून के फिर जला ले
काली रात से खौफ न खा तू
आजा चल दीवाली मना ले


आस विश्वास मूरत लक्ष्मी गणेश की
शीश इनके आगे तू झुका ले
रख वाग्देवी को मस्तिष्क में
खील खुशियों के अब बिखराले
आजा चल दीवाली मना ले


जोड़ मेहनतों के तिनके तू
ऊँची लक्ष्य हटरी बना ले
भर हसरतों के चंडोल दिल में
हृदय का दीवट यूँ सजा ले
आजा चल दीवाली मना ले


कर आह्वान प्रेम लक्ष्मी का
स्नेह आतिश जी भर छुडा ले
दूर कर तम वैर भाव का
भाई दूजों को गले लगा ले
आजा चल दीवाली मना ले


साहित्यकार सपना मांगलिक
ईमेल –sapna8manglik@gmail.com

Wednesday, October 19, 2016

क्या सच में प्यार जिंदा है ??


आज करवाचौथ का त्योहार देश भर में धूम धाम से मनाया जा रहा है सभी शादी - शुदा औरतें अपने पतियों के लिए निर्जल उपवास रखती हैं साथ में उनकी लम्बी उम्र की कामना करती हैं, उनके हाथ से पानी पी के व्रत खोलती हैं पति भी प्रसन्न हो के उन्हें विशेष तोहफे देते हैं. लाल लिबास में लिपटी दुल्हन की तरह तैयार हो के महिलायें फिर से अपने उन पुराने दिनों की याद में खो जाती हैं जब वो अपने राजकुमार समान पति का सपना युवा अवस्था में देखती थीं. पर सवाल ये है कि क्या वाक़ई प्यार जिन्दा है ? या ये सब महज एक ढोंग है , भ्रम है, दिखावा है. रोज की ज़िन्दगी में ये सब तो नहीं होता, वहां एक प्रेम करने वाला पति नहीं होता , पत्नी को उसके कर्तव्यों के तले दबाने वाला पति ही होता है. तुम ये क्यूँ पहने हो ? , वहां क्यूँ बैठी , सर पे पल्ला रखो , पैर छुओ और न जाने क्या – क्या ...............
क्यूँ आखिर क्यूँ , एक औरत खुद खाना बनाती है पर सबसे आख़िर में खाती है, रोज सुबह सबसे जल्दी उठती है और रात में काम करके सबसे आखिर में सोती है. यहाँ तक की उसे कपड़े पहनने के तौर तरीके भी ससुराल वाले सिखाते हैं. वो रोज घुट – घुट के जीती है फिर भी मुस्कुराती है. वो उस झिड़क को भी प्रेम समझती है और रम जाती है.
तब आज करवा चौथ के दिन ये प्यार जिन्दा है ? या फिर किसी समाज के कुरीति में लिपटी सुबह से भूखी , प्यासी औरत एक और झिड़क में खुद को खुश रखने झूटी तसल्ली दे रही है. 

- Shikha Pari 

Tuesday, October 18, 2016

दिल को छू जाने वाली कहानी सौम्या मिश्रा

आज एकाएक किसी की याद आई और मेरी आँखे भर आई।मेरी ये पुरानी याद और दिल के भाव है, जिसे आज शब्द देकर पटल पर प्रस्तुत कर रही हूँ।


कालेज के दिनों के बाद है जब मैं कंटीन में लंच के वक़्त जाया करती थी । वैसे तो वहां बहुत से कर्मचारी थे, लेकिन एक लड़का करीब 13 साल का जिसका नाम अजय वह भी काम किया करता था।
अजय मेरे पास रोज आता था बोलता दीदी नमस्ते और कैसी है, आप । मैं बोलती ठीक हूँ भैया।
थोड़ी देर चुप रहने के बाद वो एकाएक बोलता दीदी कुछ रूपये होंगे मैं शांत होकर कुछ सोचती फिर बोलती तुम पैसे का क्या करोगे यहाँ काम करते हो उसका पैसा तो मिलता होगा ।
अजय बोलता है हाँ मिलता हैं न 600 रूपया लेकिन पूरा पैसा मम्मी की बीमारी में लग जाता है, मेरी मम्मी बहुत बीमार रहती हैं।मैंने पूछा अच्छा और तुम्हारे पापा वो । तब अजय बोलता की मम्मी बोलती है की जब मैं छोटा था तो वो कहीं चले गए।
फिर मैंने पूछा की जो पैसा मैं देती हूँ उसका क्या करते हो? तो वो बोला को मैं पढाई करता हूँ और जो खर्च आता इस में से ही खर्च कर लेता ।
मैंने कहा की तुम दिन भर यहीं रहते तो पढाई कब करते हो क्योँकि स्कूल तो जाते नही, तो वो बोला मेरे स्कूल के सर बहुत अच्छे है उनकी सब बताया तो उन्हीने कहा की ठीक है शाम को मेरे घर आकर पढ़ लिया करो सो मैं घर जाकर सीधे सर के घर पढ़ने चला जाता हूँ।
मेरा लंच का समय समाप्त हो गया था मैंने अपना बैग उठाया और क्लास की और चल दी,पीछे से अजय आवाज देता दीदी पैसे नही दिए मैंने बैग की चैन खोली 7 रूपये थे उसको दे दिया उसने खुश होते हुए थैंक यू बोला और अपने काम पर लग गया, मैं भी क्लास की ओर चली आई।
तीन चार महीने गुजर गए थे मैं कैंटीन की तरफ से गुजरी वहां अपनी बोतल में पानी भर रही थी मैंने अजय को देखा आवाज लगाई । वह कुछ नही बोला, मैंने कहा क्या हुआ अजय तुम आज कुछ नही बोले तबियत वगैरह ठीक है, लेकिन उसने कुछ जवाब नही दिया ।
मुझे क्लास के लिए देरी हो रही थी और एग्जाम की वजह से कॉलेज बन्द भी होने वाला था तो मैंने बैग से 100 रुपये निकाले और उसे देने लगी, लेकिन अजय ने वो रुपये नही लिए और रोने लगा बोला दीदी अब कोई जरूरत नही क्योँकि पूरे महीने के पैसे बच जाते मेरी मम्मी मर गयी मैं बिलकुल अकेला हो गया।
अब कोई जरूरत नही।
उसको रोता देख मेरी आँखों में आँसू आ गए। मैंने अजय से कुछ भी नही पूछा और वापस क्लास चली आई।
मेरा कॉलेज भी छूट गया, लेकिन आज भी जब अजय के बारे में सोचती हूँ तो बहुत तकलीफ होती है । एक सवाल बार बार आता है मेरे जहन में की पता नही अब वो कैसा होगा? कहाँ होगा?


सौम्या मिश्रा

मोस्ट पावरफुल परसन ही क्यूँ न बन जाऊं

मैं एक "मोस्ट पावरफुल परसन" ही क्यूँ न बन जाऊं पर हूँ तो आखिर मैं एक लड़की . एक लड़की होने का भार ही बहुत होता है . सौ पत्थर कलेजे पर माँ – बाप के रख दिए जाते हैं तब एक लड़की पैदा होती है , पत्थर से भारी सीना फिर बोझ तले लड़की दबकर इतनी दब जाती है कि बेचारी पहले से ही बोझिल हो जाती है , क्या प्रेम , क्या विश्वास ये सब तो उसको नसीब से मिलता है कहीं गर्भ में ही मार दी जाती है , अगर गलती से जन्म ले भी लिया तो दुनिया में लाकर मार दी जाती है. लाख कोशिशें करले वो खुल के जी नहीं पाती . घुट – घुट कर अन्दर ही अन्दर मर जाती है या मार दी जाती है .


तो क्यूँ पैदा ही करो गर्भ में ही मार देना उनको सही होता है दुनिया में आने ही न दो कम से कम वो गर्भ में तो खुल के साँस ले पायेंगी थोड़ी ही देर सही अंतिम सांस लेने से पहले.   

Thursday, October 13, 2016

सपना के दोहे



1
लो टूट प्रेम के गए,सुन्दर थे जो कांच।
आज दिलों पर कर रही,नफरत नंगा नाच।।

2
प्रेम धागा तोड़ चला,बाँधा हमसे बैर।
समझे जिसको अपना हम,हुआ आज वो गैर।।

3
दूर गया कोई नहीं, सब हैं रहते पास।
मन को फिर क्या सालता, हरपल रहे उदास।।

4
हैरान हूँ मैं देखकर,झूठ के ठाठ-बाट।
तिकड़मबाजी का चलन,सच है बिकता हाट।।

5
देत अल्लाह बांग तू,काम करे जल्लाद।
बेटा झगडे बाप ते,होवे खुद बर्बाद।।

6
हाथ थाम आतंक का,करते फिरें विनाश।
पेशावर जैसी भले,बिछती जाएँ लाश।।

7
अशिक्षा नर्क समान है, काहे करती खेद।
ज्ञान दीप जलाकर तुम,अन्धकार दो भेद।।



सपना मांगलिक
फ659 कमला नगर
आगरा 
sapna8manglik@gmail. com

Sunday, June 19, 2016

'' अब्बा होना हंसी खेल नहीं है ''

अब्बा ,
आज इतने सालो के बाद 
आपके अब्बापन के बारे में सोचता हूँ तो 
दांतों तले ऊँगली दबा लेता हूँ /
वाकई अब्बा होना 
हंसी खेल नहीं है /
आपने सफल अब्बा होने के 
कितने बार सबूत दिये /
अब्बा की भूमिका में आपने 
कितनी भिन्नताये पेश की /
आपकी सशक्त भूमिका की बदौलत 
हमारी जिंदगी की फिल्म 
हिट हो गई /


अब्बा ,
दुनियां में बहुत से कठिन काम है 
उसमे सबसे कठिन है 
अब्बा होना /
अब्बा ,
जीवन के रंगमंच पर 
अब्बा की कठिन भुमिका 
इतने सफलता पूर्वक निभा कर 
आप चले गये 
और किसी ने ताली भी नहीं 
बजाई । --------------- 


अखतर अली 

आमानाका ,
रायपुर मोबाईल - +919826126781

Thursday, January 28, 2016

मरने के बाद रोहित का पहला इंटरव्यू



नमस्कार, मैं ऋषिराज आज आपको एक ऐसा इन्टरव्यू पढाने जा रहा हूं जो अपने आप में नये किस्म का हैं। मैने मर चुके दलित छात्र रोहित का इन्टरव्यू किया है । ये मेरी एक कोशिश है कि एक शोषित वर्ग के छात्र को कैसी दिक्कते आयी होंगी । यहां आपको यह भी बता दूं यह इन्टरव्यू  काल्पनिक आधार पर किया गया है।इन्टरव्यू के जवाब रोहित के अंतिम पत्र पर आधारित हैं। यह सब मैने इसलिए लिख दिया क्योकी आज कल लोगो की भावनाए इतनी नाजुक और नंगी हो गयी है की कोई भी उन्हें ठेस पहुंचा देता है ।  आपको यह इन्टरव्यू पढ़ने पर बुरा लगे तो माफ किजीएगा अब वक्त आ चुका है कि हम अपनी गहरी नींद से जाग जाये। इस इन्टरव्यू के सवाल वैसे ही है जैसे आप रोजमर्रा के टेलीविजन में खोखली हो चुकी पत्रकारीता के सवाल  में देखते है ।
रिपोर्टर का सवाल तो रोहित मरने के बाद आप कैसा महसूस कर रहे हैं ?

रोहित का जवाब- जी , अच्छा और बेहद हल्का मेहसूस कर रहा हूं । अब केवल मै और मेरी आत्मा हैं । हम अब आराम से अपने मन के मुताबिक  अपने चुने हुए विषयो पर बात कर रहै है । यहा कोई और नही है जो मेरे बात करने या किसी विषय पर राय रखने पर मुझे देशद्रोही करार दे दे ।मैं जिंदा रहने से ज्यादा मर कर खुश हूं।
रिपोर्टर का सवाल रोहित आपने आत्महत्या क्यो की ?
रोहित का जवाब- सब शुन्य हो चुका था । मैं खुद के शरीर और रूह के बीच एक खाई महसूस कर रहा था, दुनिया खोखली है ,सब दिखावटी  लोग है जो इस दुनिया में रहते है ।
रिपोर्टर का सवाल-  क्या आप अपने विश्वविधालय में जातिवादी और देशद्रोही गतिविधी कर रहे थे?
रोहित का जवाब- देश में कई ऐसे वर्ग के लोग है जो किसी के भी फांसी के पक्ष नहीं हैं। कई जज से लेकर मशहूर अभिनेता तक फांसी के पक्ष में नहीं है। हम लोग भी उसी पक्ष का एक हिस्सा थे । देश आजाद है हमें अपनी राय रखने का पुरा अधिकार है तो फिर हम देशद्रोही कैसे हो गये ? अफजल गुरू के वक्त भी कई नेताओ ने फांसी का विरोध किया ये लोग उन्हे देशद्रोही करार क्यो नहीं देते ?
रिपोर्टर का सवाल - तो आप मानते है कि याकूब को गलत सजा दी गयी?
रोहित का जवाब-  नहीं , मैं आपको बता दू कि हम फांसी देने के खिलाफ है किसी भी गुनहगार को फांसी न दी जाये हम इसके पक्ष में हैं। फांसी के अलावा कोई और भी सजा दी जा सकती हैं ।
रिपोर्टर का सवाल- आप दलित है क्या इस वजह से आपके साथ ऐसा किया गया ?
रोहित का जवाब- मैं ऐसा नहीं मानता, मेरा तो बचपन ही एक त्रासदी की तरह गुजरा है और बिल्कुल खाली । बचपन से लेकर अबतक ऐसा ही हुआ है और मेरे से पहले भी यही होता आया है ।
रिपोर्टर का सवाल- क्या आपको मालूम था कि आपके मरने के बाद लोग कैसे रिएक्ट करेंगे ?
रोहित का जवाब- हां शायद मुझे मालूम था कि मेरे मरने पर लोग मुझे कायर कहेंगे, वो यह भी कहेंगे की एक एजेंडे के तहत मै हिन्दुओ को विरोध करता था लेकिन  यकिन मानिए मुझ इन बातों से फर्क नहीं पड़ता । मै इन चीजो का आदी हो चुका हूं और उनके सोच पर अब मुझे तरस आता हैं।
रिपोर्टर का सवाल- आपको सरकार से शिकायत है ?
रोहित का जवाब- नहीं , मुझे अब किसी से शिकायत नहीं है । मैं क्या हम सब इस व्यवसथा के आदि हो चुके है जहां लोकतत्र के नाम पर सरकार जनता पर ही हुकुमत करती है ।
रिपोर्टर का सवाल-  आपने जान देने से पहले अपने परिवार के बारे में नहीं सोचा ?
रोहित का जवाब सब कुछ सोच समझ कर किया । हर पहलु के बारे में सोचा और जब मन से शुन्य हो गया तो मुझे जीने से ज्यादा मरने में खुशी दिख रही थी । तो एक पत्र लिखा और फिर ....
रिपोर्टर का सवाल- आप 13 दिनों तक खुले आसमान में सोते रहे इसके पहले आप और आपके साथियो पर करावाई के लिए सरकार व्दारा लगातार पत्र लिखे जा रहे थे उसपर कोई टिप्पनी करना चाहेगे ?  
 
रोहित का जवाब-  नही, जिसे जो करना  अच्छा लगा उसने वो किया ।यहां सभी दिखवटी लोग है मै किसी से कुछ नही कहुंगा ।
रिपोर्टर का सवाल- आपके दोस्त और आपसे हमदर्दी रखने वाले  लोग सड़क पर है ?
रोहित का जवाब- मुझे नहीं मालूम था कि इतने लोग मेरे लिए खड़े होगे । लेकिन मुझे इस बात का दुख है कि ये लोग अगर शुरू से इतने जागरूक होते और लगातार आवाज उठाते तो किसी दलित को शोषित ही न होना पड़ता ।
रिपोर्टर का सवाल- अब आप मर चुके है लेकिन आपके मरने पर खूब राजनीति हो रही है?
रोहित का जवाब अच्छा है शायद मेरे बाद मेरे किसी दोस्त को ऐसा कदम उठाने की जरूरत न पड़े लेकिन इसकी उम्मीद बहुत कम है ?
रिपोर्टर का सवाल तो आप....(रोहित बीच मे रिपोर्टर को रोकते हुए )
रोहित- आप भी तो मेरे मरने के बाद आये शायद आपको इसी का इंतजार था कि कोई दलित मरे और फिर इसकी मौत पर जी भर कर तमाशा किया जा सके ...
(
रोहित गायब हो जाते है )
रिपोर्टर का मुहं लटक जाता है और फिर वह भी ....

Saturday, July 4, 2015

जुलाई अंक- नई क़लम- उभरते हस्ताक्षर

शुक्रिया लेखक मित्रो, अग्रज लेखकगण , बहुत जल्दी में इस अंक को निकाला है. आप सब की मेहनत की वजह से जुलाई अंक आपकी आँखों के सामने है. आपकी अपेक्षाओं पे कितना खरा उतरा ...ये आने वाला वक़्त बताएगा...आप इस लिंक पे जा के Downlod कर सकते हैं. आप चाहें तो Newshunt App से भी पढ़ सकते हैं.

वक़्त भी क्या अजीब शै है, कितने जल्दी बिना पंखों के उड़ता चला जाता है और हम मुट्ठी में रेत की मानिन्द बाँधने की कोशिश ही करते रहते हैं. साल-दर-साल गुजरते चले जाते हैं. लेकिन इस दौड़ते वक़्त के साथ जो साथ-साथ चलता है, वो आपके अहसास , जो बाद में सुखन कहलाता है. चलता चला जाता है और क़लम अपना सफ़र तय करती चली जाती है . क़लम धीमी जरूर होती है . लेकिन थमती नहीं है , रूकती नहीं है , अनवरत चलती रहती है. सच तो ये है क़लम , सुकून जो देती है न ..
आगे पढ़ें यहाँ से ---


जुलाई अंक- नई क़लम- उभरते हस्ताक्षर

Monday, June 29, 2015

जुलाई अंक के लिए रचनाएँ आमंत्रित

***************जुलाई अंक के लिए रचनाएँ आमंत्रित **********
प्रिये मित्रो,
नई कलम - उभरते हस्ताक्षर .. का जुलाई अंक आना है. इसके लिए मैं आप सबसे रचनाएँ आमंत्रित कर रहा हूँ. आपको पता है ये साहित्यिक पत्रिका है. आपको बता कर हमें ख़ुशी हो रही है. अब ये पत्रिका आप Newshunt से भी प्राप्त कर सकते हैं . और Android User इसे Newshunt App से भी ले सकते हैं. बहुत ही मामूली प्राइस पर.
लेखक मित्रों से अनुरोध है हमेशा की तरह आप जैसा साथ देते चले आये हैं. इस बार भी देंगे .. आप सब से ग़ज़लें , नज़्में, कवितायेँ, संस्मरण, आलेख और एक चिट्ठी कॉलम के तहत एक चिट्ठी जिसे हम प्रकाशित करेंगे. ताकि खतो-किताबत जिंदा रहे. बहस का मुद्दा इस बार हमने शिक्षा को बनाया है. आप इस पर हमें अपने लेख भेज सकते हैं. रचनाएँ इस Mail Id पर भेजें 

nai.qalam@gmail.com, shahid.ajnabi@gmail.com
इंतज़ार में
संपादक

Friday, May 22, 2015

मुझे रंडी के कोठे और पीर की मज़ार इन दो जगहों से बहुत डर लगता है- मंटो - अख्तर अली

अखतर अली का आलेख - मंटो - नामी कहानियों का बदनाम कथाकार 

साभार - रचनाकार

 

आज आपको रायपुर से - जनरल मैनेजर साहब - अख्तर अली साहब का आलेख सौंप रहा हूँ.... मंटो पे आप भी अपना रुख जाहिर करें. इंतज़ार रहेगा.
मुझे रंडी के कोठे और पीर की मज़ार इन दो जगहों से बहुत डर लगता है क्‍योंकि पहली जगह लोग अपनी औलाद से और दूसरी जगह अपने खुदा से पेशा करवाते हैं।
- मंटो की एक कहानी से
मंटो जन्‍मशताब्‍दी वर्ष
मंटो - नामी कहानियों का बदनाम कथाकार

उसने अपनी कहानियों से पूरे समाज में हंगामा मचा दिया था , जिसके लिखे को पढ़ कर लोग तिलमला उठे ,लोगों के तन बदन में आग लग गई , वे उसे बर्दाश्‍त नहीं कर सके। उसने जितनी उम्‍दा कहांनियाँ लिखी लोगों ने उस पर उतने ही गन्‍दे इल्‍ज़ाम लगाये। उसके खिलाफ मुकदमे दायर किये गये , उसे पागल करार दिया गया, फिर भी मंटो लिखता गया, जी हां उन नामी कहानियों के बदनाम कहानीकार का नाम मंटो था , सआदत हसन मंटो।

आज जब उस महान कहानीकार को इस दुनियाँ जिसने उसे चैन से जीने नहीं दिया से रूखसत हुए पैंतालीस साल से भी ज्‍यादा वक्‍त गुज़र चुका है तब मैं आज के हालात में मन्‍टो की कहानियों पर नज़र ड़ालता हूं और यह जानने की कोशिश करता हूं कि उसने ऐसा क्‍या लिख गया जो लोगों को नागवार गुज़रा और लोगों ने उसका जीना हराम कर दिया! मैं उसकी कहानियाँ बुराइंयां ढूंढने के इरादे से पढ़ता हूं और उसकी कलम का कायल होता जाता हूं। वाह , ज़ालिम की कलम में क्‍या जादू है, अपनी बात कहने का क्‍या जबरदस्‍त तरीका है। उसकी कहानी पढ़ कर एक बात खास तौर पर सामने आती है कि मन्‍टो ने कहानियों में कुछ नहीं कहा बल्‍कि कुछ खास कहने के लिये कहानियाँ लिखी।

हालांकि मै बहुत बड़ा विद्धान नहीं और न ही आज तक मंटो को पूरी तरह समझ ही पाया हूँ लेकिन चूंकि मै भी इसी विधा से जुड़ा हूँ इसलिये इसमें कुछ दखल अंदाज़ी कर सकने की क्षमता रखता हूँ। मैं यह पूरे आत्‍मविशवास के साथ कह सकता हूँ कि मन्‍टो को पागल कहने से बढकर कोई पागलपन हो ही नहीं सकता। अगर कोई कहता है कि मन्‍टो की कहानियाँ अश्‍लील है तो मेरा कहना है कि अश्‍लील उसकी कहानी नहीं बल्‍कि पढ़ने वालो का दृश्‍टिकोण है। आखिर अश्‍लीलता का मापदंड़ क्‍या है? यदि मन्‍टो जो लिखा वह अश्‍लील है तो जो कालिदास ने लिखा वह क्‍या है?

ग्‍यारह मई उन्‍नीस सौ बारह को समराला ( जिला लुधियाना ) में पैदा हुए मन्‍टो जिन्‍होने सात साल की उम्र मे जलियावाला बाग का खूनी हत्‍याकांड़ देखा , युवा अवस्‍था में देश का विभाजन, उस समय के रक्‍तपात को देखा , मन्‍टो जिसने रूसी कहानी के रूपांतर से कथा साहित्‍य की दुनियाँ में कदम रखा - जिनकी कहानियाँ जब मैं , मैं जो इस दुनियाँ में जब आया तब मेरे इस प्रिय लेखक को इस दुनियाँ से सिधारे पांच वर्ष हो चुके थे , आज पढ़ता हूँ तो एैसा महसूस होता है कि मन्‍टो ने जो लिखा वह कहानी नहीं बल्‍कि आंखो देखी घटना का चित्रण है जिसे अफसाने का नाम दे दिया गया है। बस ज़माने को मन्‍टो का यही चित्रण पचा नहीं, क्‍योंकि आज जिसे हम कहानी कहते हैं वह मन्‍टो की कहानी नहीं बल्‍कि ज़माने को दिखाया गया मन्‍टो का वह आईना है जिसमे ज़माने को अपना असली चेहरा नज़र आ गया। आप मन्‍टो की कहानी सिर्फ एक बार पढ कर मत छोडि़ये बल्‍कि दूसरी और तीसरी बार भी पढि़ये मेरा दावा है आप यह अवश्‍य स्‍वीकार करेगे कि कहानी का कथानक लेखक की कोरी कल्‍पना नहीं बल्‍कि उसका भोगा गया यथार्थ है , दिल पर खाया गया ज़ख्‍म है।

मन्‍टो की विवादग्रस्‍त कहानी ““खोल दो“ इंसानी दरिन्‍दगी का वास्‍तविक रूप है , इसकी नायिका सकीना मन्‍टो की कल्‍पना नहीं बल्‍कि विभाजन के समय का कटु सत्‍य है , जो इस कहानी को अश्‍लील रचना कहता है तो क्षमा कीजियेगा मेरा मानना है कि उसे अच्‍छे साहित्‍य को समझने की तमीज़ नहीं है। पाठकों का यह कर्तव्‍य होता है कि वे लेखक की भावनाओ और उसके दृश्‍टिकोण को ध्‍यान में रखते हुए उसकी कृति को पढ़े़, कथा खत्‍म होने पर पुस्‍तक भले बंद कर दे किन्‍तु मस्‍तिष्‍क के द्धार खुले रखे। क्‍योंकि मन्‍टो जैसे रचनाकार न तो अनावश्‍यक शब्‍द लिखते हैं न शब्‍दों का अनावश्‍यक प्रयोग करते हैं , मन्‍टो के शब्‍द पाठको की आंखो के रंगमंच पर दृश्‍य बन कर नृत्‍य करने लगते हैं। मन्‍टो के शब्‍द कही तीर कही खंजर कही ज़हर तो कही अंगार बन जाते हैं।

अपनी एक कहानी में मन्‍टो लिखते हैं - मुझे रंडी के कोठे और पीर की मज़ार इन दो जगहों से बहुत डर लगता है क्‍योंकि पहली जगह लोग अपनी औलाद से और दूसरी जगह अपने खुदा से पेशा करवाते हैं। मंटो का यह आक्रमक तेवर समाज झेल नहीं पाया और चंद मुल्‍ला , पंडि़त और नेताओं के गिरोह ने उसका जीना दुश्‍वार कर दिया , किन्‍तु जिस प्रकार घायल शेर और ज्‍यादा खतरनाक हो जाता है उसी प्रकार पीडि़त कलम और अधिक विद्रोही हो गई , इसी का परिणाम है कहानी “शाहदौले के चूहे” जो धर्मांधता के मुंह पर मारा गया मन्‍टो का वह तमाचा है जिसकी झनझनाहट समाज आज तक महसूस कर रहा है। तथाकथित हाई सोसायटी के साफ सुथरे कपड़े पहनने वालों की गंदी मानसिकता को बेनकाब करने से भी मन्‍टो साहब नहीं चूके और चंद लाईनों में ही उनका चरित्र चित्रण कर दिया , बानगी देखिये -
आपकी बेगम कैसी कैसी है?
यह तो आपको मालूम होगा , हां आप अपनी बेगम के बारे में मुझसे दरयाफ्‌त कर सकते हैं।
एक अन्‍य लघु कथा में मंटो के पात्र जो संवाद कहते हैं ऐसा लिखने का दम तो बस मंटो की कलम में ही था -
यार तुम औरतों से याराना कैसे गांठ लेते हो?
याराना कहां गांठता हू , बकायदा शादी करता हूं।
शादी करते हो?
हां भई, मैं हराम कारी का कायल नहीं। शादी करता हूं और जब उससे जी उकता जाता है तो हक ए महर अदा कर उससे छुटकारा हासिल कर लेता हूं।
यानि?
इस्‍लाम जि़न्‍दाबाद।
मन्‍टो विसंगतियों और उसके जिम्‍मेदार लोगों पर लगातार प्रहार किये जा रहा था ,खराबी को मुंह छुपाने के लिये भी जगह नहीं मिल रही थी। बहुत हाथ पैर मारने के बाद अंततः खिसियाई बिल्‍ली खम्‍बा नोचने लगी और साहित्‍य के क्षेत्र में यह बात ज़ोर पकड़ने लगी कि मन्‍टो की कहानियों में अश्‍लीलता भरी हुई है , मन्‍टो गंदा लेखक है। यह सच भी है कि यदि कोई अश्‍लील दृश्‍टिकोण लिये मन्‍टो की कहानियां पढेगा तो कुछएक कहांनियों में उसे अश्‍लीलता की झलक मिल जायेगी। यहां इस बात पर ध्‍यान दिया जाये कि मैंने दो बात कही है एक “अश्‍लील दृश्‍टिकोण” और दूसरी ” कुछ एक कहानी ”।

किन्‍तु इन्‍हीं कहानियों को जब एक समझदार और जागरूक पाठक पढ़ेगा तो इसे कलम का जादू , कलम का कमाल , लेखक की योग्‍यता जैसे अलंकरणों से सुसज्‍जित करेगा , क्‍योंकि उसमें इस बात को समझने की तमीज़ होगी कि इसमें लेखक का उद्धेश्‍य अश्‍लीलता का वर्णन नहीं बल्‍कि समाज के चारित्रिक पतन का चित्रण है। दरअसल मंटो ने अपनी कलम के साथ समझौता नहीं किया। यदि उसकी कहानी का पात्र वैश्‍या का दलाल है तो मंटो ने उसके मुंह से उसी स्‍तर के शब्द कहलवाये हैं जिस स्‍तर का वह आदमी है।

मंटो ने शब्‍दों का इस्‍तेमाल करते समय जि़न्‍दगी की इस हकीकत को ध्‍यान में रखा है कि जिस मुंह में हराम की रोटी जायेगी उस मुंह से शराफत के अल्‍फाज़ निकल ही नहीं सकते ,अगर मंटो की कथा में कोई जवान लड़का नहाती हुई लड़की को छुप कर देख रहा है तो स्‍वाभाविक है उस समय उसके दिल में देशभक्‍ति के विचार तो नहीं आयेगे और न ही समाज सेवा के। उस समय उसके मन में जो विचार पैदा होंगे उसकी का मन्‍टो ने पूरी ईमानदारी के साथ वर्णन किया है ,जो लिखा वही वास्‍तविकता है , किन्‍तु लेखक की योग्‍यता के कारण वर्णन इतना जीवंत बन पड़ा है कि पढ़ते समय पाठकों की आंखों में एक एक शब्‍द दृश्‍य बन कर खड़ा हो जाता है।

अब इसे लिखने वाले की काबिलीयत मानना चाहिये था लेकिन लोगों ने इसे उसका ऐब मान लिया और इस बात को पूरी तरह नज़र अंदाज़ कर दिया कि वह कहानी किस बिन्‍दु पर जाकर खत्‍म होती है और क्‍या बात कहती है? मन्‍टो की कहांनियो की यह खासियत है कि वे तो खत्‍म हो जाती है लेकिन पढ़ने वालों के दिमाग में सैकड़ों सवालात पैदा कर जाती है , खास कर ”खोल दो“,”ठंड़ा गोश्‍त“, दो कौमें , शहदौले के चूहे ,कहानियो में तो यह बात साफ तौर पर उभर कर आती है कि इनमें जो लिखा उसे तो हर सामान्‍य पाठक पढ़ लेता है लेकिन समझदार पाठक उसे भी पढ़ लेता है जिसे मन्‍टो ने शब्‍दों में नहीं ढाला , उन अलिखित वाक्‍यों को भी पढ़ लेता है जिसे कहने के लिये मन्‍टो ने पूरी कहानी लिखी। मंटो शब्‍दो का इस्‍तेमाल कितनी खूबसूरती से करते हैं इसका एक बेहतरीन नमूना उनकी कहानी ” सड़क के किनारे “ में देखने को मिलता है। नायिका को गर्भवती होने का एहसास होता है , उस एहसास को मन्‍टो ने शब्‍दो में यूं बयान किया है -
मेरे जिस्‍म की खाली जगहें क्‍यों भर रही है? ये जो गड़ढे थे किस मलबे से भरे जा रहे है? मेरी रगो में ये कैसी सरसराहटें दौड़ रही है? मैं सिमटकर अपने पेट में किस नन्‍हे से बिन्‍दु पर पहुंचने के लिये संघर्ष कर रही हूं? मेरे अंदर दहकते हुए चूल्‍हों पर किस मेहमान के लिये दूध गर्म किया जा रहा है? यह मेरा दिमाग मेरे ख्‍यालात के रंग बिरंगे धागों से किसके लिये नन्‍ही मुन्‍नी पोशाकें तैयार कर रहा है? मेरे अंग अंग और रोम रोम मे फंसी हुई हिचकियां लोरियों में क्‍यों बदल रही हैं? यह मेरा दिल मेरे खून को धुनक धुनक कर किसलिये नर्म और कोमल रजाइयां तैयार कर रहा है? मेरे सीने की गोलाईयों में मस्‍जिदों के मेहराबों जैसी पाकीज़गी क्‍यों आ रही है?
मंटो जिसने सारी उम्र सिर्फ लिखा है और इतना ज्‍यादा लिखा है कि उसके सम्‍पूर्ण साहित्‍य का यहां उल्‍लेख नहीं किया जा सकता। हो सकता है उसकी अनगिनत रचनाओ में कुछ एक कथ्‍य या शिल्‍प की दृष्‍टि से कमज़ोर हो , किन्‍तु उन चंद रचनाओं से मन्‍टो का सम्‍पूर्ण रचना संसार को आंकना न्‍यायसंगत नहीं होगा और उस अश्‍लीलता का आरोप लगाना उसकी योग्यता को झुठलाना होगा। यदि मन्‍टो का दृष्टिकोण अश्‍लील होता तो उसकी कलम टोबा टेक सिंह , खुदा की कसम , मम्‍मी , काली शलवार , ये मर्द ये औरतें , रत्‍ती माशा तोला , जैसी बेहतरीन कहानियाँ न रच पातीं। जिन्‍हें मन्‍टो की कलम परेशान करती रही उन्‍हें मन्‍टो ने स्‍वयं कहा है कि -
ज़माने के जिस दौर से हम गुज़र रहे है अगर आप उससे वाकिफ़ नहीं तो मेरे अफसाने पढि़ये और अगर आप इन अफसानों को बरदाश्‍त नहीं कर सकते तो इसका मतलब है कि ज़माना नाकाबिले बर्दाश्‍त है , मेरी तहरीर में कोई नुक्‍स नहीं। जिस नुक्‍स को मेरे नाम से मनसूब किया जाता है वह दरअसल मौजूदा निज़ाम का नुक्‍स है। मैं सोसायटी की चोली क्‍या उतारूंगा वो तो है ही नंगी।
- - - - - - -
अखतर अली
फ़ज़ली अर्पाटमेंट
आमानाका
रायपुर ( छत्‍तीसगढ़ )
मो़ 9826126781