Thursday, December 22, 2016

गणि राजेन्द्र विजय की पुस्तक ‘सभ्यता की सुबह’ का लोकार्पण

अहिंसा और नैतिकता के आधार पर ही उन्नति संभव: पासवान 

नई दिल्ली, 17 दिसम्बर 2016

केन्द्रीय उपभोक्ता मामलें, खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण मंत्री श्री रामविलास पासवान ने राष्ट्र के लिए अहिंसा, नैतिकता तथा सामाजिक संवेदनशीलता को सबसे जरूरी बताते हुए कहा कि कोई भी राष्ट्र चाहे किसी भी क्षेत्र में कितनी भी प्रगति क्यों न कर ले वह इन मूल्यों के बिना सही मायने में उन्नति नहीं कर सकता। भगवान महावीर ने हमें अहिंसा एवं शांति का संदेश दिया और उनके बताए मार्ग पर चलकर ही देश वास्तविक उन्नति कर सकता है। 

श्री पासवान आज  उपभोक्ता मंत्रालय में प्रख्यात जैन संत एवं सखी परिवार अभियान के प्रणेता गणि राजेन्द्र विजयजी की सन्निधि में आयोजित संगोष्ठी को सम्बोधित करते हुए बोल रहे थे। उन्होंने भगवान महावीर की जन्म कल्याणक भूमि के समग्र विकास की आवश्यकता व्यक्त करते हुए कहा कि व्यक्ति अपने स्तर पर सेवा और जन कल्याण की गतिविधियों को सुदृढ़ बनाने के लिए प्रयत्नशील बने। देश में कुछ ऐसे वर्ग हैं जो सेवा और स्वस्थ समाज की स्थापना के लिए उल्लेखनीय कार्य कर रहे हैं, जिनमें जैन समाज का योगदान उल्लेखनीय है। उन्होंने शांतिदूत गच्छाधिपति आचार्य श्रीमद् विजय नित्यानंद सूरीश्वरजी के दीक्षा के पचासवें वर्ष के उपलक्ष्य में आयोजित संयम स्वर्ण जयंती महोत्सव राष्ट्रीय समिति के अध्यक्ष के रूप में अपने मनोनयन पर प्रसन्नता व्यक्त करते हुए कहा कि आचार्यजी का समाज और राष्ट्र के विकास में महत्वपूर्ण योगदान है। इस राष्ट्रीय समिति के द्वारा आयोजनात्मक गतिविधियों के साथ-साथ प्रयोजनतात्मक गतिविधियां भी संचालित होनी चाहिए जिनमें भगवान महावीर जन्म कल्याणक भूमि पर सेवा और शिक्षा के कुछ विशेष उपक्रम हो सकते हैं। इनमें सरकार भी सहयोग प्रदत्त करेगी। 

गणि राजेन्द्र विजय की पुस्तक ‘सभ्यता की सुबह’ का लोकार्पण करते हुए श्री पासवान ने कहा कि आधुनिक जीवन में शारीरिक और भौतिक विकास ही मनुष्य का विकास है। हम आत्मविकास को भूलते जा रहे हैं। भौतिक विकास के साथ-साथ नैतिक एवं आध्यात्मिक मूल्यों का विकास होगा, तभी संतुलित समाज-निर्माण की अवधारणा मूत्र्त बनेगी। इस दृष्टि से गणि राजेन्द्र विजय का चिंतन उपयोगी है। पुस्तक की पहली प्रति सुखी परिवार फाउंडेशन के राष्ट्रीय संयोजक श्री ललित गर्ग ने श्री पासवान को प्रदत्त करते हुए बताया कि यह गणिजी की उन्नीसवीं पुस्तक हैं, जिसमें उन्होंने सभ्यता और संस्कृति पर मंडरा रहे खतरों की चर्चा करते हुए उसके लिए सबको जागरूक होने के प्रेरक विचार प्रस्तुत कृति में व्यक्त किए हैं। सांसद एवं लोक जनशक्ति के अध्यक्ष चिराग पासवान भी इस मौके पर उपस्थित थे। 

इस अवसर पर जैन समाज के प्रतिनिधि मंडल ने श्री वल्लभ स्मारक के अध्यक्ष श्री राजकुमार जैन, फरीदाबाद के श्री राजकुमार जैन ओसवाल, श्री नरेन्द्र जैन, युवक संघ के श्री दीपक जैन, श्री नीरज जैन, श्री संजय जैन, श्री त्रिभुवन कुमार जैन, श्री त्रिलोकचंद जैन, श्री अश्विनी जैन, श्री संजीव जैन आदि ने नित्यानंद सूरिजी के दीक्षा के पचासवें वर्ष पर आयोजित संयम स्वर्ण जयंती महोत्सव की जानकारी देते हुए इस हेतु गठित राष्ट्रीय समिति के अध्यक्ष के लिए श्री रामविलास पासवान से अनुरोध किया जिसके लिए स्वीकृति प्रदत्त की। संपूर्ण जैन समाज के प्रतिनिधियों ने खुशी व्यक्त करते हुए श्री पासवान का शाॅल ओढ़ाकर एवं गुलदस्ता भेंट कर सम्मान किया। 
इस अवसर पर सुखी परिवार अभियान के प्रणेता गणि राजेन्द्र विजय ने महावीर जन्म कल्याणक भूमि में महावीर विश्वविद्यालय की चर्चा करते हुए कहा कि राष्ट्र की एकता, शांति एवं सौहार्द के लिए अहिंसा की प्रतिस्थापना जरूरी है। अहिंसा की स्थापना के लिए शिक्षा एक सशक्त माध्यम है। उन्होंने स्मार्ट शहर की तर्ज पर स्मार्ट गांव बसाने की आवश्यकता व्यक्त करते हुए अहिंसक ग्राम संपूर्ण जानकारी श्री पासवान को प्रदत्त की। गणि राजेन्द्र विजय ने हिंसा, आतंक और नक्सलवाद को रोकने के लिए सरकारी प्रयत्नों के साथ-साथ गैर-सरकारी प्रयत्नों की जरूरत को उजागर करते हुए कहा कि जहाँ भी इस तरह के प्रयत्न हों शीर्ष राजनीति से जुड़े लोगों को इसमें भागीदारी करनी चाहिए। 




प्रेषकः

(ललित गर्ग)
संयोजक-सुखी परिवार फाउंडेशन
10, पंडित पंत मार्ग, नई दिल्ली-110001 , मो. 9811051133 

फोटो परिचयः
(1) गणि राजेन्द्र विजय की पुस्तक ‘सभ्यता की सुबह’ केन्द्रीय मंत्री श्री रामविलास पासवान लोकार्पित करते हुए।
(2) केन्द्रीय मंत्री श्री रामविलास पासवान का शाॅल ओढ़ाकर सम्मान करते हुए जैन प्रतिनिधिमंडल।

Tuesday, November 1, 2016

गिरीश पंकज - जन्मदिन पर आदरांजली


गिरीश पंकज से मिलना आैर गिरीश पंकज काे पढ़ना ये दाे अलग अलग बात नही है, जैसा निर्मल इनका लेखन है उतना ही स्वच्छ इनका व्यक्तित्व है | जिस स्वरूप का, जिस संबंध का, जिस तेवर का, जिस शैली का, जिस काैशल का, जिस विचारात्मकता का लेखन गिरीश पंकज कर रहे हैं उसे पढना शाैक की सीमा से निकल कर आवश्यक आवश्यकता की हद मे शुमार हाे गया है | गिरीश पंकज काे पढ़ना स्वयं काे अपड़ेट करना है | गिरीश निरंतर लिखने वाले लेखक है, इनके पास व्यापकता आैर विविधता की असीमितता है | मंटाे, राही मासूम रज़ा, परसाई की तरह गिरीश भी सिर्फ इसलिसे नही लिखते क्याेकि वे लेखक है बल्कि इसलिये लिखते है कि इस तरह का लेखन समाज के प्रति उनकी नैतिक ज़िम्मेदारी है | गिरीश जी पञकार है, व्यंग्यकार है, गीतकार है, उपन्यासकार है, समीक्षक है, आलोचक है, कवि है, सम्पादक है...... इनका लेखन क्षेञ विविध है, विस्तृत है, किसी एक विधा का रचनाकार कहना इन्हें कम कर के आंकना हाेगा | यह समय गिरीश पंकज के मूल्यांकन करने का सही समय है ,उनसठ वर्ष की आयु मे प्रकाशित पुस्तकों की संख्या पचास हाेना आैर इसके अतिरिक्त फुटकर लेखन की संख्या तीन अंकाे मे हाेना आैर समूचा लेखन सुधारवादी हाेना, जनवादी हाेना, समाज , घर्म ,राजनीति, प्रशासन आैर बाजार मे फैल चुकी गंदगी काे साफ़ करना, खराबियाे की खबर लेना, आम आदमी के पक्ष मे खड़े हाे जाने वाला लेखन है | माैजूदा हालात की पड़ताल करता लेखन केवल अवरोध पैदा करने वाला लेखन नही है वरन ऩई राह तलाशने वाला लेखन है | गिरीश पंकज का लिखा बाजार मे बिकता ज़रूर है लेकिन ये बिक कर नही लिखते , लिखना इनका मिशन है उघाेग नही |
गिरीश जी के लेखन मे क्रोध भी कलात्मकता के साथ है. नाराज़गी भी लय मे है, चीख भी सुर मे है, विरोध मे भी पूरी शालीनता समाहित है , लेखन मे तन्मयता है | इनके व्यंग्य मे विस्फोट है लेकिन अनुशासित शब्दावली के साथ , विचाराे की अभिव्यक्ति प्रभावशाली रूप मे है लेकिन संयम के साथ | गिरीश पंकज के लेखन मे माैकापरस्त और फिरकापरस्त लाेगाे काे ललकार है ताे अच्छे लाेगाे का सत्कार और पारखी लाेगाे के लिये चमत्कार भी है |अदभुद कलम है इनकी जिससे नाराज़गी भी मुस्कान के साथ ज़ाहिर हाेती है | इस बात की खाेज की जानी चाहिये कि गिरीश लिखने के पहले कलम काे किस चाशनी मे ड़ुबाेते है ?
गिरीश पंकज का समूचा लेखन विकृतियाे के खिलाफ आम आदमी के पक्ष मे लिखा गया दस्तावेज है |
अखतर अली
आमानाका
कांच गोदाम के पास,
रायपुर ( छत्तीसगढ़ ) 492001
माे. न. 9826126781

Monday, October 31, 2016

आजा चल दीवाली मना ले

आजा चल दीवाली मना ले


हुआ जो अस्त कामनाओं का सूरज
दीप जूनून के फिर जला ले
काली रात से खौफ न खा तू
आजा चल दीवाली मना ले


आस विश्वास मूरत लक्ष्मी गणेश की
शीश इनके आगे तू झुका ले
रख वाग्देवी को मस्तिष्क में
खील खुशियों के अब बिखराले
आजा चल दीवाली मना ले


जोड़ मेहनतों के तिनके तू
ऊँची लक्ष्य हटरी बना ले
भर हसरतों के चंडोल दिल में
हृदय का दीवट यूँ सजा ले
आजा चल दीवाली मना ले


कर आह्वान प्रेम लक्ष्मी का
स्नेह आतिश जी भर छुडा ले
दूर कर तम वैर भाव का
भाई दूजों को गले लगा ले
आजा चल दीवाली मना ले


साहित्यकार सपना मांगलिक
ईमेल –sapna8manglik@gmail.com

Wednesday, October 19, 2016

क्या सच में प्यार जिंदा है ??


आज करवाचौथ का त्योहार देश भर में धूम धाम से मनाया जा रहा है सभी शादी - शुदा औरतें अपने पतियों के लिए निर्जल उपवास रखती हैं साथ में उनकी लम्बी उम्र की कामना करती हैं, उनके हाथ से पानी पी के व्रत खोलती हैं पति भी प्रसन्न हो के उन्हें विशेष तोहफे देते हैं. लाल लिबास में लिपटी दुल्हन की तरह तैयार हो के महिलायें फिर से अपने उन पुराने दिनों की याद में खो जाती हैं जब वो अपने राजकुमार समान पति का सपना युवा अवस्था में देखती थीं. पर सवाल ये है कि क्या वाक़ई प्यार जिन्दा है ? या ये सब महज एक ढोंग है , भ्रम है, दिखावा है. रोज की ज़िन्दगी में ये सब तो नहीं होता, वहां एक प्रेम करने वाला पति नहीं होता , पत्नी को उसके कर्तव्यों के तले दबाने वाला पति ही होता है. तुम ये क्यूँ पहने हो ? , वहां क्यूँ बैठी , सर पे पल्ला रखो , पैर छुओ और न जाने क्या – क्या ...............
क्यूँ आखिर क्यूँ , एक औरत खुद खाना बनाती है पर सबसे आख़िर में खाती है, रोज सुबह सबसे जल्दी उठती है और रात में काम करके सबसे आखिर में सोती है. यहाँ तक की उसे कपड़े पहनने के तौर तरीके भी ससुराल वाले सिखाते हैं. वो रोज घुट – घुट के जीती है फिर भी मुस्कुराती है. वो उस झिड़क को भी प्रेम समझती है और रम जाती है.
तब आज करवा चौथ के दिन ये प्यार जिन्दा है ? या फिर किसी समाज के कुरीति में लिपटी सुबह से भूखी , प्यासी औरत एक और झिड़क में खुद को खुश रखने झूटी तसल्ली दे रही है. 

- Shikha Pari 

Tuesday, October 18, 2016

दिल को छू जाने वाली कहानी सौम्या मिश्रा

आज एकाएक किसी की याद आई और मेरी आँखे भर आई।मेरी ये पुरानी याद और दिल के भाव है, जिसे आज शब्द देकर पटल पर प्रस्तुत कर रही हूँ।


कालेज के दिनों के बाद है जब मैं कंटीन में लंच के वक़्त जाया करती थी । वैसे तो वहां बहुत से कर्मचारी थे, लेकिन एक लड़का करीब 13 साल का जिसका नाम अजय वह भी काम किया करता था।
अजय मेरे पास रोज आता था बोलता दीदी नमस्ते और कैसी है, आप । मैं बोलती ठीक हूँ भैया।
थोड़ी देर चुप रहने के बाद वो एकाएक बोलता दीदी कुछ रूपये होंगे मैं शांत होकर कुछ सोचती फिर बोलती तुम पैसे का क्या करोगे यहाँ काम करते हो उसका पैसा तो मिलता होगा ।
अजय बोलता है हाँ मिलता हैं न 600 रूपया लेकिन पूरा पैसा मम्मी की बीमारी में लग जाता है, मेरी मम्मी बहुत बीमार रहती हैं।मैंने पूछा अच्छा और तुम्हारे पापा वो । तब अजय बोलता की मम्मी बोलती है की जब मैं छोटा था तो वो कहीं चले गए।
फिर मैंने पूछा की जो पैसा मैं देती हूँ उसका क्या करते हो? तो वो बोला को मैं पढाई करता हूँ और जो खर्च आता इस में से ही खर्च कर लेता ।
मैंने कहा की तुम दिन भर यहीं रहते तो पढाई कब करते हो क्योँकि स्कूल तो जाते नही, तो वो बोला मेरे स्कूल के सर बहुत अच्छे है उनकी सब बताया तो उन्हीने कहा की ठीक है शाम को मेरे घर आकर पढ़ लिया करो सो मैं घर जाकर सीधे सर के घर पढ़ने चला जाता हूँ।
मेरा लंच का समय समाप्त हो गया था मैंने अपना बैग उठाया और क्लास की और चल दी,पीछे से अजय आवाज देता दीदी पैसे नही दिए मैंने बैग की चैन खोली 7 रूपये थे उसको दे दिया उसने खुश होते हुए थैंक यू बोला और अपने काम पर लग गया, मैं भी क्लास की ओर चली आई।
तीन चार महीने गुजर गए थे मैं कैंटीन की तरफ से गुजरी वहां अपनी बोतल में पानी भर रही थी मैंने अजय को देखा आवाज लगाई । वह कुछ नही बोला, मैंने कहा क्या हुआ अजय तुम आज कुछ नही बोले तबियत वगैरह ठीक है, लेकिन उसने कुछ जवाब नही दिया ।
मुझे क्लास के लिए देरी हो रही थी और एग्जाम की वजह से कॉलेज बन्द भी होने वाला था तो मैंने बैग से 100 रुपये निकाले और उसे देने लगी, लेकिन अजय ने वो रुपये नही लिए और रोने लगा बोला दीदी अब कोई जरूरत नही क्योँकि पूरे महीने के पैसे बच जाते मेरी मम्मी मर गयी मैं बिलकुल अकेला हो गया।
अब कोई जरूरत नही।
उसको रोता देख मेरी आँखों में आँसू आ गए। मैंने अजय से कुछ भी नही पूछा और वापस क्लास चली आई।
मेरा कॉलेज भी छूट गया, लेकिन आज भी जब अजय के बारे में सोचती हूँ तो बहुत तकलीफ होती है । एक सवाल बार बार आता है मेरे जहन में की पता नही अब वो कैसा होगा? कहाँ होगा?


सौम्या मिश्रा

मोस्ट पावरफुल परसन ही क्यूँ न बन जाऊं

मैं एक "मोस्ट पावरफुल परसन" ही क्यूँ न बन जाऊं पर हूँ तो आखिर मैं एक लड़की . एक लड़की होने का भार ही बहुत होता है . सौ पत्थर कलेजे पर माँ – बाप के रख दिए जाते हैं तब एक लड़की पैदा होती है , पत्थर से भारी सीना फिर बोझ तले लड़की दबकर इतनी दब जाती है कि बेचारी पहले से ही बोझिल हो जाती है , क्या प्रेम , क्या विश्वास ये सब तो उसको नसीब से मिलता है कहीं गर्भ में ही मार दी जाती है , अगर गलती से जन्म ले भी लिया तो दुनिया में लाकर मार दी जाती है. लाख कोशिशें करले वो खुल के जी नहीं पाती . घुट – घुट कर अन्दर ही अन्दर मर जाती है या मार दी जाती है .


तो क्यूँ पैदा ही करो गर्भ में ही मार देना उनको सही होता है दुनिया में आने ही न दो कम से कम वो गर्भ में तो खुल के साँस ले पायेंगी थोड़ी ही देर सही अंतिम सांस लेने से पहले.   

Thursday, October 13, 2016

सपना के दोहे



1
लो टूट प्रेम के गए,सुन्दर थे जो कांच।
आज दिलों पर कर रही,नफरत नंगा नाच।।

2
प्रेम धागा तोड़ चला,बाँधा हमसे बैर।
समझे जिसको अपना हम,हुआ आज वो गैर।।

3
दूर गया कोई नहीं, सब हैं रहते पास।
मन को फिर क्या सालता, हरपल रहे उदास।।

4
हैरान हूँ मैं देखकर,झूठ के ठाठ-बाट।
तिकड़मबाजी का चलन,सच है बिकता हाट।।

5
देत अल्लाह बांग तू,काम करे जल्लाद।
बेटा झगडे बाप ते,होवे खुद बर्बाद।।

6
हाथ थाम आतंक का,करते फिरें विनाश।
पेशावर जैसी भले,बिछती जाएँ लाश।।

7
अशिक्षा नर्क समान है, काहे करती खेद।
ज्ञान दीप जलाकर तुम,अन्धकार दो भेद।।



सपना मांगलिक
फ659 कमला नगर
आगरा 
sapna8manglik@gmail. com

Sunday, June 19, 2016

'' अब्बा होना हंसी खेल नहीं है ''

अब्बा ,
आज इतने सालो के बाद 
आपके अब्बापन के बारे में सोचता हूँ तो 
दांतों तले ऊँगली दबा लेता हूँ /
वाकई अब्बा होना 
हंसी खेल नहीं है /
आपने सफल अब्बा होने के 
कितने बार सबूत दिये /
अब्बा की भूमिका में आपने 
कितनी भिन्नताये पेश की /
आपकी सशक्त भूमिका की बदौलत 
हमारी जिंदगी की फिल्म 
हिट हो गई /


अब्बा ,
दुनियां में बहुत से कठिन काम है 
उसमे सबसे कठिन है 
अब्बा होना /
अब्बा ,
जीवन के रंगमंच पर 
अब्बा की कठिन भुमिका 
इतने सफलता पूर्वक निभा कर 
आप चले गये 
और किसी ने ताली भी नहीं 
बजाई । --------------- 


अखतर अली 

आमानाका ,
रायपुर मोबाईल - +919826126781

Thursday, January 28, 2016

मरने के बाद रोहित का पहला इंटरव्यू



नमस्कार, मैं ऋषिराज आज आपको एक ऐसा इन्टरव्यू पढाने जा रहा हूं जो अपने आप में नये किस्म का हैं। मैने मर चुके दलित छात्र रोहित का इन्टरव्यू किया है । ये मेरी एक कोशिश है कि एक शोषित वर्ग के छात्र को कैसी दिक्कते आयी होंगी । यहां आपको यह भी बता दूं यह इन्टरव्यू  काल्पनिक आधार पर किया गया है।इन्टरव्यू के जवाब रोहित के अंतिम पत्र पर आधारित हैं। यह सब मैने इसलिए लिख दिया क्योकी आज कल लोगो की भावनाए इतनी नाजुक और नंगी हो गयी है की कोई भी उन्हें ठेस पहुंचा देता है ।  आपको यह इन्टरव्यू पढ़ने पर बुरा लगे तो माफ किजीएगा अब वक्त आ चुका है कि हम अपनी गहरी नींद से जाग जाये। इस इन्टरव्यू के सवाल वैसे ही है जैसे आप रोजमर्रा के टेलीविजन में खोखली हो चुकी पत्रकारीता के सवाल  में देखते है ।
रिपोर्टर का सवाल तो रोहित मरने के बाद आप कैसा महसूस कर रहे हैं ?

रोहित का जवाब- जी , अच्छा और बेहद हल्का मेहसूस कर रहा हूं । अब केवल मै और मेरी आत्मा हैं । हम अब आराम से अपने मन के मुताबिक  अपने चुने हुए विषयो पर बात कर रहै है । यहा कोई और नही है जो मेरे बात करने या किसी विषय पर राय रखने पर मुझे देशद्रोही करार दे दे ।मैं जिंदा रहने से ज्यादा मर कर खुश हूं।
रिपोर्टर का सवाल रोहित आपने आत्महत्या क्यो की ?
रोहित का जवाब- सब शुन्य हो चुका था । मैं खुद के शरीर और रूह के बीच एक खाई महसूस कर रहा था, दुनिया खोखली है ,सब दिखावटी  लोग है जो इस दुनिया में रहते है ।
रिपोर्टर का सवाल-  क्या आप अपने विश्वविधालय में जातिवादी और देशद्रोही गतिविधी कर रहे थे?
रोहित का जवाब- देश में कई ऐसे वर्ग के लोग है जो किसी के भी फांसी के पक्ष नहीं हैं। कई जज से लेकर मशहूर अभिनेता तक फांसी के पक्ष में नहीं है। हम लोग भी उसी पक्ष का एक हिस्सा थे । देश आजाद है हमें अपनी राय रखने का पुरा अधिकार है तो फिर हम देशद्रोही कैसे हो गये ? अफजल गुरू के वक्त भी कई नेताओ ने फांसी का विरोध किया ये लोग उन्हे देशद्रोही करार क्यो नहीं देते ?
रिपोर्टर का सवाल - तो आप मानते है कि याकूब को गलत सजा दी गयी?
रोहित का जवाब-  नहीं , मैं आपको बता दू कि हम फांसी देने के खिलाफ है किसी भी गुनहगार को फांसी न दी जाये हम इसके पक्ष में हैं। फांसी के अलावा कोई और भी सजा दी जा सकती हैं ।
रिपोर्टर का सवाल- आप दलित है क्या इस वजह से आपके साथ ऐसा किया गया ?
रोहित का जवाब- मैं ऐसा नहीं मानता, मेरा तो बचपन ही एक त्रासदी की तरह गुजरा है और बिल्कुल खाली । बचपन से लेकर अबतक ऐसा ही हुआ है और मेरे से पहले भी यही होता आया है ।
रिपोर्टर का सवाल- क्या आपको मालूम था कि आपके मरने के बाद लोग कैसे रिएक्ट करेंगे ?
रोहित का जवाब- हां शायद मुझे मालूम था कि मेरे मरने पर लोग मुझे कायर कहेंगे, वो यह भी कहेंगे की एक एजेंडे के तहत मै हिन्दुओ को विरोध करता था लेकिन  यकिन मानिए मुझ इन बातों से फर्क नहीं पड़ता । मै इन चीजो का आदी हो चुका हूं और उनके सोच पर अब मुझे तरस आता हैं।
रिपोर्टर का सवाल- आपको सरकार से शिकायत है ?
रोहित का जवाब- नहीं , मुझे अब किसी से शिकायत नहीं है । मैं क्या हम सब इस व्यवसथा के आदि हो चुके है जहां लोकतत्र के नाम पर सरकार जनता पर ही हुकुमत करती है ।
रिपोर्टर का सवाल-  आपने जान देने से पहले अपने परिवार के बारे में नहीं सोचा ?
रोहित का जवाब सब कुछ सोच समझ कर किया । हर पहलु के बारे में सोचा और जब मन से शुन्य हो गया तो मुझे जीने से ज्यादा मरने में खुशी दिख रही थी । तो एक पत्र लिखा और फिर ....
रिपोर्टर का सवाल- आप 13 दिनों तक खुले आसमान में सोते रहे इसके पहले आप और आपके साथियो पर करावाई के लिए सरकार व्दारा लगातार पत्र लिखे जा रहे थे उसपर कोई टिप्पनी करना चाहेगे ?  
 
रोहित का जवाब-  नही, जिसे जो करना  अच्छा लगा उसने वो किया ।यहां सभी दिखवटी लोग है मै किसी से कुछ नही कहुंगा ।
रिपोर्टर का सवाल- आपके दोस्त और आपसे हमदर्दी रखने वाले  लोग सड़क पर है ?
रोहित का जवाब- मुझे नहीं मालूम था कि इतने लोग मेरे लिए खड़े होगे । लेकिन मुझे इस बात का दुख है कि ये लोग अगर शुरू से इतने जागरूक होते और लगातार आवाज उठाते तो किसी दलित को शोषित ही न होना पड़ता ।
रिपोर्टर का सवाल- अब आप मर चुके है लेकिन आपके मरने पर खूब राजनीति हो रही है?
रोहित का जवाब अच्छा है शायद मेरे बाद मेरे किसी दोस्त को ऐसा कदम उठाने की जरूरत न पड़े लेकिन इसकी उम्मीद बहुत कम है ?
रिपोर्टर का सवाल तो आप....(रोहित बीच मे रिपोर्टर को रोकते हुए )
रोहित- आप भी तो मेरे मरने के बाद आये शायद आपको इसी का इंतजार था कि कोई दलित मरे और फिर इसकी मौत पर जी भर कर तमाशा किया जा सके ...
(
रोहित गायब हो जाते है )
रिपोर्टर का मुहं लटक जाता है और फिर वह भी ....

Saturday, July 4, 2015

जुलाई अंक- नई क़लम- उभरते हस्ताक्षर

शुक्रिया लेखक मित्रो, अग्रज लेखकगण , बहुत जल्दी में इस अंक को निकाला है. आप सब की मेहनत की वजह से जुलाई अंक आपकी आँखों के सामने है. आपकी अपेक्षाओं पे कितना खरा उतरा ...ये आने वाला वक़्त बताएगा...आप इस लिंक पे जा के Downlod कर सकते हैं. आप चाहें तो Newshunt App से भी पढ़ सकते हैं.

वक़्त भी क्या अजीब शै है, कितने जल्दी बिना पंखों के उड़ता चला जाता है और हम मुट्ठी में रेत की मानिन्द बाँधने की कोशिश ही करते रहते हैं. साल-दर-साल गुजरते चले जाते हैं. लेकिन इस दौड़ते वक़्त के साथ जो साथ-साथ चलता है, वो आपके अहसास , जो बाद में सुखन कहलाता है. चलता चला जाता है और क़लम अपना सफ़र तय करती चली जाती है . क़लम धीमी जरूर होती है . लेकिन थमती नहीं है , रूकती नहीं है , अनवरत चलती रहती है. सच तो ये है क़लम , सुकून जो देती है न ..
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जुलाई अंक- नई क़लम- उभरते हस्ताक्षर