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Sunday, January 29, 2012

मुख पर मुखौटा

 ऐ ... रूचिका तेरी वो बीमार हैं। नविता ने कुटिल मुस्कान बिखेरते हुए
कहा। वो कौन... साफ-साफ क्यों नहीं बतलाती? अरे वही तेरी लख्ते जिगर,
तेरी रोल माडॅल। उनकी बीमारी की खबर ने रूचिका को झकझोर दिया। अपनी बात
पूरी करते हुए नवीता ने कहा कि कल शाम जब मैं बाजार से वापस आ रही थी तो
वे अपने पति के साथ हास्पिटल में दाखिल हो रहीं थी।

वे मतलब डा0 वीणा वर्मा। बेहद तेज समाजशास्त्री। कालेज में अपने विषय पर
उनसा पकड़ शायद ही किसी का हो। आदर्शवादी। कल्चरल प्रोग्राम हो या सेमिनार
उनकी मौजूदगी के बिना सब बेकार। पिछले साल एन. एस. एस. कैम्प के दौरान
’टूटते संयुक्त परिवार’ विषय पर सम्पन्न वाद-विवाद प्रतियोगिता की वह
निर्णायक थीं, जिसमें रूचिका ने अव्वल स्थान पाया था।

रूचिका डॉ0 वीणा वर्मा के व्यक्तित्व से इतना प्रभाावित हुई की, कब वह
उनकी व्यावहारिक शिष्या बन गयी, पता न चला। उसे पूरी तरह याद है कि महिला
विस पर बतौर मुख्य अतिथि श्रीमती वर्मा ने ’महिला उत्पीड़न’ विषय पर बोलते
हुए किस तरह समाज के ठेकेदारों का बखिया उखेड़ा था। हर पहलू पर समान
दृष्टिकोण से संयमित लहजे में नारी पर हो रहे अत्याचार पर व्याख्यान
प्रस्तुत कियाद। हेज उत्पीड़न, हत्या, बलात्कार, कन्या भ्रूण हत्या, अंग
प्रदर्शन व उनके पिछड़ेपन जैसे तमाम पहलूओं पर सूक्ष्म दृष्टिपात किया।
महिलाओं की व्यथा व उनकी अन्तर्कथा पर खूब बोलीं। कुछ मामलों में तो
उन्होने खुद औरतों को दोषी ठहराया। मसलन कन्या भ्रूण हत्या।

नवीता से उनकी बीमारी की खबर पाकर रूचिका उनके घर की जानिब मुखातिब हुई।
रास्ते भर ढ़ेर सारी कल्पनाओं के तालाब में हिमखण्डों की माफिक उसके जेहन
में तैर रही थीं, उनका व्याख्यान, मृदुस्वभाव, महिलाओं के प्रति तटस्थता
आदि। उनके घर पहुंचते ही वह उनका कोमल स्पर्श देगी। उनका हाथ अपने हाथ
में लेकर पूछेगी, कैसी हैं मैडम? अगर सर दुःख रहा हो तो सहला दूं। अभी
कल्पनाओं का संसार खत्म भी नहीं हुई थी कि डॉ0 वीणा वर्मा का घर आ गया।
अचानक रूचिका की तन्द्र टूटी। आहिस्ता से उसने मैडम का कॉलबेल बजाया।
..... कुछ पल के बाद दरवाजा खुला। एक महिला ने अन्दर से झांक कर पूछा....
कौन? जी मैं... मैडम घर पर हैं? अन्दर आइए, मैडम अभी हास्पिटल में ही
हैं। क्या हुआ है उनको, सोफे पर बैठते हुए रूचिका ने पूछा? महिता सकुचाते
हुए बोली... हुआ क्या है बस, पानी भरा गिलास रूचिका की तरफ बढ़ाते हुए
उसने कहा। रूचिका उसकी तरफ सवालिया नजर से देखती रही। अचानक हकीकत उसके
जुबान से लरज उठी। उनको पहला लड़का है, अब फिा दिन चढ़ गये थे। सोनोग्राफी
में लड़की निकली। और वे सफाई ...। उन्हे इस बार भी बेटा चाहिए था।
पूरी बात सुनकर रूचिका के हाथ से गिलास टूट कर रेजा-रेजा हो गया। गिलास
टूटने के साथ ही मैडम के आदर्शों के प्रति उसकी श्रद्धा भी चकनाचूर हो
गई। आस्था की प्रतिमा यथार्थ से टकराकर बिखर गयी। मुख के भीतर का मुखैटा
नुमाया हो गया। बोझिल कदमों से रूचिका ढ़हते खण्डहर की तरह यथार्थ के रेत
पर मिटते निशान छोड़ते हुए वापस घर चली आयी।

- एम. अफसर खां सागर

Sunday, January 22, 2012

आकांक्षा यादव को मानद डाक्टरेट की उपाधि

      विक्रमशिला हिन्दी विद्यापीठ, भागलपुर, बिहार के सोलहवें महाधिवेशन में युवा कवयित्री, साहित्यकार एवं चर्चित ब्लागर आकांक्षा यादव को मानद डाक्टरेट (विद्यावाचस्पति) की उपाधि से विभूषित किया गया। आकांक्षा यादव को मानद डाक्टरेट की इस उपाधि के लिए उनकी सुदीर्घ हिंदी सेवा, सारस्वत साधना, शैक्षिक प्रदेयों, राष्ट्रीय एवं अन्तराष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं में महनीय शोधपरक लेखन के द्वारा प्राप्त प्रतिष्ठा के आधार पर अधिकृत किया गया। उज्जैन में आयोजित कार्यक्रम में उज्जैन विश्वविद्यालय के कुलपति ने यह उपाधि प्रदान की।

गौरतलब है कि आकांक्षा यादव की रचनाएँ देश-विदेश की शताधिक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से प्रकाशित हो रही हैं। नारी विमर्श, बाल विमर्श एवं सामाजिक सरोकारों सम्बन्धी विमर्श में विशेष रूचि रखने वाली आकांक्षा यादव के लेख, कवितायें और लघुकथाएं जहाँ तमाम संकलनों /पुस्तकों की शोभा बढ़ा रहे हैं, वहीं आपकी तमाम रचनाएँ आकाशवाणी से भी तरंगित हुई हैं। पत्र-पत्रिकाओं के साथ-साथ इंटरनेट पर भी सक्रिय आकांक्षा यादव की रचनाएँ तमाम वेब/ई-पत्रिकाओं और ब्लॉगों पर भी पढ़ी-देखी जा सकती हैं। व्यक्तिगत रूप से ‘शब्द-शिखर’(http://shabdshikhar.blogspot.com) और युगल रूप में ‘बाल-दुनिया’ (http://balduniya.blogspot.com
),‘सप्तरंगी प्रेम’ (http://saptrangiprem.blogspot.com) व ‘उत्सव के रंग’ (http://utsavkerang.blogspot.com) ब्लॉग का संचालन करने वाली आकांक्षा यादव न सिर्फ एक साहित्यकार के रूप में प्रतिष्ठित हैं, बल्कि सक्रिय ब्लागर के रूप में भी उन्होंने अपनी विशिष्ट पहचान बनाई है। ’क्रांति-यज्ञ: 1857-1947 की गाथा‘ पुस्तक का कृष्ण कुमार यादव के साथ संपादन करने वाली आकांक्षा यादव के व्यक्तित्व-कृतित्व पर वरिष्ठ बाल साहित्यकार डा0 राष्ट्रबन्धु ने ‘बाल साहित्य समीक्षा‘ पत्रिका का एक अंक भी विशेषांक रुप में प्रकाशित किया है।

मूलतः उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ और गाजीपुर जनपद की निवासी आकांक्षा यादव वर्तमान में अपने पतिदेव श्री कृष्ण कुमार यादव के साथ अंडमान-निकोबार में रह रही हैं और वहां रहकर भी हिंदी को समृद्ध कर रही हैं। श्री यादव भी हिंदी की युवा पीढ़ी के सशक्त हस्ताक्षर हैं और सम्प्रति अंडमान-निकोबार द्वीप समूह के निदेशक डाक सेवाएँ पद पर पदस्थ हैं। एक रचनाकार के रूप में बात करें तो आकांक्षा यादव ने बहुत ही खुले नजरिये से संवेदना के मानवीय धरातल पर जाकर अपनी रचनाओं का विस्तार किया है। बिना लाग लपेट के सुलभ भाव भंगिमा सहित जीवन के कठोर सत्य उभरें यही आपकी लेखनी की शक्ति है। उनकी रचनाओं में जहाँ जीवंतता है, वहीं उसे सामाजिक संस्कार भी दिया है।

इससे पूर्व भी आकांक्षा यादव को विभिन्न साहित्यिक-सामाजिक संस्थानों द्वारा सम्मानित किया जा चुका है। जिसमें भारतीय दलित साहित्य अकादमी द्वारा ‘वीरांगना सावित्रीबाई फुले फेलोशिप सम्मान‘, राष्ट्रीय राजभाषा पीठ इलाहाबाद द्वारा ’भारती ज्योति’, ‘एस0एम0एस0‘ कविता पर प्रभात प्रकाशन, नई दिल्ली द्वारा पुरस्कार, इन्द्रधनुष साहित्यिक संस्था, बिजनौर द्वारा ‘साहित्य गौरव‘ व ‘काव्य मर्मज्ञ‘, श्री मुकुन्द मुरारी स्मृति साहित्यमाला, कानपुर द्वारा ‘साहित्य श्री सम्मान‘, मथुरा की साहित्यिक-सांस्कृतिक संस्था ‘आसरा‘ द्वारा ‘ब्रज-शिरोमणि‘ सम्मान, मध्यप्रदेश नवलेखन संघ द्वारा ‘साहित्य मनीषी सम्मान‘ व ‘भाषा भारती रत्न‘, छत्तीसगढ़ शिक्षक-साहित्यकार मंच द्वारा ‘साहित्य सेवा सम्मान‘, देवभूमि साहित्यकार मंच, पिथौरागढ़ द्वारा ‘देवभूमि साहित्य रत्न‘, राजेश्वरी प्रकाशन, गुना द्वारा ‘उजास सम्मान‘, ऋचा रचनाकार परिषद, कटनी द्वारा ‘भारत गौरव‘, अभिव्यंजना संस्था, कानपुर द्वारा ‘काव्य-कुमुद‘, ग्वालियर साहित्य एवं कला परिषद द्वारा ‘शब्द माधुरी‘, महिमा प्रकाशन, दुर्ग-छत्तीसगढ द्वारा ’महिमा साहित्य भूषण सम्मान’, अन्तर्राष्ट्रीय पराविद्या शोध संस्था,ठाणे, महाराष्ट्र द्वारा ‘सरस्वती रत्न‘, अन्तज्र्योति सेवा संस्थान गोला-गोकर्णनाथ, खीरी द्वारा ’श्रेष्ठ कवयित्री’ की मानद उपाधि, जीवी प्रकाशन, जालंधर द्वारा ’राष्ट्रीय भाषा रत्न’ इत्यादि शामिल हैं।

विक्रमशिला हिन्दी विद्यापीठ, भागलपुर, बिहार के इस कार्यक्रम में देश के विभिन्न भागों में कार्यरत हिन्दी सेवी संस्थाओं के प्रतिनिधि, विभिन्न विश्वविद्यालयों के विद्वान, शिक्षक-साहित्यकार, पुरातत्वविद्, इतिहासकार, पत्रकार और जन-प्रतिनिधि शामिल थे। उक्त जानकारी विक्रमशिला हिन्दी विद्यापीठ के कुल सचिव डा. देवेंद्र नाथ साह ने दी।

दुर्गविजय सिंह ’दीप’
उपनिदेशक - आकाशवाणी (समाचार)
पोर्टब्लेयर, अंडमान-निकोबार द्वीप समूह

Thursday, January 12, 2012

मेरा हमसफ़र

एक बार फिर कौशल सा'ब का कलाम आपकी आँखों  में सरमाया करना चाहता हूँ क़ुबूल करें .. आपकी दुआओं का तलबगार रहूँगा..

आधा छूटा हुआ जाम
खुली हुई किताब
रिन्दों का साथ
फिर भी अकेला हूँ
याद आती है वो याद
जिनमें  मैं जवाँ हुआ         
क्या कहूं?
उस रात की बात
मेरा हबीब मुझसे जुदा हुआ
वो हसीं लम्हे,
उनकी जुल्फों का साथ
उनके झुमके की खनक
वो बिंदिया  की चमक
अँधेरे में उजाला देने वाली
याद आती है वो याद
जिनमें मैं जवाँ हुआ
क्या करूँ?
कैसे मिटाऊँ उनकी याद
उनका हमसफ़र जो बदल गया 

- कौशल किशोर, कानपुर

http://dilkikashmakash.blogspot.com/
( और गहराई से इनको यहाँ पढ़ा जा सकता है)
 

Tuesday, November 22, 2011

हिना के जैसी सुन्दर थी

वो कितनी प्यारी  प्यारी  थी
कुछ खुशबू सौंधी  सौंधी थी
कुछ हिना के जैसी सुन्दर थी
कुछ गुलशन जैसी महकी थी
कुछ समीर सी चंचल थी
कुछ माखन सी तासीर भी थी
वो कितनी प्यारी प्यारी थी


एक दिल था भोला  भाला सा
जिसमे कितनी गहराई थी
नैना थे बिलकुल हिरनी से
दुनिया की जिनमे परछाईं थी
सीरत तो बिलकुल ऐसी कि  
जैसे खुदा से शोहरत पायी थी
वो कितनी प्यारी प्यारी थी.

जब मुझे देखती थी वो तब
सारी खुशियाँ मिल जाती थी
सोंचा इक दिन मैंने कि
बस उसकी तस्वीर बना डालूँ
पर बन कर जब तैयार हुई
तो अपनी ही बेटी पाई थी.
अब इतना ही बस कहना है
वो कितनी प्यारी प्यारी है.
वो सबसे  प्यारी प्यारी है.
- कौशल किशोर, कानपुर

Saturday, November 12, 2011

तू भी कल प्यार में हो

आज एक और कलम की इबारत आपके हाथों  में सौंप रहा हूँ. कौशल किशोर जो की एक इंजीनियरिंग कॉलेज में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं. उनकी लिखी एक नज़्म कुछ यूँ हैं - 

मत उठा मेरे प्यार पे ऊँगली ऐ शाहिद 
मत करो दूर दो रूंहों को अलग ऐ शाहिद 
हम भी अल्लाह के बन्दे हैं कुछ तो डर ऐ शाहिद 
कहीं ऐसा न हो कि, तू भी कल प्यार में हो 
और बन जाऊं मैं शाहिद 

- कौशल किशोर, कानपुर
( शाहिद एक अरबी लफ्ज़ है जिसका मायने गवाह है ) 

Tuesday, November 1, 2011

आज तक

आज फिर  आपके सुपुर्द आलोक  उपाध्याय "नज़र" के शे'रों को कर रहा हूँ- 

टूटे इकबारगी,  बिखर रहे हैं आज तक 
ज़िन्दगी की क़ैद में मर रहे हैं आज तक 

वो बेबाक़ था, दिल को छलनी  कर गया 
हम दिल की सुराखें भर रहे हैं आजतक 

लोग उम्र काट देते है किसी एक के सहारे
उसी के याद में दिन गुज़र रहे है आजतक 
 
- आलोक  उपाध्याय "नज़र"

Sunday, September 18, 2011

फेसबुक - Facebook

इस पैरोडी का लुत्फ़ उठायें -

मेरे जीने का सहारा फेसबुक
मेरे मरने का सहारा फेसबुक
सुबह हुई फेसबुक
दोपहर हुई फेसबुक
शाम आई फेसबुक
रात होने को है फेसबुक

बत्ती गुल, मोबाईल पे चलता है फेसबुक
कोई नया बन्दा आया दुनिया में
खबर देता है फेसबुक
मरने की घड़ी है
Status अपडेट करता है फेसबुक

पापा ने पूछा 'खाना खा लो"
मम्मी ने कहा- 'बेटा पानी पी लो'
But वो तो Busy  है सिस्टर को दिखाने में फेसबुक

कभी पेज Create करता है
कभी बनता है किसी ग्रुप का Admin 
बस उसे तो मतलब है
Like  और Comments  से
न शादी से न टेंट से
you  Tube  पे जाके करता है
Share  कोई गाना 
नहीं परवाह
सुने चाहे मामा, सुने चाहे नाना

क्लास में है फेसबुक
घर में है फेसबुक
wash  रूम में है फेसबुक
उल- जुलूल फोटो करता है Tag 
चाहे क्लास में भूल जाये अपना Bag 

जानता है-
नज़र भर नहीं देखी उसकी Applications 
फिर भी बार-बार चैक करता है Notifications 
घर भर के Profile  बना डाले उसने
कभी इससे Log  In करता है
कभी उससे Log  In  करता है
पर नज़रों में रहता है बस फेसबुक

कहाँ रही वो ज़मीनी हकीकतें
कहाँ  रहे वो संस्कार
न रहा वो प्रेम
न रहा शाश्वत प्यार 
फेसबुक का इंसान खुश है 
देख कर Virtual  संसार 

- मुहम्मद शाहिद मंसूरी "अजनबी"

Sunday, June 5, 2011

रुंधे हुए गले का जवाब


अपने गुज़रे हुए कल को सोचते- सोचते ऐसी जगह पहुँच गया जहाँ एक नज़्म नमूदार हो गयी। आज वही नज़्म आपके हाथों में सोंप रहा हूँ. आपके प्यार का इंतजार रहेगा -

तंगहाली की वो आइसक्रीम
चन्द
रुपयों के वो तरबूज
किसी गली के नुक्कड़ की वो चाट
सुबह
- सुबह
पूड़ी
और जलेबी की तेरी फरमाइश
मुझे आज भी याद है
कैसे
भूल जाऊं

अम्मी से पहली मुलाकात
और मेरी इज्ज़त रखने के लिए
पहले से खरीदा गया तोहफा
मेरे हाथों में थमाना
ये कहते हुए कि
अम्मी को दे देना
कैसे भूल जाऊं

वो
नेकियों वाली
शबे
बरात कि अजीमुश्शान रात
कहते हैं
हर
दुआ क़ुबूल होती है उस रात
मुहब्बत से मामूर दिल
और
बारगाहे इलाही में
उट्ठे हुए हाथ
हिफाजते
मुहब्बत के लिए
कैसे भूल जाऊं

कैसे
भूल जाऊं
वो पाक माहे रमज़ान
सुबह सादिक का वक़्त
खुद के वक़्त की परवाह किये बगैर
सहरी के लिए मुझको जगाना
दिन भर के इंतज़ार के बाद
वो मुबारक वक्ते अफ्तारी
हर रोज मिरे लिए कुछ मीठा भेजना
कैसे भूल जाऊं

मेरा
वक़्त- बे- वक़्त डांटना
क्यूँ
भेजा था तुमने
कल
से मत भेजना
और वहां से-
वही
मखमली आवाज़ में
रुंधे हुए गले का जवाब
हो सकता है
ये
आखिरी अफ्तारी हो
खा लो शाहिद
मेरे हाथों की बनी हुयी चीजें
जाने
कब ये पराये हो जाएँ
कैसे भूल जाऊं.......

- मुहम्मद शाहिद मंसूरी 'अजनबी"

Friday, April 29, 2011

मेरा साया


कहते हैं नज़्म किसी भी वजह से लिखी जा सकती है कोई इसकी जगह मुक़र्रर नहीं, कोई वक़्त भी तय नहीं। उम्र में सबसे छोटी , इस मंच की कवियत्री और उनकी ये रचना जो उन्होंने सिटी बस में लिखी। आप सुधि पाठकों साथ साझा कर रहा हूँ। आपके प्यार का मुन्तजिर रहूँगा-

न कोई अपना है
न कोई पराया है
जिसके नाम से
ज़िन्दगी शुरू की थी
वो आज इक साया है

भीड़ में ढूँढने गयी थी खुद को
जो बिक गया वो मेरा साया है
छोड़ के आयी जिनको
दुनिया की खातिर
वो आज मुझसे पराया है

खुद को तन्हा छोड़ दिया मैंने
जिसकी खातिर
आज उसी को ख़फा पाया है
क्यूँ ढूंढते हों मुझे
दुनिया के बाज़ार में
मैंने कब से छोड़ दिया

इस अजनबी शहर को
जो अब मुझसे पराया है

- शिखा वर्मा "परी"

Tuesday, April 5, 2011

चक दिए फट्टे


1983 के ऐतहासिक वर्ष के बाद 2011 वर्ष एक बार फिर खेल जगत में अपने देश का परचम लहरा कर साबित किया भारत श्रेष्ठ है। भारतीय किसी भी कम नहीं हैं। विश्व विजेता भारत ने एक शानदार पारी खेलकर हमारा ह्रदय गर्व से ऊंचा कर दिया है। इन सभी खिलाडियों के खेल की दाद देनी पड़ेगी क्रिकेट के खेल के साथ भारत का सीना ऊंचा किया है इन्होने। आईये हम इन्हें बधाई दें मिलके।

२ अप्रैल २०११ के उस ऐतहासिक दिन की याद हमारे दिल से कभी नहीं मिटेगी। ये दिन हमारे ह्रदय में एकता का प्रतीक बनके रहेगा। बड़े- बड़े शहरों की बात हो या फिर गाँव और कस्बों की हर तरफ जीत का परचम लहरा रहा था, हिन्दू ,मुस्लिम, सिख, ईसाई सब आपस में मिलके भारतीय बनके एक धागे में पिरे थे। मेरा कहना है की क्या ये खेल हमारे एक होन का कारन था ? अगर हाँ तो हर दिन एक वर्ल्ड कप होना चाहिए। जिससे सब एकता के उस धागे में बंधे रहें। आईये हम मिल के भारत के भारतीय बनें और प्यार और स्वतंत्रता के उस डोर में बांध जाएँ जो हमेशा से हमारी जरुरत है। आईये कहें-

"भारत हमको जान से प्यारा है

सबसे प्यारा गुलिस्तान हमारा है"

- शिखा वर्मा "परी" , कानपुर

Wednesday, February 16, 2011

संताप


ज़िन्दगी और देश की चिंता से ओत प्रोत कुछ पंक्तियाँ लेकर आज हमारे बीच अशरफ साहब है, जो की पेशे से एक जर्नलिस्ट हैं आप उनकी पंक्तियों पर अपनी गहरी नज़र डालें और अपने प्यार से इन लायनों को नवाजेंआपकी प्रतिक्रियायों का हमें इंतजार रहेगा-

भूख लिखूंगा, प्यास लिखूंगा
जीवन को संताप लिखूंगा !

प्यार के पागलपन में खाया था जो धोखा
उसको क्या विश्वास लिखूंगा ?

जीवन में आये रिश्तों के इस पतझड़ को
कैसे मैं बरसात लिखूंगा ?

महलों में जो रहने वाले, फुटपाथों के दर्द न जाने
हिचकोले खाते इस जीवन को कैसे मधुमास लिखूंगा ?

राम नाम की चादर ओढ़े, चौराहों पर दिखे लुटेरे
कैसे हुई विसंगति यारों, इसको क्या अभिशाप लिखूंगा ?

सड़कों पर है ठोकर खाती, बनी देश पर बोझ जवानी
बदहाली के इस सूरत को, कैसे भला विकास लिखूंगा ?

सम्प्रदाय और क्षेत्रवाद की फसल उगाकर चरने वाले
खून के छींटों, जख्म के चीत्कारों के बल पलने वाले
देश के ऐसे गद्दारों को, गाँधी और सुभाष लिखूंगा ?



- एम अफसर खान, सागर

Tuesday, February 15, 2011

यादों के हवाले से

अभी कल ही प्रेम दिवस बीता , और मुहब्बत की बात किसी ने छेड़ दी. उन चन्द लायनों को आपके साथ बाँटने जा रहा हूँ-

राहो मे चलते कई मुसाफिर मिलते है और फिर मिल के जुदा तो हो जाते है लेकिन अपनी यादो का समां कुछ इस तरह से छोड़ जाते है ..
"मिल के बिछड़ जायेगे फिर मिलेंगे कब
तुम न मिले तो तुम्हारी यादो से खुश हो जायगे
मांग लेना जो चाहो हमसे
चाहे तो हमारी जान,
न मांगना हमसे अपनी यादे
हम जिंदा तो रहेंगे फिर भी मर जायगे"

- रिज़वान इलाही

Wednesday, January 26, 2011

साहित्यिक प्रतियोगिता


ये बड़े हर्ष का विषय है की साहित्य को अब आम आदमी भी समझने की कोशिश कर रहा है। पहले केवल हिंदी वाले (हिंदी वालों से मेरा मतलब हिंदी विधा से सम्बद्ध) ही साहित्य में रूचि लेते थे। आज एकअच्छा खासा वर्ग है जो की , इंजीनियरिंग और मेडिकल से वास्ता रखता है और हिंदी से बखूबी जुड़ा हुआ है पिछ्हले दिनों मेरी तोमर साहब से मुलाकात हुई। उन्होंने बताया सारथि इंटरटेनमेंट, A2Z news channel, The Mind & Memory - Study Circle, Kumar Academy, के सहयोग से प्रथम वार्षिक युवा साहित्यकार प्रतियोगिता आयोजित की जा रही है। कहानी, कविता, हास्य कविता, गीत, व्यंग्य लेख , निबंध/आलेख लिखने में रूचि रखने वालों की रचनाएँ आमंत्रित कर रहा है। मैं बात को यहाँ वहां न घुमा कर सीधे नियम व शर्तें दर्ज कर रहा हूँ। साथ में संपर्क सूत्र भी दिए जा रहे हैं।


  • उपरोक्त वर्णित छहों कैटेगरी में प्रथम, दुतीये, त्रितिये तथा दो सांत्वना , कुल पांच - पांच पुरुस्कार प्रस्तावित हैं।

  • एक प्रविष्टि में केवल एक गद्य रचना अथवा तीन काव्य रचनाएँ ही स्वीकार्य होंगी।

  • एक रचनाकार केवल एकं कैटेगरी अपनी प्रविष्ट नि: शुल्क भेज सकता है। किन्तु एक से अधिक या उसी कैटेगरी में अतिरिक्त प्रविष्टि हेतु प्रति प्रविष्टि शुल्क रूपए सौ देय होगा।

  • रचनाएँ पूरी तरह मौलिक तथा अप्रकाशित होनी चाहिए। इस सम्बन्ध में रचनाकार को स्वं हस्ताक्षरित घोषणा पत्र संलग्न करना होगा।

  • रचनाएँ तीन प्रतियों में सुपाठ्य स्वं के छाया चित्र व जीवन वृत सहित एक लिफाफे में बंद कर स्वं अथवा डाक , कोरियर द्वारा निम्न पते पर भेजें। कुमार अकेडमी ११०/ २०१ आर के नगर गुमटी गुरुद्वारा के पास जी टी रोड कानपुर -२०८०१२

  • रचनाकार की आयु १ जनवरी २०११ को ३५ वर्ष से अधिक नहीं होनी चाहिए।

  • पुरुस्कृत रचनाकारों सहित अन्य चुने हुए स्तारिये व अच्छे रचनाकारों ko सारथी इंटरटेनमेंट के सौजन्य से सेटेलाईट नेशनल न्यूज़ चैनल A2Z ( देखे BIG DTH- 425) पर रचनापाठ का अवसर दिया जायेगा।

  • निर्णायक मंडल का निर्णय अंतिम तथा मान्य होगा।

  • रचनाएँ जमा करने की अंतिम तारीख ३१ जनवरी २०११ है।

  • पुरुस्कार वितरण ८ फ़रवरी २०११

  • आप मेल भी कर सकते हैं नई कलम के मंच के माध्यम से - nai.qalam@gmail.com

प्रस्तुति -

मुहम्मद शाहिद मंसूरी "अजनबी"

Friday, December 31, 2010

कह दो पापा "बहादुर बच्चे"


ये कविता मेरे पिता के लिए है जिन्होंने इस महीने की 11 तारिख को दुनिया छोड़ दी!

वो छोड़ गए अपनी यादें
वो छोड़ गए अपनी बातें
उनका अहसास है अब तो मेरे साथ
क्यों रूठ गए हैं आप आज
इतना
कि मनाना भी अब नहीं कम आएगा

आसमान में तारा बनके क्या देख रहे हैं आप
आपके बच्चे बुलाते हैं आपको
पापा
जाईये एक बार
कि
हम
एक बार आपसे कह लें
अपने
दिल कि बात

आपके बिना अधूरा है जीवन
माँ कि आँखें ढूंढती हें आपको
जाओ पापा
फिर भले ही रूठ जाना यहाँ आके
एक
बार कह दो पापा "बहादुर बच्चे"
फिर नहीं चाहिए किसी का साथ

होगी
मुलाकात आपसे
किसी
किसी रूप में
ये
अहसास है हमको हम इंतज़ार करेंगे
उस
पल का जब तक हमारी आँखें
आपका
रास्ता ताकती रहेंगी !!

- शिखा वर्मा "परी" , कानपुर
(कवियत्री इंजीनियरिंग के दूसरे वर्ष में अध्यनरत हैं )

Monday, December 20, 2010

पापा मेरे पापा


इस मंच की कवियत्री शिखा वर्मा "परी" ने अपना ग़म साझा किया हमारे साथ, वो ग़म मैं अपने पाठकों के साथ साझा कर रहा हूँ-

"धूप सी जमी है मेरी साँसों में, कोई चाँद को बुलाये तो रात हों" मुझे नहीं मालूम था कि इतना मजबूर कर देगा मुझे मेरा जीवन कि अपने हाथों से अपने पिता कि चिता को आग दूँगी और अपनी माँ से कहूँगी कि मैं तो जश्न में गयी थी।(जिस दिन पापा हम सब को छोड़ के गए उसी दिन मम्मी को , सात दिन अस्पताल में आई .सी. यूं. चेंबर में रहने के बाद छुट्टी मिली थी, और अब तक वो अपने पूरे होशो हवाश में नहीं हैं वो दिमाग की इक बीमारी से पीड़ित हैं और डॉक्टर ने मना किया है उनको इस घटना के बारे में बताने को )
पिता को खोने का ग़म करूँ या माँ को पाने का अहसास पता नहीं ये कौन सी परीक्षा है मेरी, आज पापा की कमी महसूस होती है जब जेब से पैसे निकल के कॉलेज भाग जाया करती थी, अपने जन्मदिन पर नया लेपटोप की जिद की थी। अपना मनपसंद भोजन बनवाने का मन होता था,पापा के साथ शान से गाड़ी में घूमती थी। और पूछती थी- "ये कौन सी जगह है पापा? " पुराने गाने पापा के साथ गुनगुनाते थे, उनके "कालू" कहने पर रूठ जाया करते थे और मन ही मन हँसते थे। वाकई पिता की याद को भुला पाना पानी में आग जलने का काम है।

11 दिसंबर 2010 मैंने अपने पिता को खो दिया, उनके हाथों का साया मेरे सर से हट गया। पापा की कमी का अंदाजा कोई लगा नहीं सकता, उनका प्यार से कहना "सूतू मेरा" कैसे भूल जाऊँ ? उनकी डांट, उनका प्यार, उंसी हिम्मत, पापा की हर एक बात मुझे अपनी सांस के साथ आती है। 21 वर्ष में अपने पापा को खो दिया मैंने, ऐसा ईश्वर ने मेरे साथ क्यूं किया? इस सवाल का जवाब ढूंढ रही हूँ मैं, मुश्किल है जवाब मिलना पर फिर भी उम्मीद है कि शायद किसी न किसी दिन जवाब मिलेगा।

मैं ज़िन्दगी का साथ निभाता चला गया, हर फिक्र को धुंए में उड़ाता चला गया, बरबादियों का सोग मानना फिजूल था, बरबादियों का जश्न मनाता चला गया।

- शिखा वर्मा "परी"
( लेखिका इंजीनियरिंग के दूसरे वर्ष में अध्यनरत हैं )

17th dec 2010.

Friday, December 17, 2010

इक तमन्ना


कहते हैं की मुहब्बत में बड़ी ताक़त होती है , मुहब्बत क्या करा दे, पिछले दिनों ऐसे ही इक जनाब से मुलाकात हों गयीनयी ज़िन्दगी के कुछ नए तजुर्बे, मुहब्बत की शक्ल में नमूदार कर दिएआज ऐसी ही इक नयी कलम से आपका तारुफ़ करा रहा हूँहाई इस्कूल में अध्यनरत छोटी सी उम्र और उम्र से बड़े अल्फाज़ लिए वो हमारे बीच में, आईये लुत्फ़ लें नज़्म का-

रो रहा है ये दिल, आज तुमको रुला के
कैसे चुप करूँ आज, तुमको मना के
शायद ये ज़िन्दगी, भरी है गलतियों से आज
तुम भी मान जाओ हमें अपना बना के
इस दिल की तमन्ना सुन सको
तो सुन लो
ये ज़िन्दगी है तुम्हारी
बस इतना समझ लो
हमने भी गलतियाँ की हैं इक इंसान की तरह
तुम भी हमें माफ़ कर दो भगवान की तरह
ये दोस्त खड़ा है
तुम्हें अपना बनाने को
तुम भी पास जाओ इसे गले लगाने को
अब लौट आओ - लौट आओ
फिर इस ज़िन्दगी में
इक नयी दोस्ती की शुरुआत करते हैं
तुम मुझे याद करो
हम तुम्हें याद करते हैं.........

- अभिषेक जायसवाल

Monday, November 29, 2010

उल्‍टे अक्षरों से लिख दी भागवत गीता




मिरर इमेज शैली में कई किताब लिख चुके हैं पीयूष :
आप इस भाषा को देखेंगे तो एकबारगी भौचक्‍क रह जायेंगे. आपको समझ में नहीं आयेगा कि यह किताब किस भाषा शैली में लिखी हुई है. पर आप ज्‍यों ही शीशे के सामने पहुंचेंगे तो यह किताब खुद-ब-खुद बोलने लगेगी. सारे अक्षर सीधे नजर आयेंगे. इस मिरर इमेज किताब को दादरी में रहने वाले पीयूष ने लिखा है. इस तरह के अनोखे लेखन में माहिर पीयूष की यह कला एशिया बुक ऑफ वर्ल्‍ड रिकार्ड में भी दर्ज है. मिलनसार पीयूष मिरर इमेज की भाषा शैली में कई किताबें लिख चुके हैं.
उनकी पहली किताब भागवद गीता थी. जिसके सभी अठारह अध्‍यायों को इन्‍होंने मिरर इमेज शैली में लिखा. इसके अलावा दुर्गा सप्‍त, सती छंद भी मिरर इमेज हिन्‍दी और अंग्रेजी में लिखा है. सुंदरकांड भी अवधी भाषा शैली में लिखा है. संस्‍कृत में भी आरती संग्रह लिखा है. मिरर इमेज शैली में हिन्‍दी-अंग्रेजी और संस्‍कृत सभी पर पीयूष की बराबर पकड़ है. 10 फरवरी 1967 में जन्‍में पीयूष बहुमुखी प्रतिभा के धनी हैं।


डिप्‍लोमा इंजीनियर पीयूष को गणित में भी महारत हासिल है. इन्‍होंने बीज गणित को बेस बनाकर एक किताब 'गणित एक अध्‍ययन' भी लिखी है. जिसमें उन्‍होंने पास्‍कल समीकरण पर एक नया समीकरण पेश किया है. पीयूष बतातें हैं कि पास्‍कल एक अनोखा तथा संपूर्ण त्रिभुज है. इसके अलावा एपी अधिकार एगंल और कई तरह के प्रमेय शामिल हैं. पीयूष कार्टूनिस्‍ट भी हैं. उन्‍हें कार्टून बनाने का भी बहुत शौक है।
09654271007

Sunday, November 14, 2010

शायराना क़ज़ा


एक लम्बे अरसे के बाद आप सुधि पाठकों से मुखातिब हों रहा हूँवक़्त भी क्या चीज है, पंख लगा के दौड़ती चली जाती है, और हम पकड़ने की नाकाम कोशिश करते रहते हैंखैर! आज आपको "नई -कलम"के मंच पर एक और उभरते हस्ताक्षर से रूबरू करा रहा हूँपेशे से सोफ्टवेयर मैं कार्यरत "ऐश्वर्य" साहब से मुखातिब करा रहा हूँऔर उनकी नज़्म का आप लोग लुत्फ़ उठायें, आप सब से एक गुजारिश जरुर करूँगा, अपनी प्रतिक्रियाएं जरुर जाहिर करेंताकि कवि की हौसला अफजाई हों और साहित्य को और अच्छा साहित्य हासिल हों सके, नज़्म आपके सुपुर्द कर रहा हूँ-

मैं तुम्हें भूल गया हूँ
या
यूँ कहूँ कि तुम्हें याद ही नहीं करता
जाने क्यूँ दिल ही नहीं करता

तुमने भी कोशिश की होगी भूल जाने की मुझे,
याद
आने की मुझे तुम्हारी कोशिश साकार कर रहा हूँ
तुम्हें
भूल कर, तुम्हें प्यार कर रहा हूँ

अब तो रातों में बेचैनी नहीं होती दिन में ख्याल आता है
जिसे याद कर कोई नज़्म लिखूं
कोई शेर बने , कोई ग़ज़ल कहूँ
तुम भी तो रातों में तड़पे होगे
किसी
यतीम मंजिल पे पड़े होगे

जहाँ मैं बस्ता हूँगा, ख्याल बनके तुम बहते होगे हवाओं से
और
हमारे बेनाम मरासिम को ये काफ़िर दुनिया शायराना फिजा कहेगी
अब
तो उम्र भी गुजर गयी, रोज की आदतों की तरह
फिर एक दिन गुजर गया, रोज के रास्तों की तरह

तुम्हें भी याद किया, खुद की साँसों की तरह
फिर
भी जिंदा हूँ, रहता हूँ इस कायनात में
ये तुम्हारी ही तो दुआ थी, जिसने जिंदा रखा मुझे
ये
तुम्हारी ही तो जुदाई थी,
जिसने
बरसों पहले इस रूह को शायराना क़ज़ा दी थी!!!!

- ऐश्वर्य