नई क़लम - उभरते हस्ताक्षर
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आलोक उपाध्याय "नज़र"
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आलोक उपाध्याय "नज़र"
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Sunday, March 4, 2012
दरिया होके समंदर की अदा रखता है
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वो रूह में मोती जुल्फों में हवा रखता है दरिया होके समंदर की अदा रखता है दिल में रखके मोहब्बत की रौशनी क्यूँ निगाहों में अदावत की ज़फ़...
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Tuesday, November 1, 2011
आज तक
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आज फिर आपके सुपुर्द आलोक उपाध्याय "नज़र" के शे'रों को कर रहा हूँ- टूटे इकबारगी, बिखर रहे हैं आज तक ज़िन्दगी की क़...
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Friday, May 7, 2010
तुम आने वाले हों शायद
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बहुत दिनों से आलोक उपाध्याय " नज़र " साहब को पढने का मौका नहीं मिल पा रहा था , आज इक नई रचना के साथ हमारे ...
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Friday, February 27, 2009
ग़ज़ल
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हमारी तकनीकी टीम के सदस्य आलोक उपाध्याय "नज़र" की ग़ज़ल का लुत्फ़ उठायें कभी सहरा सा लगे कभी समन्दर सा लगे मुझे अच्छा लगे जब भी...
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Monday, February 16, 2009
ग़ज़ल
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सुबह उठकर हमने यही हर बार देखा है हर तरफ़ बस फिक्र -ऐ रोज़गार देखा है पिछली शब् की बस इतना सी दास्ताँ है बिस्तर की सिलवटों को बेकरार द...
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