नई क़लम - उभरते हस्ताक्षर
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Sunday, December 8, 2019
कविता -अमित अकबरपुरी
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जीवन का सत्य मरण में है बाक़ी सब कुछ विचरण में है , जो उदय हुआ वो अस्त भी है पागल मानव तो व्यस्त ही है एक हवा भी आएगी इक दिन ले...
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Sunday, June 19, 2016
'' अब्बा होना हंसी खेल नहीं है ''
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अब्बा , आज इतने सालो के बाद आपके अब्बापन के बारे में सोचता हूँ तो दांतों तले ऊँगली दबा लेता हूँ / वाकई अब्बा होना हंसी खेल नहीं है / आपन...
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Saturday, June 13, 2009
मुझसे पूँछेगा खुदा
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मुझसे पूँछेगा खुदा, क्या किया तुमने जमीं पे जाके, आदमी का तन पाके। मैं तुझमे ढूंढता रहा जगह अपनी, और तू खुश था, मुझे पत्थरों में ठहरा के। अप...
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Tuesday, May 26, 2009
मोक्ष
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परिक्रमा करते थे प्रश्न, अँधेरे मन के कोटर के, उत्तर कोई निकले सार्थक, जिसको हथिया के प्राप्त करुँ, विचलित ह्रदय संतृप्त करुँ। किस राह को मै...
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Wednesday, April 8, 2009
जूता खींच के मारो भइया
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शब्दों के माध्यम से सीधी चोट करने में माहिर, "नई कलम" के जाने पहचाने चेहरे को आपके समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूँ । आज के व्यंग्य के ...
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