नई क़लम - उभरते हस्ताक्षर
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जतिंदर 'परवाज़'
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जतिंदर 'परवाज़'
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Thursday, October 1, 2009
ग़ज़ल
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शजर पर एक ही पत्ता बचा है हवा की आँख में चुभने लगा है , नदी दम तोड़ बैठी तषनगी से समंदर बारिशों में भीगता है, कभी जुगनू कभी तितली ...
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Wednesday, September 16, 2009
ग़ज़ल
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ज़रा सी देर में दिलकश नजारा डूब जायेगा ये सूरज देखना सारे का सारा डूब जायेगा नजाने फिर भी क्यों साहिल पे तेरा नाम लिखते हैं हमें मालूम है इक...
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Wednesday, August 26, 2009
ग़ज़ल
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आँखें पलकें गाल भिगोना ठीक नहीं छोटी-मोटी बात पे रोना ठीक नहीं गुमसुम तन्हा क्यों बैठे हो सब पूछें इतना भी संज़ीदा होना ठीक नहीं कुछ औ...
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Wednesday, August 19, 2009
गुमसम तनहा बैठा होगा...
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बहुत ही सरल तरीके से सीधे दिल में उतर जाने वाली बात कहने वाले मुखर कवि जतिंदर 'परवाज़' का नई कलम पर आगाज़ देखिये- गुमसम तनहा बैठा...
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