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Thursday, July 8, 2010

ग़ज़ल

करीब तीस साल पहले रची गयी रचना आपके साथ साझा कर रहा हूँ।

जब भी बहती है हवा उनके दामन की
याद आती हैं मुझे बहार सावन की

नहीं है कोई गिला तेरी बेवफाई का
तीस उठती है मगर मेरे दिल में जलन की

कब से क़दमों में तेरे नज़रें बिछी हैं
कभी तो होगी इधर बहार गुलशन की

उम्र गुजरी है मेरी अश्कों के भंवर में
रंजो ग़म से सिली है पैराहन मेरे कफ़न की

जाम अब तोड़ दिया मेरी नज़र ने
ये खुमारी है तेरे वडा कुहन की

इस क़दर उन पे "जलील" शबाब छाया है
हर कली है पशेमां इस दुनियाए चमन की
- अब्दुल जलील

Sunday, January 3, 2010

ग़ज़ल


दिल में याद लिए तेरी बैठा हूँ मैं
फ़क़त तसव्वुर में तेरे दुनिया भुलाये बैठा हूँ मैं

खंजर सी तेरी नज़रें वो हुस्न कातिलाना
अंजामे वफ़ा के जख्म लिए बैठा हूँ मैं

इक तबस्सुम की खातिर सौ जिल्लतें सही हैं
उजड़े हुए गुलशन में ख़ार लिए बैठा हूँ मैं

तेरे हुस्न मुजस्सिम को मैं अब कहाँ छिपाऊं
शबे हिज्राँ में दिल चाक किये बैठा हूँ मैं

रहमत का तेरी साइल मगर मुफलिस नहीं हूँ मैं
टूटे हुए पलकों के गौहर लिए बैठा हूँ मैं

कश्ती को पार कर दे ऐ नाखुदा तू मेरी
अताए ग़म का समंदर लिए बैठा हूँ मैं

कहीं शिर्क हों न जाए ऐ आरजुए परस्तिश
तस्वीर तेरी दिल में सजाये बैठा हूँ मैं

कोई उनसे जाके कह दे ये हाले दिल "जलील"
सब कुछ लुटा बर्बाद हुए बैठा हूँ मैं


- अब्दुल जलील