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Monday, December 22, 2014

मुझे बहुत कुछ कहना है.

मन की बात :-

हमारे भारतीय परिवेश में लड़कियों के लिए शादियाँ किसी जुए से कम नहीं होती. अधिकतर तो हार ही जाती हैं ये जुआ, बाकी बची हुई जीत के मुगालते में ख़ुशी ख़ुशी जिंदगियां निकाल लेती हैं. शादी का अमूमन अर्थ हमारे यहाँ लड़की नाम की बूँद का पति और उसके परिवार वालों रूपी महासागर में विलय हो जाना ही है. जिसे आसान शब्दों में कहा जाए तो खुद का अस्तित्व खोना. एक फला-फूला वृक्ष जड़ों समेत उखाड़ कर किसी और आँगन में प्रतिरोपित करने का ये सिस्टम कई बार समझ से बाहर होता है.

ख़ास तौर से तब जब ना पनपने की सूरत में कोई और आँगन ढूँढने का या पुराने गुलशन में लौट आने का विकल्प उसके पास उपलब्ध ना हो. ऐसे किसी विकल्प के बारे में सोचना भी लड़कियों के लिए चारित्रिक हमले को न्यौता देने के बराबर है. कुल मिला कर हमारी सामाजिक मशीनरी का एक एक पुर्जा इस बात पर दृढ-प्रतिज्ञ दिखाई देता है कि लड़कियां अपना अस्तित्व मिटा कर किसी और जूते में अपने पैर फिट कर लें. इस अपेक्षा से इतनी ज्यादा चिढ़ नहीं होती बशर्ते कि उम्मीदों का ये ट्रैफिक एकतरफा ना होता.

 खैर, फिलहाल तो इस समस्या का ( जिसे समस्या ना मानना भी एक बड़ी समस्या है ) कोई हल दिखाई नहीं देता. कोई अल्टरनेटिव नहीं होने की वजह से इसे चुपचाप कबूलने के सिवा और कोई चारा नहीं. कई लोगों को मेरी ये बातें बेहद अजीब, डिप्रेसिंग और गैर-जरुरी लग रही होंगी. ख़ास तौर से तब जब एक हफ्ते बाद मेरी खुद की शादी है. लेकिन जहाँ तक मैं समझती हूँ अपनी बात कहने के लिए मेरे पास ये शायद आखिरी मौका है. अभी नहीं कहा तो शायद कभी नहीं कह पाउंगी. आप सब लोगों ने मेरी बातें अब तक बेहद संजीदगी से सुनी हैं. एक आखिरी बार मैं चाहती हूँ कि आप तवज्जों से मुझे सुनें. लम्बा या बोरिंग लगे तब भी.

मुझे बहुत कुछ कहना है.

मैं शुरू से शुरू करती हूँ. दो साल हुए मुझे फेसबुक पर. मेरी ज़िन्दगी को बेहद आसानी से दो भागों में बांटा जा सकता है. एक वो तेईस साल जो मैंने शिक्षा के लिए परिवार वालों से लड़ते भिड़ते, किताबों से ज़बरन उन्सियत बनाते और दुनिया को समझने की नाकाम कोशिशें करते हुए गुजारें. और दूसरी तरफ वो दो साल जो इस चेहरे की किताब पर आ कर खुद को डिस्कवर करते, अपने मूल्यों के प्रति संजीदा होते और सही-गलत को उनकी प्रचलित परिभाषाओं के परे जा कर समझते हुए बिताये.

एक रुढ़िवादी मुस्लिम परिवार में जन्म लेने के कारण लोगों से मेलजोल पे लगी पाबंदियों के बीच जीते हुए कभी मौका ही नहीं मिला ये समझने का कि इस दुनिया का आम आदमी किस तरह सोचता है. इस मामले में ये फेसबुक बेहद क्रांतिकारी टूल साबित हुआ मेरे लिए. इस की सबसे बड़ी खासियत यही है कि अमूमन लोगों की थॉट-प्रोसेस यहाँ स्पष्ट रूप से नज़र में आ जाती है.

और इसी वजह से अपने आसपास के समाज का एक कलेक्टिव जजमेंट आसानी से हासिल हो जाता है. शुरू शुरू में सिर्फ नज्में/ग़ज़लें शेयर करने में व्यस्त रहा करती थी मैं. फिर मित्र अवनीश कुमार जी के कहने पर खुद भी कुछ लिखना शुरू किया. अपना लिखा पसंद करते लोग देख कर सुखद हैरानी होती थी कि क्या मुझे सच में ही लिखना आता है ? अब तक मैं सिर्फ एक पाठक रही थी. कलम पकड़ने का तजुर्बा नया था. लेकिन जब सिलसिला शुरू किया तो रुकी ही नहीं. आप सब ने कदम कदम पर हौसला-अफजाई की. तारीफ़ में पीठ ठोंकी तो गलतियों पर चेताया भी. आहिस्ता आहिस्ता आप सब की नज़रों में मेरा वजूद आकार लेता चला गया. Nobody से Somebody तक के इस सफ़र में बेशुमार नये रिश्तें मिलें. बेहद अनमोल.

फिल्में, किताबें, धर्म, राजनीति हर विषय पर मैंने जी भर के लिखा. सार्थक था या नहीं पता नहीं लेकिन आप सबने खूब पसंद किया. मुझे इस एहसास से लबालब भर दिया आप लोगों ने कि मुझे भी कुछ आता है. मैं इस दुनिया की भीड़ बढाने वाली एक नग मात्र नहीं हूँ. बल्कि मेरा भी एक वजूद है. जिसका एहतराम किया जाता है. जब सरासर अनजान लोग मेरे इनबॉक्स में आ कर मुझ से मशवरा मांगते हैं कि दीदी मुझे क्या करना चाहिए तो मुझे हैरानी होती है अपने दोहरे व्यक्तित्व पर. ये ज़ारा उस ज़ारा से कितनी अलग है जिसकी राय को एहतराम देना तो दूर कोई पूछना भी जरुरी नहीं समझता असली दुनिया में. बेहद परेशान करता रहा है ये सवाल मुझे कि क्या मेरे अन्दर सचमुच वो काबिलियत है कि लोग अपनी परेशानियों को मुझ से शेयर करें और मेरी राय मांगे. अगर हाँ तो मैं अपनी इस सलाहियत से अपने परिवार को क्यूँ नहीं मुतमईन कर पाईं कभी ?

आपमें से कुछ एक ख़ास मित्रों को छोड़ कर बाकी किसी को नहीं पता होगा कि मैंने सिर्फ बीए तक की पढ़ाई की है. वो भी प्राइवेट. कॉलेज की शक्ल नहीं देखी कभी. एक अदद इन्टरनेट कनेक्शन लगवाने के लिए मुझे जितना संघर्ष करना पड़ा उसकी मिसाल दूसरी न होगी. ज़माने भर में मशहूर ज़ारा के खुद के परिवार वालों को इस बात की भनक भी नहीं है कि उनकी बेटी फेसबुक जैसी सोशल साईट पर है और इतने ज़बरदस्त तरीके से है. और लग जाने पर नतीजा सुखद किसी हाल में नहीं निकलेगा. यही वजह रही कि मेरी वाल पर प्रोफाइल पिक्चर वाला आयताकार टुकड़ा मेरी शक्ल के लिए हमेशा ही तरसता रहा. यही वजह है कि मेरी शादी की ख़ुशी में मुझे गिफ्ट्स देने के लिए बेकरार आत्मीय जनों को मैं अपना पता तक नहीं बता सकी. क्यूँ कि इस ‘ज़ारा खान’ को अपने परिवार के सामने एक्सप्लेन करना नामुमकिन है मेरे लिए. ना सिर्फ नामुमकीन है बल्कि घातक भी. आप सब लोग समझदार हो. अनकही बातें समझ जाने की काबिलियत आपमें यकीनन होगी.

खुद को परदे में रखने की अपनी इस मजबूरी के चलते मुझे कई बार बेहद शर्मिंदगी भी उठानी पड़ी. हमारे फेसबुक पर ये चलन आम है कि गाहे-बगाहे लोगों को फेक घोषित करते रहना. इस राय-शुमारी की चपेट में मैं कई बार आई. विदेश में रहते और एनजीओ के बिजनेस में दखल रखते एक मशहूर कामरेड साहब ने सब से पहले मुझे फेक कहा और मेरे तमाम सवालों को वो इस एक इलज़ाम के आड़ में डक करतें गए. फिर उसके बाद गाहे बगाहे कई जगहों पर मेरी प्रोफाइल का लिंक चेंपते रहे. ऐसे ही एक बार एक महिला की वाल पर जारी ऐसे ही डिस्कशन के बीच मेरी लिस्ट में शामिल Santosh Singh सर ने उनसे वो सवाल पूछ लिया जो मेरी जुबान पर हमेशा रहा करता था. वो ये कि नफरत भरें पोस्ट्स लिखने के लिए, धार्मिक उन्माद फैलाने के लिए या किसी राजनीतिक विचारधारा के अंध समर्थन के लिए तो फेक अकाउंट का औचित्य समझ में आता है लेकिन सार्थक लिखने के लिए क्यूँ ? उस एक सवाल के लिए मैं संतोष सर की कितनी एहसानमंद हूँ ये मैंने उन्हें आज तक नहीं बताया. आज बता रही हूँ. क्यूँ कि आज नहीं बताउंगी तो ये बात मेरे साथ ही चली जायेगी. शुक्रिया संतोष सर, एक निहायत ही सेंसिबल सवाल करने के लिए. खैर, इस तरह का ये एकाध ही हादसा हुआ हो ऐसी बात भी नहीं है.

एक और दिल दुखाने वाले घटनाक्रम में मेरे वजूद को मानने से उस शख्स ने इंकार कर दिया जो शुरूआती दिनों से मुझ से परिचित था और इनबॉक्स में मुझ से घंटों बतियाता था. मैंने उसे भी हलाहल समझ के पी लिया. इस तरह की सब से बड़ी और आत्मविश्वास को चकनाचूर करने वाली घटना तब हुई जब एक बेहद ही मशहूर वाल पर मेरे नाम से पोस्ट डाली गई और बाकायदा मेरे वजूद के चिथड़े उड़ायें गए. ना सिर्फ उन्होंने बल्कि उनके दर्जनों समर्थकों ने बिना मुझे जाने-पहचाने बेहद शानदार शब्दों में मेरी इज्जत-अफजाई की. ये बात अलग है कि उसके

फ़ौरन बाद उनमें से कईयों ने मुझे रिक्वेस्ट भेजी जिसे कि मैंने स्वीकार भी कर लिया. वो रात बेहद ही भयानक थी मेरे लिए. एक पल को आँख न लगी. फेसबुक छोड़ देने का पक्का निर्णय कर लिया था उस रात. लेकिन सुबह फेसबुक खोलने पर कुछ अज़ीम हस्तियों ने मेरी बेहद दिलजोई की. बहुत सी बातें समझाई. ना जाने का आग्रह किया. और मैं बनी रही. यहाँ ये कहना बेहद जरुरी है कि उन जनाब से आगे मेरे रिश्ते बेहद अच्छे हो गए और उस प्रलयंकारी पोस्ट की कडवाहट का नामोनिशान नहीं रहा. जिसकी मुझे बहुत ख़ुशी है.
हमारे रुढ़िवादी समाज और धार्मिक कट्टरता का शिकार मैं कई बार मजहबी पाबंदियों के प्रति तल्ख़ हुई तो इसकी वजह मेरा भोगा हुआ यथार्थ ही था. एक संकीर्ण मानसिकता से मेरा हुआ नुकसान मुझे मुखरता से लिखने के लिए जैसे उकसाता था. फिर भी मैंने भरसक कोशिश की कि मेरा लेखन महज़ कोसाई का नमूना ही बन कर ना रह जाए.

मैंने कोशिश की कि नकारात्मकता से पॉजिटिविटी की तरफ के सफ़र की मैं फ्लैग बियरर बनूँ. यहाँ ये सब लिखने के पीछे मेरा मकसद ये कतई नहीं है कि मैं अपने आप को पीड़ित घोषित कर के हमदर्दियां बटोरूँ. बल्कि मुझे सच में लगता है कि लड़कियों के सपनों की हत्या हमारे समाज के ब्लड सिस्टम में घुला एक बेहद खतरनाक वायरस है. बेहद सामान्य बात है ये. और इसका सामान्य होना ही इसका सब से भयावह पक्ष है. रिवाज ही नहीं है हमारे यहाँ ये मानने का कि लडकियां लड़कों जितनी ही काबिल हो सकती हैं या संसाधनों पर, अपनी दुनिया खुद बनाने के लिए जरुरी मौकों पर उनका भी समान अधिकार है. ऐसा क्यूँ है मैं नहीं जानती. लेकिन ऐसा है इससे शायद ही कोई इनकार करने का साहस करे. हाँ, अपवाद हर जगह होते हैं. यहाँ भी हैं. लेकिन मैं एक बड़े वर्ग की बात कर रही हूँ. ख़ास तौर से मेरे अपने मजहब की लड़कियों की.

मेरा दिल लरज़ता है ये देख देख कर कि ज्यादातर मुस्लिम लड़कियों की जिंदगियां सूट का कलर डिस्कस करने में, मेकअप की फ़िक्र में या शादी की अनिश्चितता की सूली पर लटके लटके ही ख़त्म हुई जा रही है. सामयिक राजनीति, देश-दुनिया इन के बारे में उनकी जानकारी जीरो है. दुनिया के महान लोकतंत्र कहलाने वाले हमारे मुल्क का एक बड़ा तबका इसकी निर्माण प्रक्रिया में शामिल तो क्या इससे वाकिफ भी नहीं है. हम इतिहास पर लड़ते भिड़ते रहते हैं. हमारा वर्तमान कितनी सियाह कालिखें अपने चेहरे पर पोते बैठा है इसकी हमें परवाह ही नहीं. ये ऐसा क्यूँ है ये मैं नहीं जानती. इसे कैसे बदला जाएगा इसका भी मुझे दूर दूर तक कोई इमकान नहीं. लेकिन ये गलत है ऐसा मेरा दृढ विश्वास है. बल्कि गलत नहीं गुनाह है.

अब मेरी शादी हो रही है. हमारा समाज बेटियों के मुकाबले बहुओं के लिए कितना सहनशील है ये मुझे अलग से बताने की जरुरत नहीं. और इसीलिए मुझे गारंटी है कि मेरे फेसबूकिया जीवन का ये अंत है. मुझसे कई लोगों ने ये सवाल किया कि इस दुश्चक्र से निकलना इतना मुश्किल क्यूँ है तुम्हारे लिए ? ख़ास तौर से तब जब फेसबुक के माध्यम से मदद करने वाले इतने हाथ उपलब्ध है ? मेरा जवाब ये है कि मैं जानती हूँ के लोगों के ज़हनों को जकड चुकी सामाजिक सीमायें और मजहबी कट्टरता जब अपनी औकात पर उतरती है तो सर्वनाश पर उतारू हो जाती हैं. और मैं खुद को दाँव पर लगाने का हौसला तो कर सकती हूँ लेकिन अपने कुछ गिने चुने आत्मीय जनों के लिए जानलेवा दुश्वारी खड़ी करना मेरे लिए असंभव है. वैसे भी ये सिर्फ एक ज़ारा की बात नहीं है. सिर्फ एक ज़ारा की बेहतरी के लिए शायद हम कुछ कर भी लें लेकिन उन हज़ारों लाखों जाराओं का क्या जिनके सपनों का खून करने के हम आप सब गुनाहगार हैं और फिर भी बेशर्मी से जिए जाते हैं. पाश कहा करते थे कि सब से खतरनाक है सपनों का मर जाना.

इस हिसाब से देखा जाए तो हमारा समाज वक्त से पहले क़त्ल कर दिए गए ऐसे सपनों की विशाल कब्रगाह है. वैसे मुझे यकीन है भारत महान क़यामत के दिन तक स्त्री को देवी मानने की अपनी महान परंपरा का निर्वाहन करता रहेगा. दिल में गुबार लिए मैं सिर्फ एक बात कहना चाहती हूँ. अगर समझ आये किसी के तो ठीक है नहीं आये तो भी ठीक. बेटियों को जब तक घर-खानदान की इज्ज़त समझा जाता रहेगा तब तक उनकी औकात एक फर्नीचर पीस से ज्यादा कभी नहीं होने वाली. उसे एक स्वतंत्र अस्तिव मान लेना ही उसके प्रति सच्ची मुहब्बत होगी. और मुझे पूरा यकीन है कि हम उस मुकाम को कभी हासिल नहीं कर पायेंगे.


खैर, लेक्चर बहुत हुआ. मैं ये ऐतराफ करना चाहती हूँ कि आप सब लोगों के साथ मैंने बहुत अच्छा समय गुजारा. मेरे जीवन का ये स्वर्णिम काल था. अनदेखे अनजान लोगों से मुहब्बतें पाना बेहद ख़ास घटनाक्रम था मेरी ज़िन्दगी का. अपने कुछ लिखे पर बड़े बड़े काबिल लोगों की तारीफें पाना बहुत सुकून पहुंचाता था. बेहद सुखद हुआ करती थी ये फीलिंग. अब कभी नहीं आयेगी. टर्मिनल इलनेस की वजह से मौत से नज़रें मिलाते मरीज़ को कैसा लगता होगा ये महसूस कर सकती हूँ इन दिनों.

ये इतना लम्बा लिखना बुझने से पहले फडफडाते हुए दिये समान है और इसीलिए इसमें इतना शोर भी है. मैं लगभग श्योर हूँ कि ये मेरे फेसबूकीया जीवन का अंत है. कोई पुनर्जन्म जैसा चमत्कार हुआ तो बात दूसरी है वरना ये बिछड़ना स्थायी ही मानिए आप लोग.

फेसबुक से दूर जाना कितना कष्टकारी है ये बयान करने के लिए मैं अगर सारी रात भी लिखती रहूँ तो भी कम है. मेरा तो पूरा वजूद ही फेसबुक की देन है. इससे बिछड़ना ऐसे ही है जैसे ज़हनी तौर पर मर जाना. जब भी कभी कोई नई चीज़ होगी, किसी नेता का बेतुका बयान आएगा, कोई अच्छी किताब पढूंगी, फिल्म देखूंगी तो उस सब के बारे में लिखने के लिए मेरी आत्मा तक छटपटाती रहेगी. पता नहीं उस भावना को मैं कैसे हैंडल करुँगी. लेकिन मुझे सीखना ही होगा.

अपने आने वाले जीवन में यूँ तो करने को कुछ होगा नहीं इसलिए एक छोटा सा मकसद बना लिया है जबरन. ताकि ज़िन्दगी बिलकुल ही निरर्थक ना लगे. अगर संतान का मुंह देखना नसीब हुआ तो मैं उन्हें एक बेहतरीन इंसान बनाने में अपना आप होम कर दूँगी. जो कुछ भी मुझे आता है उसे उन तक ट्रान्सफर करुँगी. कोशिश करुँगी कि वो उन लोगों में शुमार हो जिन्होंने इस दुनिया को बेहतर बनाने की कोशिशें की है. आप सब दुआ कीजियेगा कि कम से कम इस एक मुहाज पर तो मुझे कामयाबी जरुर जरुर मिले.

 उन चार सौ से ज्यादा लोगों से माफ़ी माँगना चाहती हूँ जिनकी फ्रेंड रिक्वेस्ट आई हुई है लेकिन बिछड़ने की इस बेला में मैं एक्सेप्ट नहीं कर सकी. मेरी पुरानी पोस्ट में टैग सभी आत्मीय जनों से मेरा आग्रह है कि वो अपना पता, फ़ोन नंबर आदि मेरी इस मेल आईडी पर मुझे मेल जरुर जरुर करें. Zaara116@gmail.com .बिलकुल भी ना भूलें. जिन्होंने फेसबुक पर पहले दिया है वो भी. फेसबुक का अकाउंट का क्या है, आज है, कल नहीं और तालिबानियों की वजह से परसों की गारंटी नहीं.

अगर आप लोग भूल गए हो तो एक बार फिर बताना चाहूंगी कि फेसबुक पर आज तक जो भी लिखा वो इस ब्लॉग पर उपलब्ध है.
http://zaara-khan.blogspot.in/
कल आखिरी बार आ कर इसे आज तक अपडेट कर दूंगी.

अंत में सिर्फ यही कहूँगी कि मेरा जर्रा जर्रा आप सब लोगों का शुक्रगुजार है. मैं जहाँ कहीं भी रहूंगी हर एक पल आप लोगों को याद करुँगी. ये आभासी दुनिया मुझे असल दुनिया से ज्यादा भायी थी. इसका क़र्ज़ भी है मुझपर. और मैं एहसान-फरामोश नहीं. मैं एक बार फिर भरे अंतकरण से और नम आँखों से आप सब लोगों से विदाई चाहती हूँ. और हाँ, मेरे ख़ास अजीजों से गुजारिश है कि वे अपनी आँखें ना भिगोये प्लीज. बेटी की बिदाई में भी कोई रोता है भला ? बस मेरे लिए दुआ कीजियेगा कि मेरे संतप्त मन को कभी न कभी करार आये. या फिर मेरी सवाल पूछने की आदत छूट जाए.

सदा मुस्कुराते रहिएगा आप लोग. और इस दुनिया को एक बेहतर जगह बनाने की कोशिश में जुटे रहिएगा. अंत में एक फ़िल्मी गीत की ये पंक्तियाँ हाजिर है हमेशा की तरह,
“साथी यूँ तुम को मिले,
जीत ही जीत सदा
बस इतना याद रहे,
इक साथी और भी था.”
------- आपकी अपनी 'ज़ारा'.

Tuesday, March 4, 2014

पानियों पे छींटे उडाती हुई लड़की...-

प्रकृति के नियमों के साथ जितना खिलवाड़ गुलज़ार साहब ने किया है उतना शायद ही किसी और ने किया होगा. उन्होंने अपने गीतों के माध्यम से कुदरत को बेतहाशा तोडा मरोड़ा है. उनके गीतों में कुछ भी नियम कायदे से नहीं चलता. कभी चाँद जमीन पर भटक रहा होता है तो कभी सितारे क्यारियों में उगे हुए होते है. कभी समंदर सहराओं की ख़ाक छानता है तो कभी हवा चिराग को रौशन रखे होती है. वो अल्फाजों को सूंघ सकते है, आंसुओं को सुन सकते है और खुशबुओं को देख सकते है. कुल मिलाकर वो कुछ भी कर सकते है. और सच्चे कलाकार की इससे बढ़कर और क्या पहचान होगी कि कुदरत का निजाम भी उसके अल्फाजों की मर्ज़ी से चले.
एक बेइंतहा खूबसूरत गीत में उन्होंने लिखा की,

‘हमने देखी है उन आँखों की महकती खुशबू, हाथ से छू के इसे रिश्ते का इल्जाम ना दो.’

और उसी रोज़ से हर एक बशर आँखों की खुशबू देखने का दावा करने लगा. और उस खुशबू को हाथ से छूने की गुस्ताखी करने से परहेज भी करने लगा. एक और गीत में उन्होंने लिखा कि,

‘आ धूप मलूं मैं तेरे हाथों में,
आ सजदा करूँगा मैं तेरे हाथो में.’

बताओ तो ? हाथों में धूप मलने का आखिर क्या मतलब हुआ ? आखिर ये बंदा एक्झैक्ट्ली करना क्या चाहता है ? कभी आया है मन में सवाल ? नहीं ही आया होगा. क्यूँ कि हम जानते है, अगर गुलजार साहब कह रहे है तो ये सब किया ही जा सकता होगा.

जब मैं छोटी बच्ची थी तब टीवी पर एक फिल्म का ट्रेलर आया करता था. हु तू तू फिल्म का. इसका एक गाना बार बार दिखाया जाता था. गाना बेहद उम्दा था. जिसके बोल कुछ इस तरह थे,

‘छई छप्पा छई, छप्पाक छई, पानियों पे छींटे उडाती हुई लड़की...
अरे देखी किसी ने, आती हुई लहरों पे जाती हुई लड़की.’

उस कच्ची उम्र में इस गीत को सुनकर मेरी पक्की धारणा हो चुकी थी कि ये कोई भूत-प्रेत की फिल्म है. और ये लहरों पे आने-जाने वाली लड़की जरुर जरुर कोई चुड़ैल होगी. वो तो काफी सालों बाद पता चला कि फिल्म एक पोलिटिकल थ्रिलर थी और लहरों पे लड़की चलाने का कारनामा गुलजार साहब का था.

जब वो कहते है कि, ‘कतरा कतरा मिलती है, कतरा कतरा पीने दो, ज़िन्दगी है’, तो इस फानी दुनिया का हर एक बाशिंदा ज़िन्दगी की प्यास को लबों पर सजाये हुए उनके हमकदम हो लेता है. बगैर कोई सवाल जवाब किये. जब उनके किसी गीत की विरहिणी नायिका कहती है कि, ‘और मेरे इक ख़त में लिपटी रात पड़ी है, वो रात बुझा दो, मेरा वो सामान लौटा दो’, तो उसके दर्द की शिद्दत से हर एक सुनने वाला अच्छी तरह वाकिफ हो जाता है. जिसने अपनी रातें ही ख़त में लपेट कर भेज दी वो कितनी तनहा होगी इसका अंदाज़ा एक लाइन में ही लग जाता है.

लिबास फिल्म के गीत ‘खामोश सा अफसाना’ में एक जगह वो लिखते है कि,

‘कितने साहिल ढूंढें, कोई ना सामने आया,
जब मझधार में डूबे, साहिल थामने आया.’

तब डगमगाती कश्तियों के मुसाफिरों की भी हिम्मत बंधने लगती है कि कभी तो, कोई तो आकर थामेगा ही. भले ही साहिल बीच मझधार आये. इसी फिल्म के एक अन्य गीत ‘सिली हवा छू गई’ में उनकी नायिका कहती है,
‘तुम से मिली जो ज़िन्दगी, हम ने अभी बोई नहीं’, जैसे ज़िन्दगी ना हो उम्मीदों का कोई बीज हो जिसे बो देने भर से ही एक नई ज़िन्दगी का पौधा फलने-फूलने लगेगा. इसी उम्मीद की तो जरुरत होती है हम सब को. और गुलजार के गीतों में ये बहुतायत में पाई जाती है. यूं जैसे उम्मीदों का कोई पेड़ लगा हुआ हो. जब भी नाउम्मीदी दस्तक देने लगे, गए और इस पेड़ की शाख से कोई उम्मीद तोड़ ली.

जब उन्होंने समझाया ‘दिल तो बच्चा है जी’ तो पूरा मुल्क इसे ब्रह्मवाक्य मानकर इस पर अमल करने लगा. जब उन्होंने बोला कि, ‘दोनों तरफ से बजती है ये, आय हाय ज़िन्दगी क्या ढोलक है’, तो सब को गुमान हुआ की ज़िन्दगी कितनी मुश्किलातों से भरी हुई है.

साथिया फिल्म के एक गाने में जब उनका नायक अपनी महबूबा की हंसी को ‘गीली हंसी’ बताता है और उस हंसी को ‘पी जाने का’ दावा करता है तो वो नजारा हमारे खयालों में एक सूरत सी अख्तियार कर लेता है. इसी फिल्म के एक गीत ‘ऐ उडी उडी’ में हीरो अपने प्रैक्टिकल होने का क्या खूब सबूत देता है. वो कहता है,
‘लड़ लड़ के जीने को ये लम्हे थोड़े है
मर मर के सीने में ये शीशे जोड़े है
तुम कह दो सब ला दूं, बस इतना सोचो तुम,
अम्बर पे पहले ही सितारे थोड़े हैं.’
इसी फिल्म के एक और बेहद मधुर गीत ‘चुपके से’ में नायिका कहती है,
‘दिन भी ना डूबे, रात ना आये, शाम कभी ना ढले,
शाम ढले तो सुबह ना आये, रात ही रात चले.’
ये पढ़कर भी ऐसी कन्फ्यूज बंदी पर हमें गुस्सा आने की बजाय प्यार ही आता है.

अपने गीतों के जरिये सम्पूरण सिंह कालरा उर्फ़ गुलजार साहब क्या क्या कर सकते है या करवा सकते है इसकी एक झलक देख लीजिये.

--- वो आपसे चिंगारी का टुकड़ा जलाने को या सहरा की प्यास बुझाने को कह सकते है ( बहने दे, मुझे बहने दे – रावण )
--- वो आपको हुक्म दे सकते है कि जाओ रौशनी से नूर के धागे तोड़ लाओ. ( बोल ना हलके हलके – झूम बराबर झूम )
--- वो आपको समझा सकते है कि बारिश का भी बोसा (चुम्बन ) लिया जा सकता है. ( बरसो रे मेघा – गुरु )
--- वो आपको दिल निचोड़ने के लिए, रात की मटकी तोड़ने के लिए उकसा सकते है. ( आजा आजा दिल निचोड़े – कमीने )
--- वो आपको बहका सकते है कि सांस में सांस मिलने पर ही सांस आती है. ( सांस – जब तक है जान )
--- वो आपको काफिर घोषित करवाने में भी कोई कसर नहीं छोड़ेंगे जब आप उनका लिखा ये गायेंगे, मेरा नगमा वही, मेरा कलमा वही. ( चल छैंया छैंया – दिल से )
--- वो ‘तू मेरे रूबरू है, मेरी आँखों की इबादत है’ लिखकर आपकी मदद भी कर सकते है. जब भी आपका महबूब/महबूबा आपसे खफा हो जाए, ये गीत चिपका दीजिये. नतीजा यकीनन सुखद निकलेगा.

गुलजार साहब के गीत सिर्फ गीत ना होकर जीने का फलसफा संजोये हुए नगीने है. उनका हम जैसी भटकती, तड़पती रूहों पर बेशुमार एहसान है. जिसको कभी भी चुकता नहीं किया जा सकता. खुदा आपकी उम्र दराज करे गुलजार साहब. ताकि आप यूं ही हमारी जिंदगियों को अपने अल्फाजों की खुशबू से महकाते रहे. आमीन !

जब भी गहरे अवसाद में घिर जाती हूँ तो गुलजार साहब के इस गीत से ताकत हासिल करने की कोशिश करती रहती हूँ,

पहले से लिखा कुछ भी नहीं,
रोज़ नया कुछ लिखती है तू
जो भी लिखा है, दिल से जिया है
ये लम्हा फिलहाल जी लेने दे
हाँ ये लम्हा फिलहाल जी लेने दे....

आप भी जी रहे है न ये फिलहाल वाला लम्हा ???


- ज़ारा अकरम खान

Saturday, January 25, 2014

मुखौटा- ज़ारा अकरम खान

~~~~~~~~~मुखौटा~~~~~~~~

उसे पहली बार मेरा पांच साल का भांजा आमिर लाया था । तब, जब वो लोग कलियर जाते हुए हमारे यहाँ रुके थे । लिजलिजी रबड़ से बना भयंकर सा मुखौटा । सुर्ख दहकती हुई आँखें, चेहरे पर अजीब से रंगों का मिश्रण और डरावनी मुद्रा । पहली बार जब आमिर उसे पहने हुए अचानक सामने कूदा था तो मेरी चीख निकल गई थी । दिल उछल कर हलक में आ गया था । कितनी ही देर लगी थी अपनी बेतरतीब साँसों पर काबू पाने में । अगर वो हमारे यहाँ मेहमान नहीं होता तो एक मारती खींचके । लेकिन मेहमान नवाजी का और बच्चे की उम्र का खयाल कर के चुप लगा गई थी । मुझे याद है आमिर कितना खुल कर हंसा था मेरे डरने से । उसकी निगाह में एक बच्चे द्वारा किसी बड़े को डराना बहुत बड़ा काम था । बहुत खुश हुआ था वो अपनी हरकत पर । जो दो दिन वो लोग हमारे यहाँ रुके, उसने कई बार मुझे वो मुखौटा पहन कर डराया । पहली बार के बाद मेरा डर तो निकल गया था लेकिन मैं आमिर की ख़ुशी के लिए डरने का नाटक करती रही । उसे झूठ मूठ का डांटती भी रही । वो बहुत खुश होता था । फिर वो लोग चले गए और मुखौटा रह गया । पता नहीं आमिर उसे ले जाना भूल गया था या उसने उसे जानबूझकर मेरे लिए छोड़ा था । लेकिन उनके जाने के बाद मुझे वो बैठक में मिला । मैंने उसे उठाकर अपने कमरे में अपनी मेज़ की दराज़ में रख दिया । दो दिनों में उसकी आदत तो हो चुकी थी लेकिन रात में उसकी तरफ देखने से अब भी हल्का सा डर लगता ही था ।

दिन बीतते गए और मैं मुखौटे को भूलती गई । वैसे भी याद रखने के लिए बहुत सी चीजें थी ज़िन्दगी में । जैसे की तुम । हाँ तुम, अर्श अहमद खान । तुम्हें याद करना, तुम्हें सोचना एक अलग ही दुनिया में ले जाता था मुझे । तुम्हारे होते हुए मुझे वक्त हमेशा कम पड़ा करता था । उस अनजानी सी कशिश को कभी लफ़्ज़ों में पिरोने की कोशिश तो नही की मैंने लेकिन बहुत कुछ ऐसा ज़हन में उमड़ता रहता था जिसे बाहर निकालने की कोशिश में मैं अधमरी हुई जाती थी । मेरी बातें सुनकर तुम पूछा करते थे कि तुम ऐसी किताबी बातें कैसे कर लेती हो ? और मैं हमेशा मुस्कुराके यही कहती थी के बहुत किताबें पढ़ती जो हूँ । हाँ अर्श अहमद खान मैं बहुत किताबें पढ़ती थी, अब भी पढ़ती हूँ । तुम्हारे बाद भी । आखिर उन्ही से तो सीखा है मैंने लहजे पहचानना । बातों के पीछे छिपी हुई बात जानना । अगर ऐसा ना होता तो उस दिन तुम्हारी बातों को अन्दर तक पढने में कामयाब हो पाती भला ?

मुझे आज भी लम्हा लम्हा याद है वो दिन जब तुम आखिरी बार हमारे घर आये थे । तुम्हे आये हुए बहुत दिन बीत चुके थे । इतने ज्यादा के अब तुम्हारे आने की उम्मीद भी करनी छोड़ दी थी मैंने । और ऐसे में अचानक तुम आये । तुम्हें देखकर पता नहीं क्यूँ उस एक बार दिल की धड़कनें काबू में रही । जब कि हमेशा वो एकाध बीट मिस कर दिया करती थी । पता नहीं क्यूँ वो बेचैनी,वो बेताबी नदारद थी । शायद पिछले दिनों की तुम्हारी बेरुखी का असर हो । तुम्हारे आते ही मैं हमेशा की तरह किचन की तरफ मुड़ी और हमेशा की तरह अम्मी ने रोक दिया कि मैं देखती हूँ, तुम अर्श से बातें करो । क्या वो कुछ जानती थी ? ये माएं भी ना बड़ी अजीब शय होती है । अपनी औलादों के बारे में इन्हें सब पता होता है । बिना कुछ बताये भी । हमेशा की तरह तुम और मैं आमने सामने बैठे थे । तुम उस सोफे पर, मैं इधरवाले पर । बीच में लम्बी सी शीशे की मेज । तुम जब भी आते बैठने का यही सिस्टम जारी रहता । उस दिन बहुत देर तक एक बेचैन खामोशी हवा में तैरती रही । फिर मैंने ही बात शुरू की थी ।

“बहुत दिनों बाद आये आप । क्या बात है, आप बेज़ार है मुझसे ?”

“नहीं । नहीं तो…” – तुमने हडबडाकर कहा था – “बेज़ार क्यूँ होने लगा ? बस मसरूफियत ही इतनी बढ़ गई है के वक्त ही नहीं निकल पाता । तुम तो जानती ही हो ।”

हाँ, मैं तो जानती ही थी । वो हर तीसरे दिन तुम्हारा मेरे घर बहाने बहाने से आ धमकना, वो समीरा बाज़ी के फ़ोन पर बार बार फ़ोन करके बात करवाने की गुजारिशें करना, वो ‘तुम तो मुझे वक्त ही नहीं देती हो’ वाली शिकायतें करना । सब जानती थी मैं । ये भी की आजकल तुम्हारी तरफ से बनाई गई इस दूरी की वजह क्या है । एक लम्हें को दिल चाहा ये सब कह दूं लेकिन फिर संभाल ही लिया खुद को ।

“हाँ जानती हूँ । आपकी जॉब का क्या हुआ ?”

“हो जाएगा । एक जगह बात चल रही है । इस बार पक्का है । शायद देहरादून जाना पड़े ।”

“ओह, तो और क्या सोचा आगे आपने?” – मैंने पूछा ।

“किस बारे में ?”

किस बारे में ? हाँ ये भी तो ईक सवाल है । किस बारे में सोचते तुम । अपनी नौकरी के बारे में, अपनी मसरूफियत के बारे में या…..या मेरे बारे में। मेरे बारे में क्यूँ नहीं सोचते तुम ? होठों पर रेंग रहे इस सवाल को बाहर फेंकना इतना तकलीफदेह क्यूँ हो गया था ? अब भी सोचती हूँ तो जवाब नहीं मिलता । पता नहीं बेहिसाब बोलने वाली मैं उस लम्हे इतनी चुप क्यूँ हो गई थी । बहुत देर तक एक चीखती हुई खामोशी छाई रही माहौल में । फिर तुमने ही उसे तोडा ।

“घरवाले शादी पर जोर दे रहे है।” – तुमने थैली से खरगोश बाहर निकाल ही लिया था ।

“हूँ ।” – मेरी शांत प्रतिक्रिया से तुमसे ज्यादा मुझे हैरानी हुई थी ।

तुम गौर से पढना चाह रहे थे मेरे चेहरे पर दर्द की लकीरें । और मैं इस कोशिश में थी कि दिल के ज़ज्बात चेहरे पर ना झलकने पाए । जीत शायद मेरी ही हुई थी । तभी तो तुमने झुंझलाकर कहा था,

“कुछ कहोगी नहीं ?”

“क्या कहूँ ? मेरे कहने लायक कुछ बचा है ?” – मेरा सीधा सवाल शायद तुम्हे कुछ असहज कर गया था । मुझे खुद पर ही गुस्सा आने लगा । तुम्हें आजमाइश में डालना मुझे कभी भी अच्छा नहीं लगा ।

“मैं तुम्हारा गुनाहगार हूँ शाद ।” – तुम्हारी आवाज़ शायद तुम्हें भी अजनबी लगी होगी ।

“ऐसी कोई बात नहीं है । लेकिन अगर बात चल ही निकली है तो बताइये की क्यूँकर आपका और मेरा साथ नहीं बन सकता ?” –थोड़ी सी कोशिश अपने लिए भी कर के देखना मेरा फ़र्ज़ था । भले ही नाकामयाबी की गारंटी हो ।

“पापा ने कमिट किया हुआ है उनके दोस्त से । वो कभी नहीं मानेंगे । मेरे हाथ में कुछ नहीं है ।” – वही स्टैण्डर्ड जवाब ।

जुबां पे आया हुआ सवाल कि ‘प्यार क्या पापा से पूछकर किया था’ कितनी मुश्किलों से हलक के अन्दर धकेला था इसका तुम्हें अहसास भी नहीं हुआ था । कुछ पल के लिए तो दिमाग सुन्न हो गया था और ज़हन समीरा बाज़ी की बातों की तरफ चला गया था ।

‘तुम समझती क्यूँ नहीं शाद, अर्श तुमसे शादी कभी नहीं करेगा । तुमसे शादी कर के उसे सिर्फ बीवी हासिल होगी । लेकिन जहाँ उसके घरवाले उसकी शादी करा रहे हैं वहां उसे बीवी के साथ साथ एक अच्छी नौकरी और सब ठीक रहा तो राजनीति में करियर का सुनहरा मौका मिलेगा । उसके होने वाले ससुर एक बड़े नेता के करीबी है और उनका अपने दामाद को राजनीति में उतारने का इरादा है ।इस बार के पंचायती चुनाव में हो सकता है अर्श को मौका मिले । ये एक बेहद लुभावना ऑफर है जिसे अर्श कभी नहीं छोड़ेगा । तुम चाहे मानो या ना मानो लेकिन अर्श कितना सेल्फिश है ये मैं जानती हूँ । वो तुम्हें छोड़ देगा लेकिन ये मौका नहीं जाने देगा।’ समीरा बाज़ी की आवाज़ कानों में गूँज रही थी । हालांकि उस आवाज़ पर मैंने ना तब यकीन किया था और ना ही अब करना चाहती थी । मगर क्या तुम इसे सच साबित करने आये थे अर्श ? समीरा बाज़ी तुम्हारी भाभी थी । तुम्हारे घर में ही रहती थी । तुम्हारे घरकी सब बातें उन्हें पता होना लाज़मी था । झूठ बोलने वाली या बेवजह किसी का बुरा चाहने वाली भी वो नहीं थी । ख़ास तौर पर मुझ से तो उन्हें बहुत दिली लगाव था । अब भी है । वो अगर कुछ कहती थी तो उनकी बातों को मुझे संजीदगी से लेना ही चाहिए था । लेकिन अर्श, ये जो उम्मीद है न, बड़ी ही ज़ालिम शय है । ब्लड कैंसर के आखिरी स्टेज पर पहुँच चुके शख्स को भी ज़िन्दगी से चिपके रहने पर मजबूर करती है ये उम्मीद । मुझे भी क्या इसी उम्मीद की उम्मीद ने नाउम्मीद होने से रोका था ? ओह, फिर किताबी बात कर दी मैंने । यूं बहक जाना आम बात हो गई है अब । फर्क सिर्फ इतना है की अब कोई टोकने वाला नहीं रहा । अब भी इस सवाल से परेशान हूँ कि उस दिन क्या तुम मेरी उम्मीद का मुर्दा गहरा दफ्न करने आये थे ?

“कहाँ खो गई ?” – तुम्हारे सवाल ने मुझे वापस उस कमरें में लौट आने पर मजबूर कर दिया था ।

“कहीं नहीं ।” – मेरा मुख़्तसर सा जवाब ।

“तुम मुझे माफ़ नहीं करोगी ना कभी ?” –  तुमने आवाज़ में भरसक शर्मिंदगी घोलने की कोशिश करते हुए पूछा था ।

और तुम ये कभी नहीं जान पाओगे की तुम्हारे इस सवाल ने मेरे अन्दर कितने विस्फोट कर दिए थे । ये सवाल सिर्फ सवाल नहीं था । ऐलान था इस बात का कि तुमने अपनी मंजिल चुन ली थी । तुमने अपना सफ़र शुरू भी कर दिया था । और तुम मुझे शायद सिर्फ इत्तला देने आये थे । ये जताने आये थे कि तुमने जो राह चुनी है उसपर तुम्हें तुम्हारी मर्ज़ी के खिलाफ धकेला गया है । लेकिन क्या ये सच था अर्श ? क्या तुम चाहते तो हमारा साथ मुमकिन नहीं होता ? समीरा बाज़ी हमारे खानदान से थी और तुम्हारे घर में खुश थी । दोनों खानदान एक दूसरे से अच्छी तरह वाकिफ थे । हमारे यहाँ से एक और लड़की ले जाना तुम्हारे घरवालों को बिलकुल भी नागवार नहीं गुजरता । अगर तुम जिक्र चलाते तो तुम्हारे पापा यकीनन मान जाते । अहमद अंकल एक नेक और रहमदिल शख्स रहे हैं । उन्हें अपनी ही चलाते हुए मैंने कभी नहीं देखा । समीरा बाजी कहते नहीं थकती कि उन्होंने उन्हें कभी बाप की कमी महसूस नहीं होने दी । अगर तुम अपनी पसंद जाहिर करते तो थोड़ी सी कोशिशों से ये मुमकिन हो जाता। तो क्या ये तुम थे अर्श जिसने अपनी महत्वकांक्षाओं को पूरा करने के लिए उनकी किसी फर्जी कमिटमेंट का सहारा लिया था ? क्या ये तुम थे जिसे एक उज्ज्वल भविष्य के लिए मेरी कुर्बानी सस्ता सौदा लगी थी ? ये और इस जैसे न जाने कितने सवाल ज़हन को कुरेद रहे थे । लेकिन तुम्हें शर्मिंदा करना मुझे कभी अच्छा नहीं लगा ।

“बोलो न, क्या कभी मुझे माफ़ नहीं कर सकोगी ?” – तुम व्याकुलता की प्रतिमूर्ति बने अपना सवाल दोहरा रहे थे ।

“ऐसी कोई बात नहीं है । जो किस्मत में लिखा होता है वही होता है । इसमें किसी का क्या दोष ?” – बड़ी सफाई से जवाब दिया था मैंने । अन्दर की हलचल का अक्स चेहरे पर आने दिए बगैर । जब शिद्दत ज्यादा ही महसूस हुई तो ‘अम्मी कहाँ रह गई, देखकर आऊँ’ कहकर मैं उठ के चल दी थी । अन्दर के कमरे में जाकर खुद को व्यवस्थित किया था । और फिर वो लम्हा आया । वो लम्हा, जिसने मुझे समझाया की मुझ से मिलने तुम एक मुखौटा पहनकर आये थे । उदासी का मुखौटा, फर्जी शर्मिंदगी का मुखौटा । जब मैं वापस आ रही थी मैंने देखा की तुम अपनी दोनों आँखें जोर जोर से मसल रहे थे । ताकि वो सुर्ख हो जाती । मैंने तुम्हें थोडा वक्त दिया और पैरों की आवाज़ करती हुई लौटी ।

“आ रही है चाय ।” मैंने बताया। और दिल थाम के इन्तजार करती रही । इस बात का कि अब तुम कुछ कहोगे और मेरे शक को सही साबित कर दोगे । या फिर इस बात का कि तुम कुछ नहीं कहोगे और मेरे यकीन का मान रखोगे । लेकिन वो मनहूस दिन शायद सभी हिसाब एक ही झटके में करने पर आमादा था । तुमने कह ही दिया,

“शाद, मैं इतना परेशान हूँ कि कई रातों से सो नहीं पा रहा हूँ । देखो मेरी आँखें कितनी लाल हो रही है । ये बेतहाशा रोने की वजह से है । मैं तुम्हें कैसे बताऊँ कि मैं तुम्हारे बगैर जीने का तसव्वुर भी नहीं कर सकता था । लेकिन हालात ने मुझे मजबूर कर दिया । मुझे माफ़ कर दो।”

तुम्हें ये जानकर अजीब लगेगा अर्श के मुझे उस संजीदा घडी में भी मज़ाक सूझ गया था । मैं तुमसे कहने वाली थी के अब किताबी बातें कौन कर रहा है ? लेकिन फिर सोचा इससे तुम्हारे मुखौटे का रंग उड़ जाएगा । मैंने कुछ नहीं कहा । सिर्फ तुम्हें देखती रही थी । और तुम चेहरा ग़मगीन दिखाने के चक्कर में अजीब अजीब तरह की मुद्राएं बनाने लगे थे ।

फिर अम्मी आ गई और उन्होंने तुम्हे उस उलझन से निजात दिलाई । फिर तुमने चाय जैसे तैसे ख़त्म की । अम्मी से कुछ रस्मी बातें की और चले गए । उसके बाद तुम कभी नहीं लौटकर आये । हाँ, तुम्हारी शादी का कार्ड जरुर आया था । सुनहरे हर्फों में लिखा तुम्हारा नाम मैं देर तक छूती रही थी । अर्श वेड्स सना । कितना अजीब लग रहा था वो पढना । एक मज़े की बात बताऊँ ? तुम्हारी बीवी का नाम देखकर मुझे एक बेकार सी तुकबंदी भी सूझी थी । ‘तुम्हें मिल गई सना, और हम हो गए फना ।’ कैसी है ? बेकार है न ? समीरा बाज़ी भी यही बोली थी ।

खैर, उसके बाद की घटनाएं बड़ी जल्दी जल्दी हुई । तुम्हारी शादी हो गई । तुम देहरादून चले गए । गाहे बगाहे तुम्हारी ख़बरें मिलती रही और मैं उन्हें बिना कोई दिलचस्पी दिखाए सुनती रही । मैं फिर से अपनी किताबों की दुनिया में लौट गई । इस बार और शिद्दत के साथ ।

तुम्हें बताना नहीं चाहती के उस दिन तुम्हारे जाने के बाद मैंने आमिर का छोड़ा हुआ मुखौटा मेज़ की दराज़ में से निकाल कर देर तलक देखा था । और फिर उसे अपनी अलमारी में सहेजकर रख दिया था । अपनी डायरी प्यारी के साथ । पता है वो मुझे बेहद हिम्मत देता है । है न अजीब बात ? वो मुझे बताता है कि मुखौटा सब पहन के चलते है इस दुनिया में । लेकिन जरुरी नहीं कि हर एक का मुखौटा नुमायां हो । और ये भी जरुरी नहीं के हर एक मुखौटा डरावना हो । कई मुखौटे बेहद खूबसूरत शक्ल लिए होते है । अब ये आप पर है कि आप फरेब झेलने में कितने माहिर हो ।

और हाँ, उस दिन के बाद एक और तब्दीली भी आई है मुझ में । मैंने भी एक मुखौटा लगा लिया है । सदा खुश रहने वाला । पता है ये मुखौटा बेहद चमकीला है । इससे लोगों के अनचाहे सवालों से बचने में बड़ी मदद होती है । तुम्हारी शादी वाले दिन जब समीरा बाज़ी मुझे गले से लगाकर मेरे चेहरे पर कुछ ढूंढ रही थी तब भी मैंने यही मुखौटा लगा रखा था । बड़ा कामयाब रहा तजुर्बा ।उन्हें कुछ नहीं मिला । उनके चेहरे से झलकती फ़िक्र को राहत में तब्दील होते देखना बेहद अच्छा लगा मुझे । तब से मैंने इस मुखौटे को पक्का ही अपना लिया है । बहुत काम आता है कमबख्त ।

लेकिन एक बात बताऊँ ? जब सारी दुनिया नींद की आगोश में गर्क हो जाती है न तो रात के उस सन्नाटे में ये मुखौटा भी मेरा साथ छोड़ देता है । तब खुद का सामना करना बड़ा ही तकलीफदेह लगता है अर्श । और इसी वजह से मुझे रात से नफरत हो गई है । शदीद नफरत । क्या इसका कुछ उपाय हो सकता है ?

--------- ज़ारा अकरम खान

Wednesday, July 10, 2013

मुझे धर्म से, किसी भी धर्म से कोई परहेज़ नहीं पर धर्मान्धता से जरुर जरुर है- ज़ारा अकरम खान

पिछले कुछ दिनों से फेसबुक पर आस्तिकता और नास्तिकता की बहस को फॉलो कर रही हूँ । बहसबाजी का मौसम उफान पर है । दोनों तरफ से भारी भारी दलीले देकर साबित किया जा रहा है की कैसे उन्हीं का पक्ष सही है । आस्तिकों को शिकायत है की नास्तिक वर्ग उनकी आस्था का मखौल तो उड़ाता ही है साथ ही धर्म को मानने वाले हर व्यक्ती को और धर्म को गालिया देना इन्होने अपना ‘धर्म’ बना रखा है । नास्तिकों को ऐतराज़ है की धर्म ने और उसके मानने वालों ने दुनिया में इंसानियत के पनपने की गुंजाइश ही नहीं छोड़ी । धर्म हर बंटवारे का मूल कारण साबित होता जा रहा है । शिकायते दोनों तरफ है, और कुछ तो सौ फीसदी जायज़ भी है । इस विषय पर बहोत ही काबिल और गुणी लोगों ने अपनी बात तर्कपूर्ण रूप से कही है । उनमे से किसी की भी बात को ना काटते हुए मैं अपनी बात कहना चाहूंगी ।
मेरा अपना ये मानना है की आस्था इंसान की पहचान नहीं जरुरत हैं । और इसीलिए इंसान की मजबूरी भी है ।
फरेब,हक-तलफी,नाइंसाफी और धोखाधड़ी से भरी इस दुनिया में आम आदमी तूफ़ान में फंसी नौका की तरह बेबस और लाचार है । सिस्टम से लड़ने का हौंसला नहीं, नाइंसाफियों के खिलाफ उठ खड़े होने की हैसियत नहीं और नित नई समस्याओं से जूझने की कूवत नहीं । ऐसे हालातों में सर्वाइव करना कोई मजाक नहीं । फिर भी इंसान सर्वाइव करता है । और हसते मुस्कुराते हुए करता है । क्यूँ....? क्यूँ की उसके पास आस्था है । किसी ईश्वरीय शक्ति के मौजूद होने का विश्वास ही उसके लिए सुकूनभरा है । जब बुरी तरह से सताया गया आदमी हालातों से हार जाता है तो मन के किसी कोने में उसे ये विश्वास जरुर होता है की एक ना एक दिन मेरी दुआए जरुर कबूल होंगी । एक ना एक दिन मुझे इन्साफ जरुर मिलेगा । अगर ये विश्वास ही ख़तम हो जाए तो इंसानी ज़िन्दगी में कुछ न बचा ! इसी विश्वास के सहारे वो मुश्किल से मुश्किल हालातों में से भी फीनिक्स की तरह परवाज़ करने का मंसूबा पालता है । किसी अदृश्य ताकत के हमारी ज़िन्दगी में मौजूद होने की कल्पना बड़ी सुखद और दिलासा देने वाली है । इंसान कदम कदम पर गलतिया करता रहता है पर जब उन गलतियों की स्वीकारोक्ति की नौबत आती है तो ये कहके खुद को आज़ाद करा लेता है की उपरवाले की यही मर्ज़ी थी । अपनी गलतियों को पीछे छोड कर आगे बढ़ने के लिए भी इंसान को ईश्वर के नाम की जरुरत है ।
आये दिन दुनिया में हैवानियत का नंगा नाच होता है, मासूमों के खून की होली खेली जाती है, नाइंसाफी के नए नए कीर्तिमान रचे जाते है । ऐसे हर घृणित कार्य को देखकर आम आदमी---कमज़ोर,मजबूर,लाचार आम आदमी---यही सोचता है की ऐसे कामों के लिए जिम्मेदार लोगों को अल्लाह/भगवान/गॉड सज़ा देगा । क्यूँ की दुनिया में तो इन्साफ नाम की चीज़ बची नहीं । वो सोचता है की ईश्वरीय शक्ति ऐसे लोगों का लेजर अकाउंट मेनटेन कर रही होगी और उनके लिए कोई सज़ा जरुर जरुर तजवीज करेगी । इसी तरह दुनिया में ऐसे लोग भी है जो बिना किसी वजह के अज़ाब भरी ज़िन्दगी जीने के लिए अभिशप्त है । असाध्य रोगों के रोगी, अपंगता के शिकार लोग, समाज के सबसे निचले तबके के लोग । उनके बारे में भी यही सोचा जाता है की एक ना एक दिन इनके दुखों के अंत जरुर होगा । सबकी सुध रखने वाला वो परम दयालु परमात्मा सबके साथ इन्साफ करेगा ।
जरा सोचिये, अगर ये विश्वास ही ख़त्म हो जाए तो फिर...! इसका मतलब तो ये हुआ की दुनिया में जो कुछ भी चल रहा है सब ठीक है । मदर टेरेसा और हिटलर एक ही श्रेणी में...। किसी बिन लादेन को कोई सज़ा नहीं मिलेगी । दहशतगर्दों की करतूत का कोई जवाब नहीं माँगा जाएगा । जिंदगीभर अनगिनत दुखों की सलीब ढोने वाले लोगों को कोई सुकून का लम्हा मयस्सर नहीं होगा । जालिम का जुल्म बदस्तूर जारी रहेगा । दबा कुचला आदमी अपनी निकृष्टतम ज़िन्दगी घसीटता हुआ जीता रहेगा और एक दिन मर भी जाएगा । कोई खुदाई इन्साफ नहीं होगा । किसी उम्मीद की किरण का कोई अस्तित्व नहीं होगा ।
और साहेबान, ईश्वरीय न्याय की उम्मीद के बगैर आदमी जीते जी मर जाएगा ।
इसीलिए आस्था का होना जरुरी हैं । आस्था वो दिया है जो घुप्प अँधेरे में भी राह पाने की उम्मीद को जिंदा रखता है ।

जाते जाते ये बताती चलूँ की मैं आस्तिक हूँ । मेरा सृष्टि के सृजनकर्ता में पूरा पूरा विश्वास हैं ।
और ये भी बता देना प्रासंगिक होगा की,
मुझे धर्म से, किसी भी धर्म से कोई परहेज़ नहीं पर धर्मान्धता से जरुर जरुर है ।

Friday, June 28, 2013

किताबें- ज़ारा अकरम खान

बहुत दिन हुए.. कोई हलचल नहीं हुयी यहाँ.. वक़्त भी न हमेशा इंसान को मशरूफ रखता है.. खैर सब छोड़ें -- किताबें जो की इंसान की सबसे प्यारी दोस्त होती हैं-- आज इसी कड़ी में ज़ारा अकरम खान साहिबा का ये आलेख आपके रूबरू कर रहा हूँ.

आज अपने पसंदीदा सब्जेक्ट किताबों के बारे में कुछ लिखने का मन कर रहा हैं | किताबे मानवजाति द्वारा की गयी सबसे बेहतरीन खोज है | सभ्यताओं को दिया गया सबसे बेहतरीन तोहफा है, ऐसा मेरा मानना है | मानना क्या दृढ विश्वास है | जितना सब कुछ हम पढने की आदत डालकर सीख सकते हैं उतना सिखाना तो किसी भी संस्थान के बस का नहीं | मेरी अपनी ज़िन्दगी में किताबों का बड़ा ही महत्वपूर्ण रोल रहा हैं | अगर आज मैं कुछ लिखने का और उसे दोस्तों के सामने पेश करने का हौसला कर पा रही हूँ तो ये किताबों की देन है | ये हुनर, ये हौसला, ये अंदाजेबयां सबकुछ पढ़ पढ़ कर आया है | वरना मेरी ऐसी औकात कहाँ...??? अपनी अब तक की छोटी सी और पाबंदियों भरी ज़िन्दगी में मैंने बहुतकुछ पढ़ा है | फिर भी लगता है कुछ भी नहीं पढ़ा | ऐसा लगता हैं जैसे महासागर से सिर्फ चुल्लू भर पानी ही निकाल कर पी पाई हूँ |

पढने के बारे में एक बात ख़ास तौर से कहना चाहूंगी | जरुरी नहीं की आप बड़े बड़े ग्रन्थ ही पढ़े | ऐसा करने पर ही आपका पढ़ा लिखा होना सार्थक होता हो | सुगम और मनोरंजक साहित्य पढना भी एक जीवन बदल देने वाला अनुभव साबित हो सकता हैं | प्रेमचंद जी से बढ़कर और क्या मिसाल हो सकती हैं...?? सीधी साधी भाषा में मानवीय जीवन की हर भावना को छुआ है उनकी लेखनी ने | उन के अलावा अनेको अनेक उदाहरण है जिनकी कलम ने हमे ज़िन्दगी के हर एक पहलू से वाकिफ कराया है | प्रेम,दया,घृणा,विश्वास,धोखा,वास्तल्य आदि सारी भावनाएं किरदारों में ढलकर हमारे सामने एक पूरी दुनिया का निर्माण करती है और उसी माध्यम से हम तक लेखक का सन्देश बाखूबी पहुँचता है |
हमारे देश में पुस्तक प्रेमियों की संख्या वैसे हमेशा ही कम रही है | हमारे यहाँ का पाठक किताब खरीदना एक महंगा शौक समझता है | कैसी विडम्बना है की दो सौ रुपए का पिज़्ज़ा हमे महंगा नहीं लगता पर सौ रुपए की किताब खरीदना हमारी नज़रों में फिजूलखर्ची है | हमारे यहाँ के सो कॉल्ड जागरूक माता-पिता अपने बच्चों के लिए क्या नहीं करते..?? उन्हें मॉल में ले जाते हैं, मल्टीप्लेक्स में महंगी टिकट खरीदकर उलजलूल फिल्मे दिखाते है, मैकडोनाल्ड का कूड़ा महंगे दामों में खरीदकर खिलाते है, महंगे विडियो गेम्स खरीदकर उन्हें चारदीवारी में कैद करने का खुद ही सामान करते हैं, एक शाम में हसते हसते सैंकड़ो रुपए फूंक डालते हैं | पर अफ़सोस की उन्हें कभी कोई किताब नहीं दिलवाते | ये कभी नहीं कहते की, बेटा ये किताब पढो, बहुत अच्छी हैं | क्यूँ हैं ऐसा..? क्यूँ कि माता पीता को ही पता नहीं की कौन सी किताब पढने लायक है | या पढना भी एक जरुरी चीज़ है | हम बच्चों को सिर्फ मनोरंजन देते हैं, ज्ञान नहीं | किताबों से उन्हें दोनों चीज़े हासिल हो सकती हैं |

पढना, ढेर पढना आपकी सोच का दायरा विस्तृत करने में आपकी मदद करता है | आपके अन्दर एक आत्मविश्वास तो जगाता ही है साथ ही आपके ज़हन को एक आज़ाद और कॉंफिडेंट विचारधारा प्रदान करता है | मेरा मानना है की मनोरंजन के हर साधन की और उसके प्रभाव की एक सीमा होती है | लेकिन एक अच्छी किताब आपके साथ उम्र भर चलती है | आपके ज़हन में महफूज़ रहती है |
न जाने कितनी महान विभूतियों ने कितना कुछ लिख छोड़ा है हमारे लिए | अगर पढना चाहे तो उम्र कम पड़ जाए | विश्व-साहित्य को छोड भी दिया जाए तो भी भारतीय साहित्य अपने आप में एक विशाल महासागर है | हिंदी में कितने श्रेष्ठ और गुणी लेखक हुए, जिनको पढना हर बार नई ज़िन्दगी जीने जैसा है | इसके अलावा मराठी,बंगाली,पंजाबी में भी साहित्य की अद्भुत परंपरा रही है | मैं जब बंकिम दा को पढ़ती हूँ तो मुझे अफ़सोस होने लगता है की क्यूँ उनकी सारी रचनाओं का हिंदी अनुवाद उपलब्ध नहीं ? या क्यूँ मुझे बंगाली नहीं आती...? इसी तरह जब दोस्तोवस्की,चेखव,गोर्की,शेक्सपियर या ऐसे ही किसी जगतप्रसिद्ध लेखक कि कृतियों का हिंदी अनुवाद पढ़ती हूँ तो दिल उसे उपलब्ध कराने वाले के लिए सैंकड़ो दुआए देने लगता है |

पढने के मामले में हमारे यहाँ की सोच और विदेशी सोच में बड़ा अंतर है | हमारे यहाँ किताबे कभी भी हमारे बजट में शामिल नहीं रही | ब्रांडेड कपडे और कॉस्मेटिक्स पर हजारों रुपए फूंकने में जरा भी ना हिचकिचाने वाला भारतीय मध्यमवर्ग जब किताबों पर खर्च करने की बात पर आता है तो हिसाब लगाने लगता है | विदेशों में ऐसा नहीं है | वहां का पाठक पहले किताब पसंद करता है, उसे बगल में दबाता है फिर पूछता है की क्या कीमत देनी है ! काश ऐसा सुदिन भारत में भी देखने को मिले | आज भी भारतीय परिवार अपने बच्चों को कोर्स की किताबों के अलावा कुछ और पढता देखता है तो कोहराम मचा देता है | ये सोच बदलना जरुरी है |

कहते है की साहित्य समाज का दर्पण है | आज की युवा पीढ़ी और आनेवाली पीढ़ी की इस दर्पण से वाकफियत करानी बहुतजरुरी है | आज का युवा रात को बेड पर सोने से पहले किसी अच्छी किताब को पढने की बजाय मोबाइल पे एसएमएस भेजने में और पाने में व्यस्त रहता है | पढ़ाई से पैदा हुई टेक्नोलॉजी पढ़ाई को ही ख़त्म करती प्रतीत हो रही है | ये खतरनाक ट्रेंड है | किसी भी घर में, किसी युवा की अलमारी में किताबों की बजाय सीडी, डीवीडी के लगे ढेर चिंताजनक है | इसे रोकना बेहद जरुरी है | महान विचारक सिसरो ने यूं ही नहीं कहा की पुस्तकों के बिना घर जैसे आत्मा बिना शरीर |

किताबों के बारे में मेरी एक फेवरेट कोटेशन हैं जो मैं अक्सर अक्षर-शत्रुओं के मुंह पर मारने से बाज़ नहीं आती | किसी सयाने ने कहा है की, a person who does not read, is no better than a person who can not read…सौ फीसदी सच बात है ये | जो पढना जानकर भी नहीं पढता वो तो अनपढ़ ही हुआ ! इसीलिए कहती हूँ, किताबों के जादूभरे संसार से अपना परिचय बढ़ाइए | उससे दोस्ती कीजिये | आप कभी तनहा नहीं रहेंगे | और बोरियत नाम की बीमारी तो आपको होगी ही नहीं |

जो मित्र किसी वजह से पढ़ नहीं पाते ( रूचि नहीं है, सब्र नहीं है, वक्त नहीं है या किताबे उपलब्ध नहीं है वगैरह वगैरह ) उनको मेरी सलाह है की वो अपने बच्चों में पढने पढ़ाने की आदत जरुर जरुर डाले | किताबों से उनका परिचय करायें | ऐसा करके आप उनके भविष्य को उज्जवल बनाने में बड़ी मदद करेंगे | शब्दों से उनकी दोस्ती कराइए और यकीन जानिये की वो ज़हनी तौर पर सक्षम और मजबूत हो जायेंगे | किताबे पढना एक अद्भुत,अनूठा एवं रोमांचकारी अनुभव है | पुस्तकों का संसार अद्वितीय है, अथाह है, उनकी जगह टेक्नोलॉजी की देन गजेटरी कभी नहीं ले सकती | अपनी बात चार्ल्स डब्ल्यू. इलियट के इस जगतप्रसिद्ध कथन से ख़त्म करना चाहूंगी....
“books are the quietest and most constant of friends; they are the most accessible and wisest counsellors, and the most patient of teachers.”