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Saturday, May 8, 2010

वही मौसम - वही मंज़र


कभी इकरार चुटकी में, कभी इंकार चुटकी में,
मरासिम का किया कुछ इस तरह इज़हार चुटकी में।

वही मौसम, वही मंज़र,वही मैकश, वही साकी,
हुई है आज फिर मेरी, कसम बेकार चुटकी मे।

कभी वो प्याज़ के आंसू, कहीं पे अल्पमत होना,
बदलती है हमारे देश की सरकार चुटकी मे।

मेरा ये देश 'वन्दे मातरम्' के गीत से जागा,
उठा गांडीव झटके से, उठी तलवार चुटकी में।

लिखा है बारसा मैंने, हमेशा हाय बेजा ही ,
मिला जो साथ तेरा गए अशआर चुटकी में।

बहुत सी लज्ज़तें ऐसी, भुलाई जो नहीं जाती,
उतर जाती, खुमारे मय, खुमारे या चुटकी में।

तेरी इस रुह की ये आग, सदियों नहीं बुझती,
लगी है जुस्तज़ू--लौ मगर, हर ार चुटकी में।

मुझे जो आरज़ू है मौत की, ता-ज़िन्दगी सी है,
मगर ये मौत देती है मुझे दीदार चुटकी में।

कहाँ है, कोई भी इस शहर में, अंजान सी बातें ?
बिके हैं रोज़ ही सारे, यहाँ अखबार चुटकी मे।

हवाएं बादबानी के रुखों को मोड़ देती हैं,
हुये हैं तैरकर दरिया, हमेशा पार चुटकी में।

लगे है सरहदें 'दर्शन', घरों के बीच की दूरी,
मिला तू हाथ हाथों से, गिरा दीवार चुटकी मे।
-दर्पण साह 'दर्शन '


Tuesday, January 12, 2010

तुम अगर साथ दो

अब न जिद यूँ करो ज़िन्दगी
कुछ मेरी भी सुनो ज़िन्दगी

मैं अकेला शराबी नहीं
लड़खड़ा के चलो ज़िन्दगी

मुफलिसों का खुदा है अगर
मुफलिसी में रहो ज़िन्दगी

बात तेरी सुनूंगा नहीं
बात फिर भी कहो ज़िन्दगी

फिर कहाँ है तेरी वो तपिश
अब तलक जिंदा देखो ज़िन्दगी

मौत "दर्शन" डराती नहीं
तुम अगर साथ दो ज़िन्दगी

- दर्पण साह "दर्शन"

Saturday, April 4, 2009

अभी जिंदा है

उसकी बोझिल सासों में ,प्यार अभी जिंदा है ।
वो मेरी यादों में सही , मगर अभी ज़िन्दा हैं ॥

बच्चे उसके सो गए , सो गई हैं ख्वाहिशें ।
उस दरवाज़े पर पड़ी , नज़र अभी ज़िन्दा हैं ॥

मैकदे आज बंद हैं , और बंद हैं तीमारदार ।
रिंद अभी ज़िन्दा हैं , बीमार अभी ज़िन्दा हैं॥

दफन हो के भी तड़पता, क्यूँ रहा हूँ मैं यहाँ ?
उस दवा का लगता है, असर अभी ज़िन्दा है ॥

तुम देके भूल गई ,मैंने तो वापिस करना है ।
तुम्हारा दिल , तुम्हारी यादें , उधार अभी ज़िन्दा है ॥

तेरे आने की कभी, आई थी हमको जो ख़बर ।
दूर होती आहटों की, ख़बर अभी ज़िन्दा है ॥

शर्म आई ,बेवफाई , तूने परदा कर लिया ।
तीर ऐ नज़र, होश ऐ असर, जिगर अभी ज़िन्दा है ॥

इश्क हैं तो कायनात , मैं हूँ तो कुछ नहीं।
मैं गया तो क्या गया , हज़ार अभी ज़िन्दा हैं॥

बदल गई हो तुम तो क्या, आँखें नही बदली मगर ।
और इन बेफिक्रिओं की , फिकर अभी ज़िन्दा है ॥

- दर्पण साह "दर्शन"

Thursday, April 2, 2009

फिर से धक् होती है

यहाँ हर एक मंज़र का विरोधाभास होता है ,
कहीं कपड़े नहीं होते , कोई तन को भी रोता है ।
तेरे माँ - बाप से प्यारे , तुझे तेरे ये बच्चे हैं ,
यही काटेगा कल को तू , कि जो तू आज बोता है
इन्ही गीता के वर्कों में तेरे ख़त को भी पाया है ,
अरे! क्या लेके आया है, अरे! क्या तुझसे खोता है ?
कि फिर से आये हैं बदरा , कि फिर से धक् होती है ,
कि फिर से डाले हैं झूले , कि फिर से खेत जोता है ।
वही आवारगी अपनी ,वही अपना ठिकाना है ,
ये नज़्म गर सुबहू तो शामें इसकी श्रोता है ।
मेरे इस शोक -जलसे में, के देखो तो सभी अपने,
मेरे इस क़त्ल पे 'दर्शन' कोई घड़ियाल रोता है ।
- दर्पण साह

Saturday, February 28, 2009

अपना सा शहर

कभी मंजिलें तो कभी सफ़र ढूँढती नज़र आई,
वो मुझे रोज़ रह गुज़र ढूँढती नज़र आई।

मैं छुपता रहा उससे कई बार और वो,
सरे बज़्म मेरी नज़र ढूँढती नज़र आई।

एक हम जो बेवफाई करके भी भूल गए,
एक वो, हर दुआ का असर ढूँढती नज़र आई।

हम ढूँढ़ते रहे इस शहर में अपना सा कोई,
और वो मुझमें अपना सा शहर ढूँढती नज़र आई।

दुआओं की तरह बदल लिए थे जो चेहरे,
मौत तुम्हे इधर तो मुझे उधर ढूँढती नज़र आई।

धड़कता है दिल तो लहू भी छनता होगा,
सासें फिर वही जिगर ढूँढती नज़र आई ।

रिन्दों को तो सुना है मिल गया था खुदा,
दुनियाँ भी उसे अब इस कदर ढूँढती नज़र आई।

ऐसे भटका कि भूल गया 'अरे तू भी तो थी !
ख़ुशी बेशक मुझीको मगर ढूँढती नज़र आई।

चाँद में ज़िन्दगी के निशां ढूंढते हो मियां ?
और ये, इस जहाँ में गुज़र ढूँढती नज़र आई।

लाखों करोडों के इस 'नीती' शास्त्र में यारों ,
वो 'दर्शन' का सिफर ढूँढती नज़र आई।
(दर्शन= फिलोसोफी)

- दर्पण साह "दर्शन"

Monday, February 16, 2009

संदूक

आज फ़िर ,
उस कोने में पड़े,
धूल लगे संदूक को,
हाथों से झाड़ा, तो,
धूल आंखों में चुभ गई।
....संदूक का कोई नाम नहीं होता
..पर इस संदूक में एक खुरचा सा नाम था ।
सफ़ेद पेंट से लिखा।
तुम्हारा था या मेरा,
पढ़ा नही जाता है अब।

खोल के देखा उसे,
ऊपर से ही बेतरतीब पड़ी ...
'ज़िन्दगी'।
मुझे याद है......

...माँ ने,
'उपहार' में दी थी।
पहली बार देखी थी,
तो लगता था,
कितनी छोटी है।
पर आज भी ,जब पहन के देखता
तो, बड़ी ही लगती है,
शायद...

...कभी फिट आ जाए।

नीचे उसके,
तह करके सलीके से रखा हुआ है...

...'बचपन' ।
उसकी जेबों में देखा,
अब भी,
तितलियों के पंख ,

कागज़ के रंग,

कुछ कंचे ,

उलझा हुआ मंझा,

और,
और न जाने क्या क्या....
कपड़े छोटे होते थे बचपन में,
जेब बड़ी....

कितने ज़तन से,
...मेरे पिताजी ने,
मुझे,
ये 'इमानदारी' सी के दी थी ।
बिल्कुल मेरे नाप की ।
बड़े लंबे समय तक पहनी।
और,
कई बार,
लगाये इसमे पायबंद ,
कभी मुफलिसी के, और कभी बेचारगी के,
पर, इसकी सिलाई उधड गई थी, एक दिन।
....जब भूख का खूंटा लगा इसमे।

उसको हटाया,
तो नीचे पड़ी हुई थी 'जवानी'
उसका रंग
...उड़ गया था,
समय के साथ साथ।
'गुलाबी' हुआ करती थी ये....
अब पता नही...

कौनसा नया रंग हो गया है?

बगल में ही पड़ी हुई थी 'आवारगी',
....उसमें से,
अब भी,
शराब की बू आती है।

४-५ सफ़ेद, गोल,
खुशियों की 'गोलियाँ',
डाली तो थीं,संदूक में
पर वो खुशियाँ...

.... उड़ गई शायद।

याद है...
जब तुम्हारे साथ,
मेले में गया था,
एक जोड़ी वफाएं खरीद ली थी।
तुम्हारे ऊपर तो पता नहीं,
पर मुझपे ये अच्छी नही लगती।
और फ़िर...
इनका 'Fashion' भी,
...नहीं रहा।
'Joker' जैसा लगूंगा इसको लपेटकर।

...और ये शायद 'मुस्कान' है।
तुम,
कहती थी न....
जब मैं इसे पहनता हूँ,
तो अच्छा लगता हूँ।
इसमें भी दाग लग गए थे,
दूसरे कपडों के।
हाँ ...
इसको.....

'जमाने' और 'जिम्मेदारियों' के बीच....

रख दिया था ना ।
तब से पेहेनना छोड़ दी।

अरे...
ये रहा 'तुम्हारा प्यार'।
'valentine day' में,
दिया था तुमने।

दो ही महीने चला था,
हर धुलाई में, सिकुड़ जाता था।
हाँ...
खारा पानी ख़राब होता है, इसके लिए,
भाभी ने बताया भी था,
...पर आखें ये न जानती थी।

चलो,
बंद कर देता हूँ,
सोच के...
जैसे ही संदूक रखा, देखा,
यादें तो बाहर ही छूट गई,
बिल्कुल धवल,
Fitting भी बिल्कुल
...लगता था,
आज के लिए ही खरीदी थी,
उस 'वक्त' के बजाज से जैसे,

कुछ लम्हों की कौडियाँ देकर...
चलो,आज इसे ही...

पहन लेता हूँ....

- दर्पण साह