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Thursday, January 12, 2012

मेरा हमसफ़र

एक बार फिर कौशल सा'ब का कलाम आपकी आँखों  में सरमाया करना चाहता हूँ क़ुबूल करें .. आपकी दुआओं का तलबगार रहूँगा..

आधा छूटा हुआ जाम
खुली हुई किताब
रिन्दों का साथ
फिर भी अकेला हूँ
याद आती है वो याद
जिनमें  मैं जवाँ हुआ         
क्या कहूं?
उस रात की बात
मेरा हबीब मुझसे जुदा हुआ
वो हसीं लम्हे,
उनकी जुल्फों का साथ
उनके झुमके की खनक
वो बिंदिया  की चमक
अँधेरे में उजाला देने वाली
याद आती है वो याद
जिनमें मैं जवाँ हुआ
क्या करूँ?
कैसे मिटाऊँ उनकी याद
उनका हमसफ़र जो बदल गया 

- कौशल किशोर, कानपुर

http://dilkikashmakash.blogspot.com/
( और गहराई से इनको यहाँ पढ़ा जा सकता है)

Tuesday, November 22, 2011

हिना के जैसी सुन्दर थी

वो कितनी प्यारी  प्यारी  थी
कुछ खुशबू सौंधी  सौंधी थी
कुछ हिना के जैसी सुन्दर थी
कुछ गुलशन जैसी महकी थी
कुछ समीर सी चंचल थी
कुछ माखन सी तासीर भी थी
वो कितनी प्यारी प्यारी थी


एक दिल था भोला  भाला सा
जिसमे कितनी गहराई थी
नैना थे बिलकुल हिरनी से
दुनिया की जिनमे परछाईं थी
सीरत तो बिलकुल ऐसी कि  
जैसे खुदा से शोहरत पायी थी
वो कितनी प्यारी प्यारी थी.

जब मुझे देखती थी वो तब
सारी खुशियाँ मिल जाती थी
सोंचा इक दिन मैंने कि
बस उसकी तस्वीर बना डालूँ
पर बन कर जब तैयार हुई
तो अपनी ही बेटी पाई थी.
अब इतना ही बस कहना है
वो कितनी प्यारी प्यारी है.
वो सबसे  प्यारी प्यारी है.
- कौशल किशोर, कानपुर

Saturday, November 12, 2011

तू भी कल प्यार में हो

आज एक और कलम की इबारत आपके हाथों  में सौंप रहा हूँ. कौशल किशोर जो की एक इंजीनियरिंग कॉलेज में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं. उनकी लिखी एक नज़्म कुछ यूँ हैं - 

मत उठा मेरे प्यार पे ऊँगली ऐ शाहिद 
मत करो दूर दो रूंहों को अलग ऐ शाहिद 
हम भी अल्लाह के बन्दे हैं कुछ तो डर ऐ शाहिद 
कहीं ऐसा न हो कि, तू भी कल प्यार में हो 
और बन जाऊं मैं शाहिद 

- कौशल किशोर, कानपुर
( शाहिद एक अरबी लफ्ज़ है जिसका मायने गवाह है )