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Sunday, March 4, 2012

दरिया होके समंदर की अदा रखता है

वो रूह में मोती जुल्फों में हवा रखता है
दरिया होके  समंदर की अदा रखता है

दिल में रखके मोहब्बत की रौशनी क्यूँ 
निगाहों में अदावत की ज़फ़ा रखता है

क्यूँ नहीं रह पाता अजीज़ दिल के पास
वक़्त बेरहम है एक फ़ासला रखता है

हम आज समझे ग़रीबों की गुमनामियां
जिसको देखो रईसों का पता रखता है

लुटा के जा रहे हैं हम सब कुछ प्यार में
देखना है कौन कितना वास्ता रखता है

- आलोक उपाध्याय "नज़र"

Tuesday, November 1, 2011

आज तक

आज फिर  आपके सुपुर्द आलोक  उपाध्याय "नज़र" के शे'रों को कर रहा हूँ- 

टूटे इकबारगी,  बिखर रहे हैं आज तक 
ज़िन्दगी की क़ैद में मर रहे हैं आज तक 

वो बेबाक़ था, दिल को छलनी  कर गया 
हम दिल की सुराखें भर रहे हैं आजतक 

लोग उम्र काट देते है किसी एक के सहारे
उसी के याद में दिन गुज़र रहे है आजतक 
- आलोक  उपाध्याय "नज़र"

Friday, May 7, 2010

तुम आने वाले हों शायद


बहुत दिनों से आलोक उपाध्याय "नज़र" साहब को पढने का मौका नहीं मिल पा रहा था, आज इक नई रचना के साथ हमारे बीच में आइये लुत्फ़ लें-

कुछ उजला कुछ धुंधला सा है
दिल का मौसम बदला सा है
जब उलझे तब तब समझे
जीवन एक मसला सा है
तेरी मेरी हालत एक तरह
लोग कहें तू पगला सा है
नम आँखों की लाख वजह
दिल का दुःख पिघला सा है

"गए लोग कुछ ले आयेंगे"
देखो तो दिल बहला सा है
दिलोदिमाग़ की जंग है ये
कुछ न कुछ घपला सा है
तुम आने वाले हो शायद
देखो रस्ता उजला सा है

- आलोक उपाध्याय "नज़र", इलाहबाद
( लेखक सॉफ्टवेर इंजीनियर हैं )

Friday, February 27, 2009

ग़ज़ल

हमारी तकनीकी टीम के सदस्य आलोक उपाध्याय "नज़र" की ग़ज़ल का लुत्फ़ उठायें

कभी सहरा सा लगे कभी समन्दर सा लगे
मुझे अच्छा लगे जब भी तू बेखबर सा लगे

मै तेरी हर बात पर ही मोम सा पिघला हूँ
और तू है कि इस बुरे दौर में पत्थर सा लगे

मै बेबाक़ ऐसे ही चुभता हूँ पहले ही समझ ले
इससे पहले कि कोई लफ्ज़ तुझे नश्तर सा लगे

वो मेरे साथ है ये दुनिया समझती है मगर
मुझे तो ये फासला एक लम्बे सफ़र सा लगे

मुश्किलें शायद इतनी पड़ी कि आसां हो गयीं
हर रंज ओ ग़म तेरे चहरे पर बेअसर सा लगे

फितरतों के इस खेल को अब तक न समझा
"नज़र" को जो भी लगे बिलकुल नज़र सा लगे

-आलोक उपाध्याय 'नज़र'

Monday, February 16, 2009

ग़ज़ल

सुबह उठकर हमने यही हर बार देखा है
हर तरफ़ बस फिक्र -ऐ रोज़गार देखा है

पिछली शब् की बस इतना सी दास्ताँ है
बिस्तर की सिलवटों को बेकरार देखा है

नहीं मानते अब इन काठ के खिलौनों से
मेरे बच्चों ने जब से रिमोट का बाज़ार देखा है

जवानी में ज़माने की रंगत का सबब और
जेहन पर इश्क का एक झूठा खुमार देखा है

जो कभी पोशाक की तरह फबते थे रिश्ते
अब जब गौर से देखा है तार तार देखा है

तुम चाहो तो निगाह-ओ-रुखसार में उलझो
'नज़र' ने उनके दिल के आर पार देखा है

- आलोक उपाध्याय "नज़र"