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Thursday, April 29, 2010

इस तरह कहानी बन जाती

किस्मत की भूल सुधर जाती , जीने का अर्थ निकल आता
इस तरह कहानी बन जाती, कुछ तुम कहती कुछ मैं कहता।

तुम आये थे खुशियाँ लेकर, दिल बैठा सौ ग़म लेकर
तुमने हँसना सिखलाया था, इस दिल को नया जनम देकर

मैं उम्र बिता देता यूँ ही, तुम मुस्काती मैं हंस लेता।
इस तरह कहानी बन जाती, कुछ तुम कहती कुछ मैं कहता

मैं लड़ा बहुत इस दुनिया से, सह गया बहुत कडवे ठोकर
तुम साथ रहे मैं जीत गया, पर हार गया तुमको खोकर

तुम परस थे गर छू देते, मैं भी कंचन मन हों जाता
इस तरह कहानी बन जाती, कुछ तुम कहती कुछ मैं कहता

इक उम्र बिता दी है हमने, दिल मैं घुटकर, मन में घुटकर
इस तरह कहानी बन जाती, कुछ तुम कहती कुछ मैं कहता

- सुनील अमर
( लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं)

Monday, March 29, 2010

हार गया तुमको खोकर

आज आपको साहित्य के दिग्गज और सम्पद्किये पेज पर अक्सर अपने का दर्ज करने वाले कवी से रूबरू करा रहा हूँ। उनकी ये वो रचना है जो उन्होंने अपने शुरूआती दिनों में लिखी। पेशे नज़र है-

मैं लड़ा बहुत इस दुनिया से
सह गया बहुत कडवे ठोकर
तुम साथ रहे , मैं जीत गया
पर हार गया तुमको खोकर।

- सुनील अमर