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Sunday, April 27, 2014

नई क़लम का पुनः प्रकाशन ( हार्ड कॉपी )

नई क़लम - उभरते परिवार की ख़ुशी आप सब के साथ बाँट रहा हूँ... 14 साल पहले मैंने और मेरे अजीज़ दोस्त दीपक मशाल ने इस पत्रिका को निकाला था..हुआ यूँ , इंजीनियरिंग के चक्कर में मुझे मेरठ जाना पड़ गया और दीपक को. दिल्ली वैज्ञानिक होने के लिए..... उस वक़्त एक अंक निकल पाया फिर गाड़ी.. रुक गयी...

लेकिन साहित्य के लगाओ को कभी भी कम न कर पाया या यूँ कहें न हुआ. होना भी नहीं चाहिए था.. सुकून जो मिलता था, मिलता है.... तो उस सुकून को हम दोनों ने नई कलम- उभरते हस्ताक्षर ब्लॉग बनाकर ये सिलसिला चलता रहा ...आप सब लेखक मित्रों की रचनाएं समय- समय पे मिलती रहीं... और हम उसे नई कलम के मंच पे शाया करते रहे.

आज फिर साहित्य के पहियों की पटरियों पे नई कलम -उभरते हस्ताक्षर दौड़ने को तैयार है.. आपके प्यार की दरकार हमेशा की तरह रहेगी...

नए कलेवर और नयी साज -सज्जा के के साथ फिर से नई क़लम -उभरते हस्ताक्षर आपके हाथों में होगी.. 4 मई 2014 को हम फिर से अपने मेहमानों के बीच उस पौधे में पानी दे रहे हैं...

इसी सिलसिले में में आपसे लेख, व्यंग्य, नज़्म, ग़ज़ल, कवितायें, कहानी , उपन्यास ...कोई साहित्यिक शोध पत्र आपसे भेजने को कह रहा हूँ.. आप सब से उम्मीद है आप हमारा सहयोग करेंगे....वैसे ही जैसे आप इसके ई - संस्करण में करते रहे...

आप हमें अपनी रचनाएँ आज रात तक इस मेल पते पर भेजने का कष्ट करें -

nai.qalam@gmail.com

आपका
शाहिद 'अजनबी' और दीपक 'मशाल'

Wednesday, January 26, 2011

साहित्यिक प्रतियोगिता


ये बड़े हर्ष का विषय है की साहित्य को अब आम आदमी भी समझने की कोशिश कर रहा है। पहले केवल हिंदी वाले (हिंदी वालों से मेरा मतलब हिंदी विधा से सम्बद्ध) ही साहित्य में रूचि लेते थे। आज एकअच्छा खासा वर्ग है जो की , इंजीनियरिंग और मेडिकल से वास्ता रखता है और हिंदी से बखूबी जुड़ा हुआ है पिछ्हले दिनों मेरी तोमर साहब से मुलाकात हुई। उन्होंने बताया सारथि इंटरटेनमेंट, A2Z news channel, The Mind & Memory - Study Circle, Kumar Academy, के सहयोग से प्रथम वार्षिक युवा साहित्यकार प्रतियोगिता आयोजित की जा रही है। कहानी, कविता, हास्य कविता, गीत, व्यंग्य लेख , निबंध/आलेख लिखने में रूचि रखने वालों की रचनाएँ आमंत्रित कर रहा है। मैं बात को यहाँ वहां न घुमा कर सीधे नियम व शर्तें दर्ज कर रहा हूँ। साथ में संपर्क सूत्र भी दिए जा रहे हैं।


  • उपरोक्त वर्णित छहों कैटेगरी में प्रथम, दुतीये, त्रितिये तथा दो सांत्वना , कुल पांच - पांच पुरुस्कार प्रस्तावित हैं।

  • एक प्रविष्टि में केवल एक गद्य रचना अथवा तीन काव्य रचनाएँ ही स्वीकार्य होंगी।

  • एक रचनाकार केवल एकं कैटेगरी अपनी प्रविष्ट नि: शुल्क भेज सकता है। किन्तु एक से अधिक या उसी कैटेगरी में अतिरिक्त प्रविष्टि हेतु प्रति प्रविष्टि शुल्क रूपए सौ देय होगा।

  • रचनाएँ पूरी तरह मौलिक तथा अप्रकाशित होनी चाहिए। इस सम्बन्ध में रचनाकार को स्वं हस्ताक्षरित घोषणा पत्र संलग्न करना होगा।

  • रचनाएँ तीन प्रतियों में सुपाठ्य स्वं के छाया चित्र व जीवन वृत सहित एक लिफाफे में बंद कर स्वं अथवा डाक , कोरियर द्वारा निम्न पते पर भेजें। कुमार अकेडमी ११०/ २०१ आर के नगर गुमटी गुरुद्वारा के पास जी टी रोड कानपुर -२०८०१२

  • रचनाकार की आयु १ जनवरी २०११ को ३५ वर्ष से अधिक नहीं होनी चाहिए।

  • पुरुस्कृत रचनाकारों सहित अन्य चुने हुए स्तारिये व अच्छे रचनाकारों ko सारथी इंटरटेनमेंट के सौजन्य से सेटेलाईट नेशनल न्यूज़ चैनल A2Z ( देखे BIG DTH- 425) पर रचनापाठ का अवसर दिया जायेगा।

  • निर्णायक मंडल का निर्णय अंतिम तथा मान्य होगा।

  • रचनाएँ जमा करने की अंतिम तारीख ३१ जनवरी २०११ है।

  • पुरुस्कार वितरण ८ फ़रवरी २०११

  • आप मेल भी कर सकते हैं नई कलम के मंच के माध्यम से - nai.qalam@gmail.com
प्रस्तुति -
- शाहिद अजनबी

Tuesday, May 18, 2010

जा कहाँ रहे हैं???? देखिये तो किसका जन्मदिन है आज-------------------->>> दीपक 'मशाल'







दोस्तों आज पूरे दो साल हो गए उस लम्हे को जिसमे इस ब्लॉग को पंजीकृत किया गया था. सोच रहा हूँ इस दूसरे जन्मदिन पर आप सबको वो कहानी सुना ही दी जाये जो इस नाम 'नई कलम-उभरते हस्ताक्षर' के नाम के उद्भव से जुड़ी हुई है. कब से दिल में छुपा के रखे हूँ इस बात को और देखिये ना हमेशा कहने का सोचता रहा पर वक़्त के घोड़े की रफ़्तार पीछे छूट गए माजी के किले देखने के लिए मुड़ने नहीं दे रही थी. पर आज बताना जरूरी समझा तो कह दे रहा हूँ..

बात तबकी है जब हम.. हम मतलब मैं और मेरे अज़ीज़ दोस्त जनाब मोहम्मद शाहिद मंसूरी 'अजनबी' उस उम्र में थे जब घर में आलू की सब्जी बना रही मम्मी से सब्जी में पानी डालने से पहले अपने खाने के लिए सूखे आलू निकालने की जिद कर बैठते या करेले, लौकी, कद्दू, टिंडे जैसे नामों से ही चिढ़ा करते थे. हाँ उसी लड़कपन या किशोर उम्र की बात कर रहा हूँ मैं.. मैंने और शाहिद भाई ने तब इंटरमीडिएट पास किया ही था, अब जैसा कि आप जानते ही हैं कि जब कोई छात्र कॉलेज ज्वाइन करता ही है तब अपने आप को दुनिया का बादशाह समझता है.. उसे लगता है कि उसके लिए कोई भी काम नामुमकिन नहीं. वो साहित्य की डोर ही थी जो हम दोनों को जोड़ती थी वर्ना मैं जीव विज्ञान का विद्यार्थी था और शाहिद गणित के.समरलोक, हंस, कथादेश पढ़ते-पढ़ते और टूटी-फूटी कविता, शायरी, कहानी, लेख लिखते हुए हमें अहसास होने लगा था कि हम साहित्यकार नहीं तो उसकी दुम जरूर हो गए हैं. बस एक दिन तैश में दोनों ने अमर उजाला और दैनिक जागरण जैसे अखबारों में ख़ास ख़त और पत्र कॉलम के लिए पत्र लिख के डाल दिए.. थोड़े से अंतराल के बाद हम दोनों के पत्रों को ही ये दोनों अखबार प्रकाशित करने लगे. बस फिर क्या था.. बन गए हम साहित्यकार.

अब जब खुद कुछ बन गए(अपनी नज़र में) तो सोचा कि क्यों ना कोई ऐसा मासिक साहित्यिक अखबार निकला जाए जो स्थापित के साथ-साथ नए रचनाकारों की रचनाओं को प्राथमिकता देकर उन्हें प्रोत्साहित करे.. सोचा कि नाम क्या रखा जाए??? काफी सोच विचार कर तय हुआ कि 'नई कलम-उभरते हस्ताक्षर' नाम मकसद के अनुरूप खूब जाँच रहा है और बस फिर क्या था भाई, बनने लगे बड़े-बड़े हवाई किले और इसमें हमने एक बेचारे कम्प्युटर प्रशिक्षण केंद्र के मालिक जो कि हमारी ही उम्र का था, को भी शामिल कर लिया. लगे उस बेचारे को भी खूब जमके अस्तित्वविहीन कैनवास पर आभासी प्रोजेक्टर से सुनहरे भविष्य की फिल्म दिखाने. अखबार के इस तीसरे शेयर होल्डर का नाम आशुतोष अग्रवाल था और सच में हम हमेशा इस सहयोग के लिए उसके आभारी रहेंगे.
तो प्रथम संस्करण में २०० समाचार पत्र निकालने का फैसला लिया गया. जिले भर से युवा और वरिष्ठ साहित्यकारों की रचनाएं ली गयीं.. खुद ही एडिटिंग भी की और इस तरह एक ८ पेज का साहित्यिक अखबार बनकर, छपकर तैयार भी हो गया. बात जब उसे बाज़ार में लाने की आयी तो सबसे पहले कुछ लोगों को मुफ्त में दिए गए और बहुत थोड़े ने शायद खरीदा भी. पर अगर किसी से उसका वार्षिक या आजीवन सदस्य बनने को कहते तो वो पहले हमें ऊपर से नीचे तक देखता और फिर मुस्कुरा कर सिर हिला देता. अब ये बात हमें भले ना समझ में आ रही हो पर वो समझ रहे थे कि कल को ये बच्चे अपना-अपना कैरियर बनाने में लग जायेंगे और हमारे पैसे तो गए.. फिर भी रो धो कर किसी तरह हमने २ अंक तक अखबार को खींचा पर उसके बाद दम फूलने लगा. हमारे तो ५-५०० रुपये लगे थे पर वो बेचारा कम्प्यूटर्स एंड प्रिंटर्स वाला तो लुट-पिट गया ना. सोच रहा था कि किस मनहूस घड़ी में इन मंजे हुए साहित्यकारों पर भरोसा कर लिया.. :) अब होना क्या था योजना खटाई में....... अजी खटाई में नहीं बल्कि.. खटाई के मर्तबान में पड़ के सील हो गई.
इसके बाद शाहिद बाबू अपनी पढ़ाई में लग गए और मैं अपनी में.. करते करते शाहिद बन गया इंजीनियर और मैं पोस्ट ग्रेजुएशन के बाद दिल्ली के एक संस्थान में रिसर्च प्रोजेक्ट से जुड़ गया. बात फिर से चालू हुई तब जब मैं रिसर्च को आगे बढ़ाते हुए यहाँ बेलफास्ट, उत्तरी आयरलैंड(यूं.के.) आ पहुंचा.. तब तक शाहिद भाई ने भी कहीं जॉब ज्वाइन कर ली थी. जैसे ही कुछ स्वावलंबी हुए नहीं के साहित्य का कीड़ा फिर शीतनिद्रा(हाईबरनेशन) से निकल कर बाहर आ गया. किसी तरह मैंने अन्य दोस्तों से शाहिद का नंबर लिया और बात की तो साहित्य ने मुझे ब्लॉग के बारे में बताया... तो मैंने पूछा ''भाई ये क्या 'बला' है?'' और जब मैंने अपनी रचनाओं को दुनिया के सामने लाने का यह मंच देखा तो बस पूछिए ही मत दिल कितना ऊपर उछल कर छत से जा टकराया (तब से लेकर आज तक सर पर ब्लॉग नाम का गूमड़ पड़ा हुआ है). शाहिद जे ठहरे इंजीनियर बताया कि ''भाई हमारा 'नई क़लम-उभरते हस्ताक्षर' अबकी ब्लॉग के रूप में फिर से जिन्दा हो गया है''.. जिस दिन इस ब्लॉग की नींव राखी गई वो आज ही का शुभ दिन था यानी १८ मई २००८, बस तबसे लेकर अब तलक कई अच्छा लिखने वाली कलमों, साहित्य के उभरते हस्ताक्षरों को इस मंच पर आमंत्रित किया.. सभी का भरपूर प्यार मिला(और आगे भी मिलता रहेगा). बीच में हुआ ये कि शाहिद जी अपने काम में कुछ ज्यादा ही मशगूल हो गए. 'नई कलम-उभरते हस्ताक्षर' के अलावा मैंने भी एक स्वतंत्र ब्लॉग रूपी पौधारोपण किया जिसे आप लोग निरंतर अपने स्नेह और आशीर्वाद से सींच ही रहे हैं.
अभी तक जिनकी रचनाएं इस मंच पर प्रकाशित हुईं उन साथियों के शुभ नाम हैं-
सुनील उमर
  • शिखा वर्मा "परी"
  • नीरा राजपाल
  • शगुफ्ता परवीन अंसारी
  • दिव्या माथुर
  • जतिंदर "परवाज़"
  • महेश चन्द्र गुप्त "खलिश"
  • तमन्ना
  • बीती ख़ुशी
  • आकांक्षा यादव
  • अब्दुल जलील
  • जूनून इलाहाबादी
  • कृष्ण कुमार यादव
  • गार्गी गुप्ता
  • प्रसन्नवदन चतुर्वेदी
  • अमित साहू
  • डा0 कुमारेन्द्र सिंह सेंगर
  • प्रिया- प्रिया
  • अरुण "अदभुत"
  • जय नारायण त्रिपाठी
  • दर्पण साह
  • श्यामल सुमन
  • योगेश समदर्शी
  • कौशल पाण्डेय
  • नरेन्द्र त्रिपाठी
  • सीमा गुप्ता
  • पवन उपाध्याय "राज़"
  • रुबीना फातिमा "रोजी"
  • दीपक चौरसिया "मशाल"
  • आलोक उपाध्याय "नज़र"
  • शाहिद "अजनबी"
जल्द ही ये ब्लॉग एक वेबसाईट के रूप में आपको हिन्दी की सेवा में तत्पर करता दिखेगा पर उसके लिए आपके प्यार और सहयोग की नितांत आवश्यकता है. इसी श्रंखला के तहत हिन्दी ब्लॉग की दुनिया के कुछ सक्षम हस्ताक्षरों को एक साथ, एक पुस्तक के रूप में सबके सामने लाने का प्रयास चल रहा है, जो ऊपरवाले की कृपा से जल्दी ही आपके हाथों में होगा.
आज इस खुशी के दिन मैं आप सबसे एक बार पुनः अपने इस चहेते ब्लॉग को सक्रिय सहयोग देने का अनुरोध करता हूँ.

आपके
शाहिद 'अजनबी' एवं दीपक 'मशाल'
(आपको जानकर खुशी होगी कि हिन्दी ब्लोगिंग के जानेमाने पॉडकास्टर श्री गिरीश बिल्लौरे जी ने अपने प्रिय साथियों के अनुरोध पर ब्लोगिंग में पुनः वापस आने के लिए हाँ कर दी है और शीघ्र ही वो पुनः सक्रिय दिखेंगे.. उनका तहेदिल से स्वागत किया जाए)

Friday, April 3, 2009

हमारा परिचय

बहुत दिनों से हमारे पास कई सवाल आ रहे थे की "नई कलम - उभरते हस्ताक्षर" के मंच पर साहित्य प्रकाशित करने की नियम व शर्तें क्या हैं ? आज सम्पादक मंडल उसका जवाब लिख रहा है। आप सुधि पाठकों से रचनाएँ आमंत्रित हैं। और अधिक जानकारी के लिए दायीं तरफ़ "नई कलम उभरते हस्ताक्षर" क्या है ? के नीचे क्लिक करें।
- सम्पादक मंडल

Sunday, May 18, 2008

नई कलम का आगाज़

ये बड़े हर्ष का विषय है की आज नई कलम अपना आगाज़ कर रही है। यहाँ हमारी नई कलम की टीम कवितायें , ग़ज़लें , बहस जरी है
इस्थायी स्तम्भ प्रारम्भ कर रही है ।
हमेशा से जब भी कुछ लिखा गया उसको लोगों ने एक बन्धन मैं बांधे रखा । यहाँ हम आजादी से लिखने को स्वतंत्र हैं । साहित्य समाज का एक आइना है लेकिन दुनिया उस आइने को देखना नहीं चाहती । यहाँ हम नई कलम यानि कवियों , शायरों और लेखकों से उनके द्वारा रचित सामग्री आमंत्रित करते हैं और उम्मीद करते हैं ये सफर जीना व जीना आगे बढे । हमें आपकी प्रतिक्रियाओं का इंतजार रहेगा । अपनी प्रतिक्रियाओं से अवगत कराकर इस अभियान को सफल बनायें ।
कवितायें , ग़ज़लें और बहस जरी है के अंतर्गत अपने पत्र यहाँ भेजें ।

nai.qalam@gmail.com