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Sunday, December 8, 2019

कविता -अमित अकबरपुरी








जीवन का सत्य मरण में है 

बाक़ी सब कुछ विचरण में है ,

जो उदय हुआ वो अस्त भी है

पागल मानव तो व्यस्त ही है 

एक हवा भी आएगी इक दिन

ले जायेगी साँसे भी इक दिन

ये भवन छोड़कर चल दोगे

होगा भू कम्पन भी इक दिन

ये स्वार्थ स्वार्थ का खेल सनम

ये व्यर्थ व्यर्थ का प्रेम सनम 

कुछ मिला नहीं कुछ मिलेगा क्या

आ साहिल पे संग बैठे हम !

Sunday, June 19, 2016

'' अब्बा होना हंसी खेल नहीं है ''

अब्बा ,
आज इतने सालो के बाद 
आपके अब्बापन के बारे में सोचता हूँ तो 
दांतों तले ऊँगली दबा लेता हूँ /
वाकई अब्बा होना 
हंसी खेल नहीं है /
आपने सफल अब्बा होने के 
कितने बार सबूत दिये /
अब्बा की भूमिका में आपने 
कितनी भिन्नताये पेश की /
आपकी सशक्त भूमिका की बदौलत 
हमारी जिंदगी की फिल्म 
हिट हो गई /


अब्बा ,
दुनियां में बहुत से कठिन काम है 
उसमे सबसे कठिन है 
अब्बा होना /
अब्बा ,
जीवन के रंगमंच पर 
अब्बा की कठिन भुमिका 
इतने सफलता पूर्वक निभा कर 
आप चले गये 
और किसी ने ताली भी नहीं 
बजाई । --------------- 


अखतर अली 

आमानाका ,
रायपुर मोबाईल - +919826126781

Saturday, June 13, 2009

मुझसे पूँछेगा खुदा


मुझसे पूँछेगा खुदा,

क्या किया तुमने

जमीं पे जाके,

आदमी का तन पाके।

मैं तुझमे ढूंढता रहा

जगह अपनी,

और तू खुश था,

मुझे पत्थरों में ठहरा के।

अपनी सिसकियों के शोरों में,

आह औरों की

ना सुन पाए,

सपने बुने तो सतरंगी मगर,

अपने लिए ही बुन पाए।

जो लिया सबसे

तुम्हे याद नहीं

और देके थोड़े का हिसाब,

भूल नहीं पाए।

क्या करुँ मैं

बना के वो इन्सां,

काम इन्सां के जो,

कर नहीं पाए।

मैंने चाहा था,

तुम लिखो नसीब दुनिया का,

तुम रहे बैठे,

दोष अपने नसीब को लगा के।

याद मुझको तो किया,

किया मगर घबरा के।

बाँट के मुझको कई नामों में,

लौट आये हो ज़हर फैला के।


दीपक 'मशाल'

Tuesday, May 26, 2009

मोक्ष


परिक्रमा
करते थे प्रश्न,
अँधेरे मन के
कोटर के,
उत्तर कोई निकले सार्थक,
जिसको
हथिया के प्राप्त करुँ,
विचलित ह्रदय
संतृप्त करुँ।
किस राह को
मैं पा जाऊँ?
किसपे
कर विश्वास चला जाऊँ?
किसको भरूँ,
अंक में मैं,
जीवन-दर्शन या जग-पीड़ा?
करुँ नर-सेवा या
नारायण?
बनूँ किसका कर्त्तव्य-परायण?
चलूँ पथ
मोक्ष प्राप्ति का मैं,
या पीड़ा दीनों की हरूँ हरी?
गुँथा हुआ मैं
ग्रंथि में,
था अंतर्मन टटोल रहा बैठा।
सहसा घिर आये मेघा
आबनूस रंग चढ़े हुए,
गरजे,
बरसे,
कौंधी बिजली,
मुझे वज्र इन्द्र का याद हुआ,
त्याग दधीचि का सार हुआ।
तब ज्ञान हुआ जो
करनी का,
जीते जी मोक्ष प्राप्त हुआ।

दीपक 'मशाल'

Wednesday, April 8, 2009

जूता खींच के मारो भइया

शब्दों के माध्यम से सीधी चोट करने में माहिर, "नई कलम" के जाने पहचाने चेहरे को आपके समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूँ । आज के व्यंग्य के जरिये उनके दो अलग - अलग जज्बातों को पढ़ें। आज आपके हवाले पहला जज्बात किया जा रहा है। आने वाले दिनों में दूसरे जज़्बात का आनंद लें।

अब भी अगर न मानें ये तो,
जूता खींच के मारो भइया
बाट लगा दो बदमाशों की,
जूता खींच के मारो भइया।

जियो लाल जरनैल खबरिया,
तुम्हें कभी न लगे नजरिया,
लिखते-लिखते खबरें तुमने,
इनकी खबर भी ले ली भइया।
बुश हों, वेन हों या हों पिल्लू(पी। चिदंबरम)
जूता खींच के मारो भइया।

ये लार गिराते वोटों पर,
और रोलर धरते छाती पर,
घुस आये तालिबानी घर में,
इनकी बदली न परिपाटी पर।
ऐसे नेताओं के सर पे,
जूता खींच के मारो भइया।

सेंक रहे सब अपनी रोटी,
आज वतन की लाश पर,
मारा हिन्दोस्तां को पहले,
फिर रोते अंतिम अरदास पर।
ऐसे नौटंकीबाजों के मुंह पर,
जूता खींच के मारो भइया।

अरबों भर के झोली में वो,
दिखलाते बस थोड़ा-थोड़ा,
जो देश नचाते अंगुली पर हैं,
उनका घर ना गाड़ी-घोड़ा।
ऐसे झूठे मक्कारों को,
जूता खींच के मारो भइया।

आग लगा दो इन चोरों को,
पुनः नया इतिहास बनाओ,
वक़्त विकास का है बन्धु ये,
अपना ना परिहास बनाओ।
उगाओ सूरज क्रान्ति का नव,
जूता खींच के मारो भइया।

- दीपक चौरसिया "मशाल"