Showing posts with label योगेश समदर्शी. Show all posts
Showing posts with label योगेश समदर्शी. Show all posts

Saturday, May 9, 2009

जीना चाहते हैं वह मर कर।



नाखुश इतने, नफरत कर कर।

रक्त पीपासा, उर में भर कर।

अपना नया ईश्वर रच कर,

जीना चाहते हैं वह मर कर।


हाथ नहीं हथियार हैं उनके,

मस्तक धड़ से अलग चले हैं।

इच्छा और विवेक से अनबन,

आस्तीन में साँप पले हैं।

काम धर्म का मान लिया है।

जाने कौन किताब को पढ कर।

अपना नया, ईश्वर रच कर।

जीना चाहते, हैं वह मर कर।


खून और चीत्कार का जिसने,

अर्थ बदल कर उन्हे बताया।

निर्दोषों को मौत का तौहफा,

दे कर जिसने रब रिझाया।

माँ के खून को किया कलंकित,

झूठे निज गौरव को गढ कर।

अपना नया ईश्वर रच कर।

जीना चाहते हैं वह मर कर।


बचपन की मुस्कान है जीवन,

काश उन्हें भी कोई बताये।

रास रस उल्लास है जीवन,

कोई उनको यह समझाये।

क्यों खुद को आहूत कर रहे,

भ्रमित उस संसार में फंसकर।

अपना नया ईश्वर रच कर।

जीना चाहते हैं वह मर कर।


- योगेश समदर्शी

Monday, February 16, 2009

गांव का घर मानव मंदिर

गांव लोगों के रहने का,
केवल एक स्थान नहीं है।
गांव का घर मानव मंदिर,
पत्थर का मकान नहीं है।

सभ्यता के चरम पै जाकर,
भाव सरल मन में जब आएं।
प्रकृति की गोद में खेलें,
पंछी संग बैठे बतियायें।
खुली हवा में करें ठिठोली,
अंदर तक चित्त खुश हो जाए।
गांव छोड कर ऐसे सुख का,
अन्य कोई स्थान नहीं है।
गांव का घर मानव मंदिर
पत्थर का मकान नहीं है

अपवादों को भूलो, पहले,
गांव का विज्ञान उठाओ।
कम साधन में जीने का,
वह पहला सुंदर ज्ञान उठाओ।
सहभागी हो साथ जिंएंगे,
जीवन एक अभिनाय उठाओ।
कल यंत्रों से चूर धरा को,
धो दे वह अरमान नहीं है।
गांव का घर मानव मंदिर,
पत्थर का मकान नहीं है।
- योगेश समदर्शी