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Friday, April 29, 2011

मेरा साया


कहते हैं नज़्म किसी भी वजह से लिखी जा सकती है कोई इसकी जगह मुक़र्रर नहीं, कोई वक़्त भी तय नहीं। उम्र में सबसे छोटी , इस मंच की कवियत्री और उनकी ये रचना जो उन्होंने सिटी बस में लिखी। आप सुधि पाठकों साथ साझा कर रहा हूँ। आपके प्यार का मुन्तजिर रहूँगा-
न कोई अपना है
न कोई पराया है
जिसके नाम से
ज़िन्दगी शुरू की थी
वो आज इक साया है
भीड़ में ढूँढने गयी थी खुद को
जो बिक गया वो मेरा साया है
छोड़ के आयी जिनको
दुनिया की खातिर
वो आज मुझसे पराया है
खुद को तन्हा छोड़ दिया मैंने
जिसकी खातिर
आज उसी को ख़फा पाया है
क्यूँ ढूंढते हों मुझे
दुनिया के बाज़ार में
मैंने कब से छोड़ दिया
इस अजनबी शहर को
जो अब मुझसे पराया है
- शिखा वर्मा "परी"

Tuesday, April 5, 2011

चक दिए फट्टे


1983 के ऐतहासिक वर्ष के बाद 2011 वर्ष एक बार फिर खेल जगत में अपने देश का परचम लहरा कर साबित किया भारत श्रेष्ठ है। भारतीय किसी भी कम नहीं हैं। विश्व विजेता भारत ने एक शानदार पारी खेलकर हमारा ह्रदय गर्व से ऊंचा कर दिया है। इन सभी खिलाडियों के खेल की दाद देनी पड़ेगी क्रिकेट के खेल के साथ भारत का सीना ऊंचा किया है इन्होने। आईये हम इन्हें बधाई दें मिलके।

२ अप्रैल २०११ के उस ऐतहासिक दिन की याद हमारे दिल से कभी नहीं मिटेगी। ये दिन हमारे ह्रदय में एकता का प्रतीक बनके रहेगा। बड़े- बड़े शहरों की बात हो या फिर गाँव और कस्बों की हर तरफ जीत का परचम लहरा रहा था, हिन्दू ,मुस्लिम, सिख, ईसाई सब आपस में मिलके भारतीय बनके एक धागे में पिरे थे। मेरा कहना है की क्या ये खेल हमारे एक होन का कारन था ? अगर हाँ तो हर दिन एक वर्ल्ड कप होना चाहिए। जिससे सब एकता के उस धागे में बंधे रहें। आईये हम मिल के भारत के भारतीय बनें और प्यार और स्वतंत्रता के उस डोर में बांध जाएँ जो हमेशा से हमारी जरुरत है। आईये कहें-

"भारत हमको जान से प्यारा है

सबसे प्यारा गुलिस्तान हमारा है"

- शिखा वर्मा "परी" , कानपुर

Friday, December 31, 2010

कह दो पापा "बहादुर बच्चे"


ये कविता मेरे पिता के लिए है जिन्होंने इस महीने की 11 तारिख को दुनिया छोड़ दी!

वो छोड़ गए अपनी यादें वो छोड़ गए अपनी बातें उनका अहसास है अब तो मेरे साथ क्यों रूठ गए हैं आप आज
इतना
कि मनाना भी अब नहीं कम आएगा
आसमान में तारा बनके क्या देख रहे हैं आप आपके बच्चे बुलाते हैं आपको
पापा
जाईये एक बार कि
हम
एक बार आपसे कह लें
अपने
दिल कि बात
आपके बिना अधूरा है जीवन माँ कि आँखें ढूंढती हें आपको जाओ पापा
फिर भले ही रूठ जाना यहाँ आके
एक
बार कह दो पापा "बहादुर बच्चे"
फिर नहीं चाहिए किसी का साथ
होगी
मुलाकात आपसे
किसी
किसी रूप में
ये
अहसास है हमको हम इंतज़ार करेंगे
उस
पल का जब तक हमारी आँखें
आपका
रास्ता ताकती रहेंगी !!

- शिखा वर्मा "परी" , कानपुर
(कवियत्री इंजीनियरिंग के दूसरे वर्ष में अध्यनरत हैं )

Monday, December 20, 2010

पापा मेरे पापा


इस मंच की कवियत्री शिखा वर्मा "परी" ने अपना ग़म साझा किया हमारे साथ, वो ग़म मैं अपने पाठकों के साथ साझा कर रहा हूँ-

"धूप सी जमी है मेरी साँसों में, कोई चाँद को बुलाये तो रात हों" मुझे नहीं मालूम था कि इतना मजबूर कर देगा मुझे मेरा जीवन कि अपने हाथों से अपने पिता कि चिता को आग दूँगी और अपनी माँ से कहूँगी कि मैं तो जश्न में गयी थी।(जिस दिन पापा हम सब को छोड़ के गए उसी दिन मम्मी को , सात दिन अस्पताल में आई .सी. यूं. चेंबर में रहने के बाद छुट्टी मिली थी, और अब तक वो अपने पूरे होशो हवाश में नहीं हैं वो दिमाग की इक बीमारी से पीड़ित हैं और डॉक्टर ने मना किया है उनको इस घटना के बारे में बताने को )
पिता को खोने का ग़म करूँ या माँ को पाने का अहसास पता नहीं ये कौन सी परीक्षा है मेरी, आज पापा की कमी महसूस होती है जब जेब से पैसे निकल के कॉलेज भाग जाया करती थी, अपने जन्मदिन पर नया लेपटोप की जिद की थी। अपना मनपसंद भोजन बनवाने का मन होता था,पापा के साथ शान से गाड़ी में घूमती थी। और पूछती थी- "ये कौन सी जगह है पापा? " पुराने गाने पापा के साथ गुनगुनाते थे, उनके "कालू" कहने पर रूठ जाया करते थे और मन ही मन हँसते थे। वाकई पिता की याद को भुला पाना पानी में आग जलने का काम है।

11 दिसंबर 2010 मैंने अपने पिता को खो दिया, उनके हाथों का साया मेरे सर से हट गया। पापा की कमी का अंदाजा कोई लगा नहीं सकता, उनका प्यार से कहना "सूतू मेरा" कैसे भूल जाऊँ ? उनकी डांट, उनका प्यार, उंसी हिम्मत, पापा की हर एक बात मुझे अपनी सांस के साथ आती है। 21 वर्ष में अपने पापा को खो दिया मैंने, ऐसा ईश्वर ने मेरे साथ क्यूं किया? इस सवाल का जवाब ढूंढ रही हूँ मैं, मुश्किल है जवाब मिलना पर फिर भी उम्मीद है कि शायद किसी न किसी दिन जवाब मिलेगा।

मैं ज़िन्दगी का साथ निभाता चला गया, हर फिक्र को धुंए में उड़ाता चला गया, बरबादियों का सोग मानना फिजूल था, बरबादियों का जश्न मनाता चला गया।

- शिखा वर्मा "परी"
( लेखिका इंजीनियरिंग के दूसरे वर्ष में अध्यनरत हैं )

17th dec 2010.

Monday, July 12, 2010

ज़िन्दगी

ज़िन्दगी तेरी गोद में हर शाम गुजरती रही
मैं ठहरी रही तू गुजरती गयी
तेरे आँचल के छाँवमें
मैं खुद को बहलाती रही
और तू
हवा बनकर मुझे सहलाती रही।

मैं तुम्हें कभी ये कह न पायी
ऐ ज़िन्दगी तेरी याद बड़ी आएगी
तू छोड़ देगी मेरा साथ जिस दिन
उस दिन मेरी रूह कांप जाएगी
तमन्ना के आँचल में
सर रखकर
मैं पूछती हूँ
ऐ ज़िन्दगी तू कब तलक तरसाएगी।

मैं तुम्हें नाराज़ करना नहीं चाहती
पर हकीकत है
की अनजाने में
तू मेरा दिल तोड़ते आयी है
ज़िन्दगी तेरी गोद में
मेरी हर शाम गुजरती आयी है।

ज़िन्दगी रुक जा
आज मेरे सपनो को चकनाचूर मत कर
तू बेवफा बनकर मेरा दिल तोड़ते आयी है
इक बार ही सही वफ़ा कर दे मेरे साथ
की मैं भी कह सकूँ सबसे
की ज़िन्दगी मेरे साथ मय रंग लाई है।

आज मैं क्या कहूँ
तुमसे ज़िन्दगी
की आज ही तुने मेरी दुनिया लुटाई है
मौत का नाम देकर
मेरे अरमानों की कश्ती दोबाई है।
- शिखा वर्मा "परी"


Monday, July 5, 2010

कुछ मुक्तक

1. दिल के रास्ते पे तस्वीर है तेरी
हर दोराहे पर मुहब्बत की जंजीर है तेरी
तुम तो मिल जाते हों हर मोड़ पर
लगता है तू मेरी मंजिल
और मैं तकदीर हूँ तेरी

2. ज़िन्दगी को हँसना सिखाया आपने
कुछ देकर जीना सिखाया आपने
मेरे दिल को पहले ही चुरा लिया
और अब कहते हैं कि
बिना दिल से प्यार को निभाया आपने

- शिखा वर्मा "परी"

Wednesday, April 28, 2010

इंजीनियरिंग का क्रेज

आजकल इंजीनियरिंग स्टुडेंट का हर जगह चर्चा है, और उनकी लाइफ स्टाइल की बात न हों तो शायद बात अधूरी है, आज हम आपको एक इंजीनियरिंग स्टुडेंट की सोच उसी की जुबानी सुनते हैं- हमारे बीच शिखा वर्मा "परी" अपना तजुर्बा बाँट रही हैं।--
hello friends !!!
i a new member in your family today is gone to tell you something about the life i am going through which is horrible, terrific, amazing, surprizing and fearful. Hey you all guested it right.i m doing B.TECH.from UPTU.
Though i was very happy in the instantaneous stage where i first stepped on the stairs of my engineering college. i was excited, thrilled happy at my first step
on the stairs but it was unfortunetly my bad luck .i believe where i was entering the doors of terror.
UPTU examinations were held on 28th may 2009 and through counseling students select a perticular college according to their own choice, the students who already had pre- experience becoz of some their family reference, their students mentality etc.but there are some students who do not know even ABC of B. TECH. step in this field and then they are excited and thrilled when they are able to get admission in B.TECH., there are certain students who take admission in B.TECH. due to donation by buying the college we can say.in educational field "quota" is the term given to the bribery which the people give to the college as a sign of admission. if we woke the people innocent parents, innocent students for the admission to B.TECH. how badly they are being cheatedeven we know that the college given the money in thousds and will not be giving the full opportunity to the students, full facilities, full comforts to the students of B.TECH. if the education system is so honest as they prove then what is the use of giving big donation to the colleges without weighing the weight of the education level or the IQ level of students. is this a right education?? if yes then definitely tell ur 5 near ones to once apply it.

- शिखा वर्मा "परी"
( writer is studying in Engineering)

Tuesday, April 6, 2010

तेरी आहट से कटती है

कहते हैं कि एक शायर किसी एक के लिए लिखना शुरू करता है। और वक़्त के साथ , संग अपने पूरी दुनिया को शरीक कर लेता है , आज एक शुरूआती दौर कि कवियत्री से रूबरू करा रहा हूँ।

तुम कुछ इस तरह से मेरी ज़िन्दगी में आये
कि हर शाम इक सुबह लगती है
हर आग शमा लगती है
मेरी दुनिया में कुछ यूँ छाये
कि ज़िन्दगी तेरे ही नाम कि लगती है
बस अब मत जाना यहाँ से
क्योंकि
मेरी हर रात तेरी आहट से कटती है...

- शिखा वर्मा "परी"