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Thursday, August 19, 2010

लम्बी लकीरें माथे पर

मित्रो वक़्त भी जो निकलने का नाम नहीं लेता, माफ़ी कहूँ तो भी शायद कम ही होगाआप सब से मुखातिब नहीं हों पाता हूँआज इक लम्बे अंतराल के बाद अपने अज़ीज़ मित्र और हमारे साथी सम्पादक दीपक चौरसिया "मशाल" साहब की इक सुन्दर रचना से रूबरू करा रहा हूँ, उम्मीद है आप जरुर पसंद करेंगेऔर हमें अपने कीमती प्रतिक्रियायों से भी नवाजेंगेवो नज़्म कुछ यूँ मुखातिब है आपसे-

डर चाहे पूरब के हों
या पश्चिम का
एक जैसे होते हैं
उनमे होता है आपस में कोई
खून का रिश्ता
तभी वो उभारते हैं
एक जैसी लम्बी लकीरें माथों पर
एक जैसा देते हैं आकार आँखों को
पप्पू, पोम, रेबेका या नाजिया की तरह
उनके नाम भले उन्हें अलग पहिचान दें

लेकिन उनका रहन-सहन, बोल-चाल
चाल-ढाल होते हैं एक से
और एक जैसा ही होता है
दिलों में उनके घर करने का तरीका
तरीका उनके रौंगटे खड़े करने का
धडकनें बढ़ाने का

उन्हें जनने वालीं परिस्थितियाँ
भले अलग हों
पर उनके चेहरे मिलते हैं बहुत

इसीलिए
डर चाहे पूरब के हों
या पश्चिम का
एक जैसे होते हैं

- दीपक चौरसिया "मशाल"

Sunday, June 6, 2010

फिल्म 'राजनीति' मेरी नज़र में--------------->>>दीपक 'मशाल




आपने इस शुक्रवार को रिलीज हुई फिल्म 'राजनीति' के बारे में वैसे कई लोगों के विचार पढ़े ही होंगे... पर फिर भी अपना नजरिया रख रहा हूँ और मेरा मानना है कि राजनीति एक ऐसी फिल्म है जिसने पहली बार मुझे अहसास कराया कि कोई ऐसी फिल्म भी बन सकती है जिसमे कोई भी नायक नहीं बस और बस सभी खलनायक हों. बेशक फिल्म को तीन चर्चित कहानी/ हक़ीक़तों के आधार पर बनाया गया कह सकते हैं पर कोई भी कहानी पूरी तरह से प्रयोग नहीं की गयी इसलिए इसे खिचड़ी कहानी कह सकते हैं..... एक ऐसी कहानी जिसे बुनने में तीन -तीन कहानियों की मदद ली गयी और फिर गच्च-पच्च करके ऐसी पटकथा बनाया गया जिसका अंत बहुत हद तक देखने वाले की समझ में आप ही आ जायेगा.. और आधी या उससे कम फिल्म देखने के बाद जहाँ फिल्म का अंत पता चलने लगे उसे मैं फिल्मकार की असफलता ही मानता हूँ.
महाभारत की कहानी में कहीं-कहीं नेहरू परिवार और ठाकरे परिवार की कहानी को एक अजब रंगत देने के लिए इस्तेमाल किया गया है. पूरी तरह से महाभारत भी नहीं कह सकते हैं क्योंकि जो कभी शकुनि लगता है वो कभी कृष्ण बन जाता है, जिसे अर्जुन बनाने का प्रयास किया वो कौरव दल भी लगता है.. यहाँ भी सूरज जो महाभारत के कर्ण से मेल खाता है सारथी या ड्राइवर के घर पलता बढ़ता है और दुर्योधन की तरह ही वीरेंदर प्रताप उसे अपने दल में शामिल करता है.. और भी कई समानताएं हैं महाभारत के साथ.. शुरू से अंत तक शकुनि की तरह चालें चलने वाले नाना पाटेकर अंत में कृष्ण का रूप धर लेते हैं और कौरव कभी पांडव लगते हैं तो कभी पांडव कौरव. हर गंदे खेल को यहाँ राजनीति का नाम दे दिया गया है. कहानी को कोई ख़ास अच्छा नहीं कह सकते लेकिन मनोज वाजपेयी के अभिनय की दृष्टि से फिल्म को महत्त्वपूर्ण कहा जा सकता है जो कि हर किरदार पर भारी पड़े हैं.
ये बात भी सही है कि नसीर साहब यदि कहीं से वापस लाये जा सकते तो कहानी और रोमांचक और नयेपन से भर जाती.. वैसे उन्होंने बहुत छोटे से रोल में भी अच्छा अभिनय ही किया है. नाना पाटेकर अपनी एक नयी सी आवाज़ के साथ थोड़ा हटकर लगे. कैटरीना, अर्जुन रामपाल, अजय देवगन ने भी अपना चरित्र बखूबी निभाया है..
फिल्म में सन्देश ढूँढने की कोशिश करने वालों को हताशा ही हाथ लगेगी सिवाय इसके कि राजनीति में सब जायज़ है... कहीं थोड़ा सा दुःख ये भी होता है कि फिल्ममेकर भी ये मान बैठे हैं कि भारत में लोकतंत्र सिर्फ नाम का है........ है यहाँ पर अभी भी राजतंत्र ही. जनता और नेता दोनों को सिर्फ और सिर्फ चुनावों के कुछ समय पूर्व ये अहसास होता है कि इस देश में लोकतंत्र चलता है. ये बात और है कि जब भी कोई बड़ा फैसला लेना होता है तो वर्ग-विशेष को ध्यान में रख यहाँ राजनीति पर लोकतंत्र का आवरण चढ़ा कर पेश किया जाता है. फिल्म देखने के बाद राजनीति के लिए मन में एक और नफरत का बीज पड़ जाता है. ये फिल्म एक विश्वास और मजबूत करती है कि आप किसी फिल्म के महज़ कुछ दृश्य देखकर ये जान सकते हैं कि ये प्रकाश झा ने बनाई है या नहीं..
संभव है कि मैं फिल्म से कुछ ज्यादा ही उम्मीदें पाल गया होऊं.. इसीलिये फिल्म एक आकर्षक और ताली बटोरू फिल्म से ज्यादा कुछ नज़र नहीं आती.. अगर आपके पास समय की कमी हो तो फिल्म को कुछ दिन इंतज़ार कर किसी चैनल पर भी देखा जा सकता है... वैसे निर्णय आपका है. :)
अरे हाँ इस हफ्ते एक और फिल्म रिलीज हुई है.. राहुल बोस की 'The Japanese Wife'.. है तो ये आर्ट फिल्म.. पर मुझे यकीन है कि अगर आप बेहतरीन कहानी, कुछ नयापन या अच्छे अभिनय को देखना चाहते हैं तो ये फिल्म आपकी उम्मीदों पर खरी उतरेगी..
दीपक 'मशाल'

Sunday, April 11, 2010

3 चुटकियाँ------->>>दीपक 'मशाल'

१-
अक्स धुंधला पड़ा है मेरा
खो सा गया हूँ मैं
जाने क्या-क्या ख्वाहिश लिए
सो सा गया हूँ मैं..
वो हर घड़ी मुझे
गैर किये जाते हैं
मोहब्बत देखे वगैर
वैर किये जाते हैं..
२-
अपनी तो आदत है समझो, तुमको चिढ़ाने की
कभी तुमको सताने की कभी तुमको हंसाने की
कहने को कह दूँ दोस्त तुमको अपनी जान से प्यारा
मगर हर रिश्ते को नाम देने की आदत है ज़माने की

3-
ऐ मेह्ज़बीं ऐसा नहीं कि हमें तुमसे प्यार नहीं
खता है वक़्त की के हमें मौका नहीं मिलता
तुम्हें पता नहीं कि दुनिया में और भी हैं ताजमहल
पर दिल से निकलने का उन्हें मौका नहीं मिलता

दीपक 'मशाल'
पिक. खुद निकाले गए

Thursday, October 15, 2009

इस बार दिवाली सूनी सी है,


इस बार दिवाली सूनी सी है,
दिल की उदासी दूनी सी है.
बेटा है परदेस में बैठा,
माँ-बाप की आँख में धूली सी है.
कितने दीप जले आँगन में,
पर अँधेरा फैला था मन में.
इकबार अगर तू आ जाता,
हलचल सी हो जाती तन में.
देखो-देखो तो ये बाती,
बुझी-बुझी सी लगती है,
कितनी चीनी पड़ी खीर में,
पर फीकी सी लगती है.
जो नयन हमारे हुए समंदर,
क्या याद तुझे ना आती होगी.
उड़के बादल की कोई टुकडी,
क्या तेरी आँख ना छाती होगी.
तारीखें अब याद कहाँ हैं,
बस ऐसे गिनते हैं दिन.
कितने दिन के गए हुए तुम,
आने में कितने हैं दिन.
दिन गिनते हैं अब तो केवल,
उल्टे अपने जीवन के.
जीते जी इकबार तू आजा,
चाहे ना आना बाद मरन के.
जाने क्यों ये ख्वाब क्यों आया,
के तू लौट के आया है.
शायद उमर का असर भी हमपे,
पागलपन सा छाया है.
सुख से रहो जहाँ भी जाओ,
धन पाओ और नाम कमाओ.
अच्छा है मर जाएँ हम,
इक नया जनम फिर पायें हम,
इतनी है बिनती भगवन से,
हम आयें तेरे बच्चे बन के
हम आयें तेरे बच्चे बन के..

- दीपक 'मशाल'

Monday, October 5, 2009

ब्लोगिंग को देश के लिए अभिशाप बनने से रोकें......

कहानी घर घर की या सास बहु का झगडा देखने के बाद जिस तरह की बातें मध्यम वर्गीय परिवारों की महिलाओं के बीच सुनने को मिलती थीं काफी कुछ वैसी ही बातें आजकल हम ब्लोगर लोग करने लगे हैं। अच्छा लिखने को कुछ रह नहीं गया इसलिए इसके-उसके लिखे में कमियां निकालते हैंतो कभी विवाद पैदा कर देते हैं ऐसी जरा सी बात पे जो की भूल जाने लायक होती है.
बीते कुछ दिनों से ब्लॉगर समाज ठीक वैसी ही हरकतें करने लगा है जैसी की न्यूज़ चैनल वाले करते हैं या किसी उत्पाद को बिकाऊ बनाने के लिए उसके विज्ञापन को बनाने वाले यानि बेसिर-पैर की बकवास, और ये सब किसलिए? सिर्फ इसलिए की किसी भी तरह टी.आर.पी. बढ़े उनके ब्लॉग की और जय राम जी की. कोई हिन्दू-मुस्लिम लड़कियों की इज्ज़त उतारने में लगा है तो कोई किसी के ब्लॉग में झांक कर अपने लिए अच्छा बुरा पाकर उस पर ही सबका ध्यान खींचने के लिए चिल्लाने लगता है, आखिर क्यों हम सब अपने उद्देश्य से भटक रहे हैं या फिर ये कहें की उद्देश्य ही गलत बना के ब्लॉग्गिंग के लिए आये हैं. सबसे दुखद तो तब लगता है की इन टिप्पणियों की माया के वशीभूत होकर के उम्रदराज़ शख्स भी ऐसी ओछी हरकत कर जाते हैं, जो लोगों को सीख देने की उम्र में पहुँच गए हैं वे स्वयं बच्चों की तरह नासमझ काम करते हैं. अगर ऐसी सस्ती और घटिया लोकप्रियता का इतना ही शौक है तो किसी क्रिकेट मैच या फुटबॉल मैच के बीच में निर्वस्त्र होके दौड़ जाइये या किसी को भरी सभा में जूते मार दीजिये. ऐसे थोड़े न होता है की आप दूसरों की लाश पे चढ़ कर या उसे बेईज्ज़त कर के अपना नाम चमकाना चाहते हैं. कोई कभी बकवास करके ब्लोग्वानी बंद करवा देता है, कोई ज्योतिष और साइंस के झगडे को ब्लॉग पे ले आता है तो कोई आर एस एस और विश्व हिन्दू परिषद् का नाम लेके टिप्पणियां बटोरता है, कोई सेक्स का नाम लेके अपना ब्लॉग चमकाता है, कोई ब्लॉग चमकाने के फंडे ही बता डालता है, कोई अपने ब्लॉग पर आये टिप्पणीकारों का परिचय या उनकी संख्या दर्शाता है तो कोई इससे भी बड़े कारनामे करता है. हिन्दू-मुस्लिमों के बीच की दरार नहीं भर सकते तो रहने दें लेकिन कम से कम उस दरार को अपने ब्लॉग को चमकाने की छोटी सी कीमत पे चौडी तो न करें, नए गोधरा के बीज तो न डालें. मेरी समझ से बाहर है की इंसानियत की बात करने वाला हिन्दू या मुस्लमान या सिख या इसाई अगर हिंसा की बात न करे तो क्या वो हिन्जडा हो जाता है? माना हिन्दुओं पे ज़ुल्म हुए, तो क्या मुसलमानों पे नहीं हुए या अगर मुसलमानों पे हुए तो क्या हिन्दुओं पे नहीं हुए, हमने सब देख लिया सब सह लिया लेकिन ये नहीं समझ पाए की ये ज़ुल्म इंसानों पे हुए, काश हम परिंदे होते तो ये बात अच्छे से समझ सकते थे. हम लोग भी उन नेताओं की तरह बकवास करने लगे हैं जो वोट के लिए अपने मजहब, माँ, बहिन को बेच देते हैं अरे भाई फर्क क्या रह गया हम में और उनमे? अरे मुझे कोई आगे आके एक ऐसा नेता बता दे जो सच्चे दिल से हिन्दू या मुस्लिम हित की बात करता हो.... आज के युग में कोई महाराज विक्रमादित्य की तरह प्रजापालक नहीं.
याद रहे की विवादस्पद बात कहके आप कुछ लोगों के बीच कुछ समय तक लोकप्रिय हो सकते हैं लेकिन एक सम्मानित बुद्धिजीवी(तथाकथित बुद्धिजीवी नहीं) समाज के बीच स्थान बनाने के लिए निरंतर सार्थक प्रयास करने होते हैं, कहते हैं की गद्दी(हथेली) पर आम नहीं जमता. इसलिए नवोदित अभिनेत्रिओं की तरह की हरकतें आपको शोभा नहीं देतीं. क्योंकि आपकी कला ही आपको लम्बे समय तक लोगों के दिल और दिमाग में जगह दिला सकती है, क्षणिक लोकप्रियता किस काम की? और वैसे भी लोग आपका सिर्फ नाम ही जान रहे हैं न, सिर्फ नाम कमाने के लिए इतनी अशोभनीय हरकतें. अल्लाह/ god / वाहेगुरु/ भगवान न करे की इन ब्लोगों पर की गयी ऐसी कोई बात किसी जाति या धर्म विशेष को इतनी बुरी लगे की फिर कोई दंगा भड़क जाये इसलिए मेरा करबद्ध निवेदन है आप सभी से की सोच समझ कर और एक जिम्मेवार नागरिक की भांति अपनी नैतिक जिम्मेवारी को स्वीकार कर, समझते हुए स्वस्थ लेख लिखें.
कहा गया है की 'उनको न सराहो जो अनैतिक तरीकों से धन या लोकप्रियता अर्जित करते हैं, उनसे बेहतर तो वो हैं जो गुमनाम जिंदगी जीते हैं, किसी का भला न सही किसी का नुक्सान तो नहीं करते'. यह कथन आज के ब्लॉग्गिंग समाज पर भी लागू होता है. क्यों भूलते है हम सभी की ये सब हम अपनी नहीं हिन्दी की खातिर और एक स्वच्छ समाज के निर्माण की खातिर कर रहे हैं.
अंत में आप सबसे यही आग्रह है की इसे भी सस्ती लोकप्रियता पाने का या कमेन्ट ओअने का प्रपंच न समझें और उचित होगा की क्रप्या मेरी बात को समझें तो लेकिन टिपण्णी न करें. टिपण्णी करना है तो कविता, कहानी, ग़ज़ल या किसी अच्छे विचार पर करें.
इसलिए कृपया टिप्पणियों की प्यास में किसी की इज्ज़त की बलि न चढाएं.....ब्लॉग्गिंग पे काला धब्बा न लगायें. ब्लोगिंग को देश के लिए अभिशाप बनने से रोकें.

-दीपक 'मशाल'

Saturday, September 19, 2009

मुक्तक

वक़्त के बदलाव संग रिश्ते भी बदलने लगे,
जहाँ को जाँ दी जिसने उसे 'माल' कहने लगे,
इक बन गई दुर्गा तो डरने लग गए उससे,
बाकी सबके साथ हरकत फिर वही करने लगे.

दीपक 'मशाल'

Wednesday, September 2, 2009

Dipak 'Mashal' ki 3 rachnayen

1-

क्या खूब पायी थी उसने अदा,
ख्वाब तोड़े कई आंधिओं की तरह.
कतरे गए कई परिंदों के पर,
सबको खेला था वो बाजियों की तरह.
हौसला नाम से रब के देता रहा,
औ फैसला कर गया काजिओं की तरह.
ख़ास बनने के ख्वाब खूब बेंचे मगर,
करके छोडा हमें हाशिओं की तरह.
साहिलों को मिलाने की जुंबिश तो थी,
खुद का साहिल न था माझिओं की तरह.
जिनको दिल से लगा 'मशाल' शायर बना,
है अब लगाता उन्हें काफिओं की तरह.
दीपक 'मशाल'

2-
धुँआ-धुँआ सा नज़र आया सब,
उसने मुझको था ठुकराया जब.
इतना बेबस के जैसे खूँ ही नहीं,
गिरे बदन को जमीं से उठाया जब.
सब अधूरा सा नज़र आया था,
चाँद कोरा सा ख्वाब लाया जब.
रंग फूलों का हो गया काफुर,
कितना फीका सा शफक छाया तब.
दीपक 'मशाल'

3-
लो यहाँ इक बार फिर, बादल कोई बरसा नहीं,
तपती जमीं का दिल यहाँ, इसबार भी हरषा नहीं.
उड़ते हुए बादल के टुकड़े, से मैंने पूछा यही,
क्या हुआ क्यों फिर से तू, इस हाल पे पिघला नहीं.
तेरी वजह से फिर कई, फांसी गले लगायेंगे,
अनाथ बच्चे भूख से, फिर पेट को दबायेंगे.
माँ जिसे कहते हैं वो, खेत बेचे जायेंगे,
मजबूरियों से तन कई, बाज़ार में आ जायेंगे.
फिर रोटियों के चोर कितने, भूखे पीटे जायेंगे,
फिर कई मासूम बचपन, पल में जवां हो जायेंगे.
दीपक 'मशाल'

महत्वपूर्ण सूचना- ब्लॉग पर आने के लिए बहुत बहुत शुक्रिया, बस जाने से पहले एक गुजारिश है साहब की- 'कुछ तो कहते जाइये जो याद आप हमको भी रहें, अच्छा नहीं तो बुरा सही पर कुछ तो लिखते जाइये। (टिप्पणी)

Tuesday, August 25, 2009

ग़ज़ल


कोई इक खूबसूरत, गुनगुनाता गीत बन जाऊँ ।
मेरी किस्मत कहाँ ऐसी, कि तेरा मीत बन जाऊँ॥

तेरे न मुस्कुराने से, यहाँ खामोश है महफ़िल।
मेरी वीरान है फितरत, मैं कैसे प्रीत बन जाऊँ।।

तेरे आने से आती है, ईद मेरी औ दीवाली।
तेरी दीवाली का मैं भी, कोई एक दीप बन जाऊँ।।

लहू-ए-जिस्म का इक-इक, क़तरा तेरा है अब।
सिर्फ इतनी रज़ा दे दे, मैं तुझपे जीत बन जाऊँ।।

नाम मेरा भी शामिल हो, जो चर्चा इश्क का आये।
जो सदियों तक जहाँ माने, मैं ऐसी रीत बन जाऊँ।।

मुझसे देखे नहीं जाते, तेरे झुलसे हुए आँसू।
मेरी फरियाद है मौला, मैं मौसम शीत बन जाऊँ।।

कहाँ जाये खफा होके, 'मशाल' तेरे आँगन से।
कोई ऐसी दवा दे दे, कि बस अतीत बन जाऊँ।।

दीपक 'मशाल'
महत्वपूर्ण सूचना- ब्लॉग पर आने के लिए बहुत बहुत शुक्रिया, बस जाने से पहले एक गुजारिश है साहब की
'कुछ तो कहते जाइये जो याद आप हमको भी रहें, अच्छा नहीं तो बुरा सही पर कुछ तो लिखते जाइये। (टिप्पणी)

Monday, August 17, 2009

दो कवितायें

मन चंचल गगन पखेरू है,
मैं किससे बाँधता किसको.
मैं क्यों इतना अधूरा हूँ,
की किससे चाह है मुझको.
वो बस हालात ऐसे थे,
कि बुरा मैं बन नहीं पाया.
मैं फ़रिश्ता हूँ नहीं पगली,
कोई समझाए तो इसको.
ज़माने की हवा है ये,
ये रूहानी नहीं साया.
मगर ताबीज़ ला दो तुम,
तसल्ली गर मिले तुमको.
उसे लम्हे डराते हैं,
कल की गम की रातों के,
है सूरज हर घड़ी देता,
ख़ुशी की रौशनी जिसको.

कि मैं तो तब भी पागल था,
कि समझा नहीं था जब
हमारे दिल कि हलचल को,
कि जब मैं पढ़ न पाया था
निगाहों की किताबों में,
हसरत-ए-मोहब्बत को,
तब तुमने ही आके तो
पागल मुझे नवाजा था.

कि मैं तो तब भी पागल था
कि जब था इश्क को समझा,
ज़माने को भुलाया फिर
मैं खुद को भी भुला बैठा,
सभी दुनिया ने मिल के तब
दीवाना पागल कह डाला.

कि मैं तो अब भी पागल हूँ,
तेरा दामन रहा थामे
मैं पूरे जोर से कसके,
मगर खोना पड़ा तुमको
बुरे हालात में फँस के,
क्या अब तो खुद को ही मैंने
पागल सच में बना डाला.
अब इक बात का इतना
ज़रा इन्साफ कर जाओ,
कि पागल कब मैं ज्यादा था?
सिर्फ इतना बता जाओ.

दीपक 'मशाल'

Friday, July 31, 2009

नज़्म


बेज़ार मैं रोती रही, वो बे-इन्तेहाँ हँसता रहा,
वक्त का हर इक कदम, राहे जुल्म पर बढ़ता रहा।
ये सोच के कि आँच से प्यार की पिघलेगा कभी,
मैं मोमदिल कहती रही, वो पत्थर बना ठगता रहा।
उसको ख़बर नहीं थी कि मैं बेखबर नहीं,
मैं अमृत समझ पीती रही, वो जब भी ज़हर देता रहा।
मैं बारहा कहती रही, ऐ सब्र मेरे सब्र कर,
वो बारहा इस सब्र कि, हद नयी गढ़ता रहा।
था कहाँ आसाँ यूँ रखना, कायम वजूद परदेस में,
पानी मुझे गंगा का लेकिन, हिम्मत बहुत देता रहा।
बन्ध कितने ढंग के, लगवा दिए उसने मगर,
'मशाल' तेरा प्रेम मुझको, हौसला देता रहा।।
दीपक 'मशाल'
चित्रांकन- दीपक 'मशाल'

Tuesday, May 5, 2009

~एक समसामयिक राजनीतिक व्यंग्य~


आज की ताज़ा खबर, आज की ताज़ा खबर... 'कसाब की दाल में नमक ज्यादा', आज की ताज़ा खबर..... .चौंकिए मत, क्या मजाक है यार, आप चौंके भी नहीं होंगे क्योंकि हमारी महान मीडिया कुछ समय बाद ऐसी खबरें बनाने लगे तो कोई बड़ी बात नहीं. आप विगत कुछ दिनों की ख़बरों पर ज़रा गौर फरमाइए, 'कसाब की रिमांड एक हफ्ते और बढ़ी', 'कसाब ने माना की वो पाकिस्तानी है', 'कसाब मेरा बेटा है-एक पाकिस्तानी का दावा', 'कसाब मेरा खोया हुआ बेटा-एक इंडियन माँ', 'जेल के अन्दर बम्ब-रोधक जेल बनेगी कसाब के लिए', 'कसाब के लिए वकील की खोज तेज़', 'अंजलि बाघमारे लडेंगी कसाब के बचाव में', 'गाँधी की आत्म-कथा पढ़ रहा है कसाब' वगैरह-वगैरह.... अरे महाराज, ये महिमामंडन क्यों? कसाब न हुआ 'ओये लकी, लकी ओये' का अभय देओल हो गया.ज़रा सोचिये की क्या गुज़रती होगी ये सब देख कर उन्नीकृष्णन, करकरे, सालसकर और कामते जैसे शहीदों पर. अरे इतनी बार नाम तो हमने देश को इस भयावह संकट से निकलने वाले इन वीरों का भी नहीं लिया. माफ़ कीजिये मैं ये सब व्यंग्य की भाषा में लिख सकता था मगर मैं उन मुख्यमंत्री जी की तरह संवेदनाहीन नहीं बन सकता जो शहीदों का सम्मान करना नहीं जानते. इतने के बावजूद शायद महामीडिया और तथाकथित सेकुलरों का तर्क हो की ' पाप से घृणा करो, पापी से नहीं', तो ठीक है उसे उसके पापों की ही सजा दे दो, नहीं हिम्मत पड़ती तो गीता पढ़ के देदो, कुरान का सही अर्थ समझ के देदो और दो, ऐसी सजा दो, ऐसी सजा दो की हर आतंक की रूह फ़ना हो जाये, काँप जाये.खैर ज्यादा बोल गया, क्योंकि इस सब के लिए इन मीडिया वालों को दोषी ठहराना भी सही नहीं है, इन बेचारों के लिए तो रोज़ी-रोटी वतन और इज्ज़त से प्यारी हो गयी है. तभी 'काली मुर्गी ने सफ़ेद अण्डे दिए' ब्रेकिंग न्यूज़ बनाते हैं और चुनावी बरसात का मौसम आते ही ये भी सत्ताधारी सरकार को पुनः बहाल करने के 'अभियान'(साजिश नहीं कह सकता, ये शब्द चुनाव आयोग को भड़का सकता है खामख्वाह मुझ पर भी रासुका लग सकती है) के तहत अघोषित, अप्रमाणित, अप्रकट किन्तु दृष्टव्य गठबंधन बना लेते हैं. चाणक्य नीति में नयी नीति एड करनी पड़ेगी ' जिसकी लाठी उसकी भैंसें' भैसें इसलिए की कई हैं जैसे की प्रेसिडेंट जी, चीफ इलेक्शन कमिश्नर जी, सी बी आई जी, मीडिया जी, न्यायाधीश जी.कमाल देखिये की ५ वर्ष तक मूक-बधिरों के लिए प्रोग्राम बने रहने के बाद हमारे अतिप्रतिभाशाली प्रधानमंत्री जी अक्षम प्रधानमंत्री का लेबल हटाने के लिए अचानक आजतक की तरह हल्ला बोल की मुद्रा में आ गए, मगर वो भी हाईकमान के इशारे पर. ऐसे लगा जैसे मालिक ने बोला हो 'टॉमी छू'. अरे महाराज दया करो हमें पीअच्.डी., ऍफ़.एन.ए.सी. डिग्रीधारक प्रोफेसर नहीं चाहिए जो घड़ी देख के क्लास लेने आयें और घड़ी देख के बिना कुछ समझाए चले जाएँ(ऐसे लोग सलाहकार ही अच्छे लगते हैं). मालिक, सचिन होना एक बात है और गैरी किर्स्टन होना दूसरी, जरूरी नहीं की अच्छा खिलाडी अच्छा कोच भी साबित हो. हमें एक लीडर चाहिए न की शोपीस. ओबामा जी कलाकार आदमी हैं, खूब मीठी मीठी बातें कहीं पी ऍम साब के बारे में, भाई इलेक्शन टाइम है, वो भी मनमोहक अदा से झूमते हुए पलट के तारीफ कर गए भाई की. इसपर मुझे संस्कृत का एक श्लोक याद आता है कि- 'उष्ट्रस्य विवाहेषु गीतं गायन्ति गर्दभः, परस्परं प्रशंस्यती अहो रूपः अहो गुणं'ज्यादा मुश्किल अर्थ नहीं है- ऊँट के विवाह में गधे जी ने गीत गया, फिर दोनों ने आपस में ही एक दुसरे के गले(आवाज़) और रूप की प्रशंसा भी कर ली. सच है जी नेता जी वेदों की ओर लौट रहे हैं.मुझे सच में नहीं पता की नेहरु-गाँधी परिवार के सबसे छोटे चश्म-ओ-चिराग ने कुछ उल्टा-पुल्टा बोला था की नहीं (क्योंकि सी.डी. नहीं देखि) मगर ये तो सच है की आरोप लगे हैं, बाकी सच्चाई चुनाव बाद ही पता चलेगी क्योंकि अभी हाईकमान ने चीफ इलेक्शन कमिश्नर की जंजीर टाइट कर रखी है. मगर श्रीमान वरुण जी, अच्छा सुन्दर, धार्मिक नाम पाया है आपने और आपके सारे परिवार ने. ज़रा सोच समझ के ही बोल लेते, जोश में होश खो दिया, इतना भावुक होने की क्या जरूरत थी. लोग अभी आपके पिताजी के सद्कर्मों को नहीं भूले हैं, माता जी पशु-पक्षी प्रेम में व्यस्त हैं, लोग उनसे भी त्रस्त हैं, आप क्यों कोढ़ में खाज कर बैठे भैये. अगर ऐसा कहना ही था तो जसपाल भट्टी साब के उल्टा-पुल्टा में एक एपीसोड बना लेते, फिर माफ़ी मांग लेते. अरे लेलेले अगर मैंने मासूम लालू के लिए नहीं लिखा तो इस महान सेकुलर का दिल टूट जायेगा और लल्ला रूठ जायेगा. खैर दद्दा आपकी तो कच्ची लोई है, जो जी में आये बोलो. वैसे भी आपकी गलती नहीं मानता मैं, चारा खा के कोई और बोलेगा भी क्या(याद रहे ये चारा है, राणा प्रताप ने भूसे की रोटियां खाई थीं वो भी अपने देश के लिए, इसलिए अपने को उस केटेगरी में मत समझना). लेकिन एक नया राज़ पता चला की चारा आपने राबड़ी को भी खिलाया है, वो तो भला हो उनकी जुबान का जिसने खुल के सब पर्दाफाश कर दिया की उनके दिमाग में जो है वो क्या खाने से हो सकता है. आहा हा, पासवान साब तो मुझे सदाशिव अमरापुरकर की याद दिला देते हैं(रियल लाइफ नहीं रील लाइफ वाले अमरापुरकर की).माननीय मुलायम जी के बारे में लिखने से तो कलम भी इन्कार करती है, वैसे भी मैं इस ब्लॉग और व्यंग्य की गरिमा नहीं गिराना चाहता.बहिन मायावती जी के लिए जरूर करबद्ध निवेदन है आप लोगों से की एक बार इस बेचारी को २-४ दिन के लिए ही सही प्रधानमंत्री बनवा दो यार. पुष्पक विमान से कुछ विदेशी दौरे मार लेगी, बाहर की धरती देख लेगी, विदेशी मेमों से कुछ फैशन टिप्स ले लेगी, देश में ५-६ हज़ार अपनी स्टेच्यू लगवा लेगी और उत्तर प्रदेश में करोड़ों के करती है यहाँ अरबों के वारे-न्यारे कर लेगी(इंटरनेशनल बर्थडे पार्टी के लिए चंदा ज्यादा चाहिए ना) और ज्यादा कुछ नहीं. फिर लल्ला कोई बड़ी समस्या जैसे ही देश के सामने आवेगी अपने आप ही भड़भड़ा के इस्तीफा दे देगी. उसकी तमन्ना पूरी कर दो यार, कम से कम सच्चाई में एक तो 'स्लमडोग मिलियेनर' बने.बहुत देर से कमेन्ट किये जा रहा हूँ भइया, अब सुनो गौर से ऐसे लिखते-पढ़ते रहने से कुछ ना होने वाला, कुछ ठानो, कुछ करो. मैंने तो सोच लिया है अगला इलेक्शन लड़ने का, आप भी डिसाइड करलो या बिना मेरा नाम बताये सुसाईड कर लो. क्योंकि अब ये ही दो आप्शन हैं. सच्चाई ये है की आज जब तक एक ऍम.पी. एक डी.ऍम. के बराबर योग्य(सिर्फ डिग्री वाला योग्य नहीं, बोलने और करने वाला योग्य) नहीं होगा तब तक देश का यूँ ही मटियामेट होता रहेगा और इस जैसे न जाने कितने व्यंग्य सामने आते रहेंगे. एक बात दिल से बताना भाईलोग की "क्या आप लोगों को ऐसा नहीं लगता की उम्मीदवारों के नाम के बाद एक आखिरी ऑप्शन इनमें से कोई नहीं का होना चाहिए और यदि ५०% से ज्यादा मतदाता उस ऑप्शन को चुनते हैं तो पुनः चुनाव हो. वो भी नए उम्मीदवारों के साथ जिससे की सभी पार्टियों को ये सन्देश जाये की अब 'अर्द्धलोकतंत्र' नहीं चलेगा, उनका उम्मीदवार नहीं चलेगा बल्कि जनता का नेता चलेगा. संविधान में संशोधन होना चाहिए कि कुछ विशेष योग्यता वाला व्यक्ति ही सांसद या विधायक पद का उम्मीदवार हो वर्ना ऐसे ही भैंसियों की पीठ से उतर के लोग देश कि रेल ढकेलते रहेंगे."अरे जागो ग्राहक जागो, अब और घटिया माल मत खरीदो. एक नई क्रांति का सूत्रपात करो.
दीपक 'मशाल'

Sunday, April 26, 2009

एक लघु कथा का अंत


तथाकथित कलमकारों के हाथों नवोदित कवि और लेखकों की साहित्यिक हत्या या उन्हें साहित्यिक आत्महत्या करने पर मजबूर करने की साजिशों पे एक चोट है दीपक 'मशाल' की ये लघुकथा-

<एक लघु कथा का अंत>" डा. विद्या क्या बेमिसाल रचना लिखी है आपने! सच पूछिए तो मैंने आजतक ऐसी संवेदनशील कविता नहीं सुनी", "अरे शुक्ला जी आप सुनेंगे कैसे? ऐसी रचनाएँ तो सालों में, हजारों रचनाओं में से एक निकल के आती है। मेरी तो आँख भर आई" "ये ऐसी वैसी नहीं बल्कि आपको सुभद्रा कुमारी चौहान और महादेवी वर्मा जी की श्रेणी में पहुँचाने वाली कृति है विद्या जी, है की नहीं भटनागर साब?"एक के बाद एक लेखनजगत के मूर्धन्य विद्वानों के मुखारबिंद से निकले ये शब्द जैसे-जैसे डा.विद्या वार्ष्णेय के कानों में पड़ रहे थे वैसे-वैसे उनके ह्रदय की वेदना बढ़ती जा रही थी। लगता था मानो कोई पिघला हुआ शीशा कानों में डाल रहा हो। अपनी तारीफों के बंधते पुलों को पीछे छोड़ उस कवि-गोष्ठी की अध्यक्षा विद्या अतीत के गलियारों में वापस लौटती दो वर्ष पूर्व उसी स्थान पर आयोजित एक अन्य कवि-गोष्ठी में पहुँच जाती है, जब वह सिर्फ विद्या थी बेसिक शिक्षा अधिकारी डॉ.विद्या नहीं. हाँ अलबत्ता एक रसायन विज्ञान की शोधार्थी जरूर थी। शायद इतने ही लोग जमा थे उस गोष्ठी में भी, सब वही चेहरे, वही मौसम, वही माहौल। सभी तथाकथित कवि एक के बाद एक करके अपनी-अपनी नवीनतम स्वरचित कविता, ग़ज़ल, गीत आदि सुना रहे थे। अधिकांश लेखनियाँ शहर के मशहूर डॉक्टर, प्रोफेसर, वकील, इंजीनियर और प्रिंसिपल आदि की थीं। देखने लायक या ये कहें की हँसने लायक बात ये थी की हर कलम की कृति को कविता के अनुरूप न मिलकर रचनाकार के ओहदे के अनुरूप दाद या सराहना मिल रही थी। इक्का दुक्का ऐसे भी थे जो औरों से बेहतर लिखते तो थे लेकिन पदविहीन या सम्मानजनक पेशे से न जुड़े होने की वजह से आयाराम-गयाराम की तरह अनदेखे ही रहते।

गोष्ठी प्रगति पे थी, समीक्षाओं के बीच-बीच में ठहाके सुनाई पड़ते तो कभी बिस्कुट की कुरकुराहट या चाय की चुस्कियों की आवाजें। शायद उम्र में सबसे छोटी होने के कारण विद्या को अपनी बारी आने तक लम्बा इन्तेज़ार करना पड़ा। सबसे आखिर में लेकिन अध्यक्ष महोदय, जो कि एक प्रशासनिक अधिकारी थे, से पहले विद्या को काव्यपाठ का अवसर अहसान कि तरह दिया गया। 'पुरुषप्रधान समाज में एक नारी का काव्यपाठ वो भी एक २२-२३ साल की अबोध लड़की का, इसका हमसे क्या मुकाबला?' कई बुद्धिजीवियों की त्योरियां खामोशी से ये सवाल कर रहीं थीं।

वैसे तो विद्या बचपन से ही कविता, कहानियां, व्यंग्य आदि लिखती आ रही थी लेकिन उसे यही एक दुःख था की कई बार गोष्ठियों में काव्यपाठ करके भी वह उन लोगों के बीच कोई विशेष स्थान नहीं अर्जित कर पाई थी। फिर भी 'बीती को बिसारिये' सोच विद्या ने एक ऐसी कविता पढ़नी प्रारंभ की जिसको सुनकर उसके दोस्तों और सहपाठियों ने उसे पलकों पे बिठा लिया था और उस कविता ने सभी के दिलों और होंठों पे कब्ज़ा कर लिया था। फिर भी देखना बाकी था की उस कृति को विद्वान साहित्यकारों और आलोचकों की प्रशंसा का ठप्पा मिलता है या नहीं। तेजी से धड़कते दिल को काबू में करते हुए, अपने सुमधुर कन्ठ से आधी कविता सुना चुकने के बाद विद्या ने अचानक महसूस किया की 'ये क्या कविता की जान समझी जाने वाली अतिसंवेदनशील पंक्तियों पे भी ना आह, ना वाह और ना ही कोई प्रतिक्रिया!' फिर भी हौसला बुलंद रखते हुए उसने बिना सुर-लय-ताल बिगड़े कविता को समाप्ति तक पहुँचाया। परन्तु तब भी ना ताली, ना तारीफ़, ना सराहना और ना ही सलाह, क्या ऐसी संवेदनाशील रचना भी किसी का ध्यान ना आकृष्ट कर सकी? तभी अध्यक्ष जी ने बोला "अभी सुधार की बहुत आवश्यकता है, प्रयास करती रहो।" मायूस विद्या को लगा की इसबार भी उससे चूक हुई है। अपने विचलित मन को सम्हालते हुए वो अध्यक्ष महोदय की कविता सुनने लगी। एक ऐसी कविता जिसके ना सर का पता ना पैर का, ना भाव का और ना ही अर्थ का, या यूँ कहें की इससे बेहतर तो दर्जा पांच का छात्र लिख ले। लेकिन अचम्भा ये की ऐसी कोई पंक्ति नहीं जिसपे तारीफ ना हुई हो, ऐसा कोई मुख नहीं जिसने तारीफ ना की हो और तो और समाप्त होने पे तालियों की गड़गडाहट थामे ना थमती। साहित्यजगत की उस सच्ची आराधक का आहत मन पूछ बैठा 'क्या यहाँ भी राजनीति? क्या यहाँ भी सरस्वती की हार? ऐसे ही तथाकथित साहित्यिक मठाधीशों के कारण हर रोज ना जाने कितने योग्य उदीयमान रचनाकारों को साहित्यिक आत्महत्या करनी पड़ती होगी और वहीँ विभिन्न पदों को सुशोभित करने वालों की नज़रंदाज़ करने योग्य रचनाएँ भी पुरस्कृत होती हैं।' उस दिन विद्या ने ठान लिया की अब वह भी सम्मानजनक पद हासिल करने के बाद ही उस गोष्ठी में वापस आयेगी।

वापस वर्तमान में लौट चुकी डॉ। विद्या के चेहरे पर ख़ुशी नहीं दुःख था की जिस कविता को दो वर्ष पूर्व ध्यान देने योग्य भी नहीं समझा गया आज वही कविता उसके पद के साथ अतिविशिष्ट हो चुकी है। अंत में सारे घटनाक्रम को सबको स्मरण कराने के बाद ऐसे छद्म साहित्यजगत को दूर से ही प्रणाम कर विद्या ने उसमें पुनः प्रवेश ना करने की घोषणा कर दी। अब उसे रोकता भी कौन, सभी कवि व आलोचकगण तो सच्चाई के आईने में खुद को नंगा पाकर जमीन फटने का इन्तेज़ार कर रहे थे।

दीपक 'मशाल'

Saturday, March 28, 2009

लजा गई अब लाज यहाँ

हय लजा गई अब लाज यहाँ
है हर मस्तक शर्मसार यहाँ,
बेटी को ख़तरा बाबुल से
प्रभु कर भी दो विध्वंश जहाँ।

जो नर्क यही दिखलाना था
अच्छा था कोख में मर जाना,
सब देह में सिमट गए बंधन
बस रिश्ता नर-नारी ही जाना।
जो घात करे अपने खूँ पे
उसको दुर्गा का सम्मान कहाँ?
प्रभु कर भी दो.......

हम भूल गए गौहरबानों?
या कथा शिवा की याद नहीं
क्या गोरा-बादल की तलवारें
मर्यादा कुल की याद नहीं?
फटती है छाती गंगा की
रोती है भरत की रूह यहाँ।
प्रभु कर भी दो.............

शिव-रूप पे लगे कलंकों को
कुचल-कुचल के नाश करो,
नापाक हुई इस धरती को
खल-रक्त से फ़िर से साफ़ करो।
जो हुआ विश्व-गुरु अपराधी,
आएंगे फिर ना राम यहाँ।
प्रभु कर भी दो..............

अब तो चेतो।

- दीपक चौरसिया "मशाल"

Monday, March 9, 2009

फिर बापू भी खुश होते

5 मार्च को बड़ी मेहनत और मशक्कत के बाद राष्ट्रपिता बापू का ऐनक, घडी , विजय माल्या की मदद से , 9 करोड़ में ,प्राप्त करने में हम सफल हो गए . काश हमने ये 9 करोड़, बापू के दीनों , प्यारों पर खर्च किये होते तो बापू भी खुश होते. हम भारतीयों की खुशखबरी की खबर पर दीपक चौरसिया "मशाल" की कविता आपके समक्ष रख रहा हूँ -

और हम बहुत खुश हैं
की अब फिर से
वो सब हिन्दोस्तान की अमानत हैं,
एक ऐनक,
एक घडी,
और कुछ भूला बिसरा सामान।
हमें प्यार है,
हमें प्यार है इन सामानों से
क्योंकि ,
ये बापू की दिनचर्या का हिस्सा थे।
पर ऐसा करने से पहले,
दिल में बैठे बापू से
एक मशविरा जो कर लेते
तो बापू भी खुश होते।

ये वो ऐनक है जिससे,
बापू सब साफ़ देखते थे।
पर हम नहीं देख सकते साफ़ इससे भी
इससे हमें दिखेंगे
मगर दिखेंगे हिंदू , दिखेंगे मुसलमान,
दिखेंगे सवर्ण, दिखेंगे हरिजन ,
दिखेगी औरत, दिखेगा मर्द,
दिखेगा अमीर, दिखेगा गरीब,
दिखेगा देशी और विदेशी।
मगर शायद बापू इसी ऐनक से
इन्सान देखते थे
और बापू के आदर्शों कि बोली
इक पैसा भी लगा पाते,
तो बापू भी खुश होते।

हम ले आये वो घड़ी
जिसमे समय देखते थे बापू,
शायद अभी भी दिखें उसमें
बारह, तीन छः और नौ,
हम देखते हैं सिर्फ आंकडे
पर क्या
बापू यही देखते थे?
या .......
वो देखते थे बचा समय
बुरे समय का,
और कितना है समय
आने में अच्छा समय.
वो चाहते थे बताना
चलना साथ समय के,
पर जो हम बापू के उपदेशों कि घडियां
इक पैसे में भी पा लेते,
तो बापू भी खुश होते।

जिसने दीनों कि खातिर,
इक पट ओढ़
बिता दिया जीवन,
उसके सामानों कि गठरी
हम नौ करोड़ में ले आये,
और हम बहुत खुश हैं.
जो उस नौ करोड़ से मिल जाती रोटी,
बापू के दीनों, प्यारों को
तो बापू भी खुश होते,
जो बापू के सामानों से ज्यादा
करते बापू से प्यार,
सच्चाई कि राह स्वीकार
तो बापू भी खुश होते
अभी हम हैं
फिर बापू भी खुश होते॥

- दीपक चौरसिया "मशाल"

Sunday, March 1, 2009

खूंखार हुए कौरव के शर

रदीफ़- काफिया को सँवारने वाले शायर की वीर रस की कविता को देखें -

खूंखार हुए कौरव के शर,
गाण्डीव तेरा क्यों हल्का है?
अर्जुन रण रस्ता देख रहा,
विश्राम नहीं इक पल का है।

तमतमा उठो सूरज से तुम,
खलबली खलों में कर दो तुम,
विध्वंस रचा जिसने जग का,
उसको आतंक से भर दो तुम.
ये दुनिया जिससे कांप रही,
उसको आज कंपा दो तुम.
कि हदें हदों की ख़त्म हुईं,
तुम देखो धैर्य भी छलका है। खूंखार हुए कौरव के शर, गाण्डीव तेरा क्यों॥

क्षण भर भी जो तुम ठहर गए,
ये धरा मृत्यु न पा जाये,
बारूद यहाँ शैतानों का,
मानव जीवन न खा जाये.
अमृत देवों के हिस्से का,
दैत्यराज न पा जाये,
पीड़ा ह्रदय की असाध्य हुई,
आँसू हर नेत्र से ढुलका है। खूंखार हुए कौरव के शर, गाण्डीव तेरा क्यों.....

क्यों खड़े अभी तक ठगे हुए,
अब कान्हा कोई न आयेगा,
थामो अश्वों की बागडोर,
ना ध्वजरक्षक ही आयेगा.
तुम स्वयं पूर्ण हो गए पार्थ,
अब गीता न कोई सुनाएगा,
जो ज्वालामुख ये दहक उठे तुम,
स्वर्णिम भारत फिर कल का है। खूंखार हुए कौरव के शर, गाण्डीव तेरा क्यों.....

- दीपक चौरसिया 'मशाल'

Saturday, February 14, 2009

खामोश पलकें

प्रेम दिवस पर ,बेलफास्ट से दीपक चौरसिया "मशाल" की खामोश पलकें की बानगी देखें -

नाम लिख लिख के तेरा मिटा देता हूँ,
खुद का चेहरा ही खुद से छिपा लेता हूँ।
देख ले न कोई तुझको इन आँखों में,
इसलिए सबसे नज़रें बचा लेता हूँ।
बेवफा तुझको कहना मुनासिब नहीं,
कब्र अपनी वफ़ा की सजा लेता हूँ॥
क्या मुक़द्दर है क्या है मेरे हाथ में,
लेके खंज़र लकीरें बना लेता हूँ।
पूछता है कोई जब तेरे बारे में,
होके खामोश पलकें गिरा देता हूँ।

दीपक चौरसिया 'मशाल'