Saturday, June 13, 2009

मुझसे पूँछेगा खुदा


मुझसे पूँछेगा खुदा,

क्या किया तुमने

जमीं पे जाके,

आदमी का तन पाके।

मैं तुझमे ढूंढता रहा

जगह अपनी,

और तू खुश था,

मुझे पत्थरों में ठहरा के।

अपनी सिसकियों के शोरों में,

आह औरों की

ना सुन पाए,

सपने बुने तो सतरंगी मगर,

अपने लिए ही बुन पाए।

जो लिया सबसे

तुम्हे याद नहीं

और देके थोड़े का हिसाब,

भूल नहीं पाए।

क्या करुँ मैं

बना के वो इन्सां,

काम इन्सां के जो,

कर नहीं पाए।

मैंने चाहा था,

तुम लिखो नसीब दुनिया का,

तुम रहे बैठे,

दोष अपने नसीब को लगा के।

याद मुझको तो किया,

किया मगर घबरा के।

बाँट के मुझको कई नामों में,

लौट आये हो ज़हर फैला के।


दीपक 'मशाल'

3 comments:

  1. जो लिया सबसे
    तुम्हे याद नहीं
    और देके थोड़े का हिसाब,
    भूल नहीं पाए।

    सुन्दर कविता
    वीनस केसरी

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  2. Dipak 'Mashal'June 14, 2009 at 11:26 PM

    thanks for appreciation. this is the first comment that has come after a long time on this site. many many thanks.

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  3. इसका सकारात्मक अर्थ तो यही है कि यह मनुश्य के लिये चेतावनी की कविता है कि अगर दुनिया मे जन्म लिया है तो कुछ अच्छे काम कर वरना.. ।

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