Thursday, June 18, 2009

इक तवक्को

ये शाम के धुंधलके
और मुहब्बत के साये
हलकी- हलकी गहराती
ये खुबसूरत रात

छत की मुंडेर पे बैठी
मुहब्बत से लबरेज
वो मासूम सी
दुपट्टे को उमेठ्ती लड़की

सीने में इक खलिश लिए
आंखों में इक गहरा इंतजार
होठों पे बेवजह मुस्कराहट
ज़िन्दगी ने करवट बदली
यादों का दिया मचलने लगा

घर की दहलीज , सफर के रास्ते
ट्रेन की धडधड , फेरी
वालों की आवाजें
और किले की दीवारें
ना जाने कब पहुँच गई वो यहाँ

ख़ुद उसको ख़बर नहीं
वो मायूस शाम
रात की शुआओं में तब्दील हो गयी

और आँखें अब भी मुन्तजिर
इस तवक्को पे टिकी हुई
आरिज पे ढलके आंसुओं को
आएगा महबूब हथेली से समेटने ।

- मुहम्मद शाहिद मंसूरी "अजनबी"

6 comments:

  1. शाहिद साहब,
    माशा अल्लाह
    क्या खूब लफ्जों का ताना बाना बुना है. एक ऐसी नज़्म जो मुहब्बत के खुबसूरत अहसास को समेटे हुए है. एक लड़की की सोच को बखूबी उकेरा है.

    रुबीना फातिमा "रोजी"

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  2. ये अल्फाज़ की गिरहें तू कैसे बुन लेता है .......
    जो बात मचलती है दिल में तू सुन लेता है .......


    लाजवाब .....खुबसूरत कृति .......

    मेरे अल्फाज़ कम पड़ रहे है कुछ कहने में .....

    ALOK UPADHYAY

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  3. itane achchhe bhaw hai ki mahahboob awashya aayegaa .......hatheli se sametane.......bahut khub

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  4. अपने जज्बातों को आपने लफजों में बखूबी पिरोया है।
    -Zakir Ali ‘Rajnish’
    { Secretary-TSALIIM & SBAI }

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  5. शब्द नहीं हैं मगर कहना तो पडेगा ही बहुत ही खूबसूरत लाजवाब रचना है
    और आँखें अब भी मुन्तजिर
    इस तवक्को पे टिकी हुई
    आरिज पे ढलके आंसुओं को
    आएगा महबूब हथेली से समेटने ।
    बहुत बडिया बधाई

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