Thursday, October 15, 2009

इस बार दिवाली सूनी सी है,


इस बार दिवाली सूनी सी है,
दिल की उदासी दूनी सी है.
बेटा है परदेस में बैठा,
माँ-बाप की आँख में धूली सी है.
कितने दीप जले आँगन में,
पर अँधेरा फैला था मन में.
इकबार अगर तू आ जाता,
हलचल सी हो जाती तन में.
देखो-देखो तो ये बाती,
बुझी-बुझी सी लगती है,
कितनी चीनी पड़ी खीर में,
पर फीकी सी लगती है.
जो नयन हमारे हुए समंदर,
क्या याद तुझे ना आती होगी.
उड़के बादल की कोई टुकडी,
क्या तेरी आँख ना छाती होगी.
तारीखें अब याद कहाँ हैं,
बस ऐसे गिनते हैं दिन.
कितने दिन के गए हुए तुम,
आने में कितने हैं दिन.
दिन गिनते हैं अब तो केवल,
उल्टे अपने जीवन के.
जीते जी इकबार तू आजा,
चाहे ना आना बाद मरन के.
जाने क्यों ये ख्वाब क्यों आया,
के तू लौट के आया है.
शायद उमर का असर भी हमपे,
पागलपन सा छाया है.
सुख से रहो जहाँ भी जाओ,
धन पाओ और नाम कमाओ.
अच्छा है मर जाएँ हम,
इक नया जनम फिर पायें हम,
इतनी है बिनती भगवन से,
हम आयें तेरे बच्चे बन के
हम आयें तेरे बच्चे बन के..

- दीपक 'मशाल'

8 comments:

  1. Mahendra 'Manishi'October 16, 2009 at 1:03 AM

    sach me aankh me aansoo la diye aapne..

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  2. यही जीवन का आधुनिक सत्‍य है। जब से हम केरियर ओरियेण्‍टेट हुए है अर्थात व्‍यक्तिवादी चिंतन से प्रभावित हुए हैं तभी से परिवार समाप्‍त प्राय: हैं। अब तो सभी को अकेले रहना है। बहुत ही श्रेष्‍ठ कविता, मन को छूने वाली, अपने से शब्‍दों वाली। बधाई।

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  3. बहुत सुंदर भावः शुरू कि पंक्तिया पढ़कर लगा ये तो अकेले रहने वालो कि व्यथा है ,जो साथ में रहते है उनकी व्यथा भी कुछ अलग नही है
    ,किन्तु इन पंक्तियों ने सारा अर्थ समझा दिया पूजनीयो का दर्द |
    इतनी है बिनती भगवन से,
    हम आयें तेरे बच्चे बन के
    हम आयें तेरे बच्चे बन के..

    बहुत सुंदर संस्मरण
    कहा भी है
    तोरा मन दर्पण कहलाये ,|फिर चाहे आगे मिरर हो या पीछे या साइड में |सुंदर भावः |
    एक नन्हा दिया अपने आप को जलाकर अमावस कि रात को प्रकाशवान करता है |
    आपको और पूरे परिवार को
    दीपावली मंगलमय हो |
    शुभकामनाये बधाई

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  4. kuch panktiya smmerji ki post par tippni ki aa gai hai krpya maf kre .badhai aapke liye bhi hai

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  6. aaj bahut salon baad khoob ji bhar ke foot foot ke roya main, ghar pe phone laga ke mammy se baat ki aur unhe bataya ki kya maine jo is kavita me likha hai aap vaisa hi soch rahi hain?
    jawab me sirf dono taraf se rone ke swar sunai diye, sunate hue kai baar beech beech me gala bhar aaya, mahsoos hua ki ye kavita Maa sharde ne meri kalam aur mammy papa ke dil ki bhavnaon ko pakad ke likhai... jise mammy ne sweekrati bhi di..
    shayad aisa aur bhi kai mata-pitaon ke dil me ata ho.
    maaf karna tyohar ke din rulana nhin chahta tha lekin bas bhavnaon ke sailab ko rokna bhi mere bas me nahin tha.... aur salon purana ye baandh achanak fat pada.

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  7. deepak ji
    bahut hi dilko choo jaye aisi rachna likhi hai
    ansoo toh aane hi the, har maa baap ki ankhen darwaje par tiki hoti hain jinke bache unse door hote hain unke liye kya holi kya diwali. aise un bachon ki halat hoti hain jinke maa baap chor dosri duniya mein jaa chuke hote hain.

    bahut achi lagi aapki rachna mano aapne sab ke dilke jazbaaton ko zubaan de di ho.
    bahut bahut badhai

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  8. DEEPAK JI,AAPKI HRIDAY-SPARSHI RACHNA K BAARE MAIN KAHANE K LIYE SHABD NAHI HAIN,BAS ITNA HI KAHUNGA KI APNE KO RONE SE NAHI ROK SAKAAAAAAAAAAA

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