Friday, April 2, 2010

चला गया , वो तो चला गया

चला गया - चला गया
आखिर वो चला गया
एक टीस देके चला गया
एक टीस लेके चला गया
चला गया वो तो चला गया



मैं ग़ज़लों और किताबों में ही रह गया
वो इसे हकीकत का नाम देके चला गया
अब पलट कर
मैं देखता तो क्या देखता
सिर्फ धुंध थी
जो आँखों में भर के चला गया


मैं तनहा था
और तनहा ही रहा
वो वादों का बोझ देके चला गया
हम भी हारे, मुहब्बत भी हारी
मुआशरे की बंदिशें कहकर
वो चला गया


किताबें थी, किताबें हैं
और किताबें ही रहेंगी
ये ज़िन्दगी का फलसफा हे "अजनबी"
मैं भी बताने निकल गया


- मुहम्मद शाहिद मंसूरी "अजनबी"

2 comments:

  1. बहुत सुंदर रचना। शुक्रिया

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  2. ऐसा ही होता है...बढिया!

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