Saturday, March 28, 2009

लजा गई अब लाज यहाँ

हय लजा गई अब लाज यहाँ
है हर मस्तक शर्मसार यहाँ,
बेटी को ख़तरा बाबुल से
प्रभु कर भी दो विध्वंश जहाँ।

जो नर्क यही दिखलाना था
अच्छा था कोख में मर जाना,
सब देह में सिमट गए बंधन
बस रिश्ता नर-नारी ही जाना।
जो घात करे अपने खूँ पे
उसको दुर्गा का सम्मान कहाँ?
प्रभु कर भी दो.......

हम भूल गए गौहरबानों?
या कथा शिवा की याद नहीं
क्या गोरा-बादल की तलवारें
मर्यादा कुल की याद नहीं?
फटती है छाती गंगा की
रोती है भरत की रूह यहाँ।
प्रभु कर भी दो.............

शिव-रूप पे लगे कलंकों को
कुचल-कुचल के नाश करो,
नापाक हुई इस धरती को
खल-रक्त से फ़िर से साफ़ करो।
जो हुआ विश्व-गुरु अपराधी,
आएंगे फिर ना राम यहाँ।
प्रभु कर भी दो..............

अब तो चेतो।

- दीपक चौरसिया "मशाल"

5 comments:

  1. बहुत ही अच्छा लिखा है......... आपका ये स्वर सत्य की क्रांति के साथ चल रहा है ...
    स्वागत है इस कविता का बहुत बहुत साधुवाद

    अरुण अद्भुत

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  2. Dipak'mashal'March 29, 2009 at 4:24 PM

    I would like to thank Ajnabi and Adbhut ji for their kind appreciation and encouragement but my main aim is to bring some revolutin against all the anti-social, anti-cultural and anti-national activities. I know if i cann't do much then atleast can try at my own level, hopefully i would get love and constant support of you people for completion of this motto because 'akela chana bhad nahin phod sakta'.

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  3. Bahot khub.... Ek chhupi hui sachchai ka bahut achcha varnann hai!!!

    Ajit Pandey

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  4. bahut acha ..... aisa lag raha hai ki jaise dil me dhadhakate jwale ko seedhe shabdo ka roop de diya gaya ho..
    welldone mashalji

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  5. ek dhadhkata hua shola hai ye mashal ji
    bahut sahi likha

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