Friday, August 21, 2009

बचाव


दोस्तों,
आज मैं एक दिल कि बात कहना चाहता हूँ, मेरा ख्वाब वो ख्वाब है जो शायद हर सच्चे हिन्दुस्तानी के दिल में हो, आँखों में हो और अगर नहीं है तो होना चाहिए. मैं हिंदी को एक बार फिर उस मुकाम पर पहुँचाना चाहता हूँ जिस पर उसे देखने के लिए और दूसरी भाषाओँ को अपनी गर्दन आसमान तक टेढ़ी करनी पड़े. मैं चाहता हूँ की हमारी हिंदी वहां पहुंचे की स्वर्ग में बैठे मिल्टन, चेखव, सेक्सपिअर और खलील जिब्रान इस बात पर अफ़सोस करें की उन्हें हिंदी क्यों नहीं आती थी.
इसी कड़ी में मैं एक ऐसी लेखिका की कहानी से आपका परिचय करा रहा हूँ, जिसमे वो दम-ख़म है जो हमारे इस सपने को हकीक़त में बदल सके.
जो कहानी मैं आपको सौंपने जा रहा हूँ वो एक ऐसी कहानी है जो एक तरफ आपको हंसायेगी तो रुलाएगी भी, बचपन की यादों में व माँ के प्यार में लिपेटेगी तो जीवन की उस सच्चाई से वाकिफ भी कराएगी जो आप जानते तो हैं लेकिन इतने करीब से नहीं, खून में उबाल लाएगी तो आपको अपने समाज पे कहीं न कहीं शर्म करने पे मजबूर भी करेगी, जो आपको ये बोलने पे मजबूर करेगी की प्रलय जायज है अब नवनिर्माण चाहिए. कहानी बड़ी होने की वजह से ४-५ कड़ियों में प्रकाशित होगी. आपका सहयोग अपेक्षित है.(ये कहानी पूर्व में 'हंस' पत्रिका में प्रकाशित हो चुकी है, हम लेखिका के आभारी हैं की उन्होंने हमें इस ब्लॉग पर अपनी कहानी प्रकाशित करने की अनुमति प्रदान की)

निंदिया के बाबा कहा करते थे की दुनिया में दो तरह के लोग होते हैं. एक तो वे जो पक्षियों की तरह सूरज के उगते ही उठ जाते हैं और दूसरे वे जो उल्लुओं की तरह दिन में भी सोते रहते हैं और भला उल्लुओं से क्या अपेक्षा की जा सकती है. बाबा के ताउम्र डांटने-डपटने के बावजूद वह कभी समय पर नहीं उठ पाई. बचपन से अब तक हर रात सोने से पहले वह अपने से वादा अवश्य करती है की कल से जल्दी उठेगी किंतु हर सुबह 'बस पाँच मिनट और' करते करते देर हो ही जाती है. आज सुबह भी उसकी आँख लगी ही थी की अलार्म बजने लगा. अलार्म को रोकने की चेष्टा में वह सोफे से लुड़क कर नीचे आ गिरी, रजाई, कम्बल और तकिये से जूझते हाथ में आकर भी घड़ी फिसल कर न जाने कहाँ गायब हो गई. मकानमालकिन धीरुबेन कहीं हल्ला ना मचा दें इसलिए किसी तरह अलार्म को बंद करके वह आँखे मलती, गिरती-पड़ती भागी स्नानघर की ओर. मुंह में टूथब्रश ठूंसकर उसने गर्म पानी का नल चलाया ही था कि एक नन्हा सा तिलचट्टा नाली से निकला और नहाने के टब में इधर-उधर भागने लगा, भय टपकता, भयभीत सा. निंदिया ने जल्दी से फुहारे कि तेज़ धार से उसे वापिस पानी में धकेल दिया. शायद तेज़ गर्म पानी ने उसकी जान ले ली हो या फ़िर वह नाली में बहता-बहता कहीं दूर निकल गया हो.निंदिया ने सुन रखा था कि कीडे-मकोडे बहुत सख्त जान होते हैं और तिलचट्टे तो माइक्रोवेव के ताप से भी बच निलकते हैं.

दिनभर दफ्तर में निंदिया रह रह कर यही सोचती रही कि उसे क्या आवश्यकता थी बेचारे तिलचट्टे पर इतना गर्म पानी डालने की. हालाँकि उसने जानबूझ कर ऐसा नहीं किया था. वह सदा पहले गर्म पानी का नल ही खोल्यी है क्योंकि ठंडे पानी का नल पहले खोला जाए तो पानी के तापमान को संतुलित करना कठिन हो जाता है. खैर तिलचट्टे को क्या जरूरत थी निंदिया के टब में प्रकट होने की, वो भी सुबह सुबह. सारा दिन वह घर से बाहर होती है, टब चाहे जहाँ घूमता. निंदिया ने सोचा कि यदि वह तिलचट्टा किसी ब्रिटिश कोर्ट में मुक़दमा दायर कर सकता तो निंदिया को अवश्य जेल हो जाती. हाल ही में उसने एक समाचार सुना था कि घर में घुस आए चोर को जब एक अंग्रेज़ गृहस्वामी ने गोली चलाकर घायल कर दिया तो चोर ने उसपर मुक़दमा दायर कर दिया. जज का फ़ैसला था उसे चोर को घायल नहीं करना चाहिए था. पिस्तौल दिखाकर धमकाने भर से कम चलाया जा सकता था. अंग्रेज़ के पक्ष में बहुत से लोग थे जिनका मानना था कि गृहस्वामी को इतना तो हक होना ही चाहिए कि अपने बचाव में वह चोर के साथ जैसा चाहे सुलूक करे. निंदिया को लगा कि जब मुसीबत सर पे खड़ी हो तो कोई क्या सोचेगा कि अपराधी को कितनी मात्रा में घायल किया जाए. उसने कई बॉलीवुड फिल्मों में देखा है कि नायिका पिस्तौल या चाकू थामे अपराधी को धमकती तो है पर डर के मरे हमला नहीं कर पाती. इसी बीच अपराधी उसके हाथ से पिस्तौल छीन लेता है और हो जाता है नायिका का राम नम सत्य. कितनी कोफ्त होती है उसे ऐसे दृश्य देखकर कि पूछो नहीं. किसी के घर में चोर चोर घुस आए, उसे और उसके परिवार को आतंकित करे तो भी उसे इतनी सज़ा नहीं मिलेगी जितनी कि गृहस्वामी को यहाँ एक चोर को घायल करने पर मिलती है. यह इंग्लैंड है.

हाँ ये इंग्लैंड है. सालों से निंदिया यहीं बसने के लिए हाथ-पैर मार रही है. उसके पासपोर्ट पर होम ऑफिस वालों ने ठप्पा लगा दिया है कि वह केवल अंतर्राष्ट्रीय कार्यालयों अथवा दूतावासों में ही सेवा कर सकती है. इस प्रतिबन्ध के रहते उसे कोई अच्छी नौकरी तो नहीं मिल पी, किंतु पिछले पांच वर्षों के भीतर ही वह उन कार्यालयों के सारे रहस्य अवश्य जान गई. अल्पवेतन के एवज में निंदिया जैसे लोगों को ये कार्यालय नौकरी तो अवश्य देते हैं किंतु अपेक्षित सेवाएँ नहीं देते और ना ही समय पर उनका वेतन बढाते हैं. ब्रिटिश सरकार के अधीन ना होने के कारण इनपर ना तो कोई मुक़दमा चला सकता है और ना ही इनकी कहीं शिकायत कर सकता है. जहाँ एक तरफ़ नौकरी से निकाल दिए जाने के भय से ये कर्मचारी चुप रहते हैं वहीँ दूसरी तरफ़ अधिकारीगण उनकी इस मजबूरी का नाजायज़ फ़ायदा उठाते हैं. निंदिया जैसे कई हताश लोग कीडों कि तरह रोज़ बहा दिए जाते हैं और अपने बचाव के लिए वे कुछ नहीं कर सकते. निंदिया के मामले में भी लौट के बुद्धू घर को आए वाली कहावत कहीं सिद्ध ही ना हो जाए. किस मुंह से वह घर से वापस जाए. कुछ पैसा बना के लौटने का सपना तो उसे सच होता नज़र नहीं आता और लौटी भी तो वहां कौन सी नौकरी मिल ही जायेगी. परिवार और रिश्तेदारों के ताने अलग सुनने को मिलेंगे. यहाँ जिस हल में भी है, भरपेट खाना तो मिल ही रहा है. अच्छी आबोहवा में रह रही है और सबसे बड़ी बात ये है कि घूमने फिरने कि आज़ादी है, उसे कोई जबरदस्ती शादी के लिए तो दिक् नहीं कर रहा.

निंदिया कि सहेली मेनका एक दूतावास में काम करती है. उसके साथ कार्यरत कई कर्मचारी बीस और तीस साल से उसी दूतावास में टिके हैं. दस या पन्द्रह पौंड सालाना वृद्धि के अतिरिक्त उन्हें कोई अन्य सुविधा नहीं मिलती. वेतन टैक्स रहित होने कि वजह से महीने का खर्चा बस पूरा हो जाता है. कुछ बचने का तो प्रश्न ही नहीं उठता. अच्छे खासे पढ़ेलिखे योग्य लोग एकबार यदि इस जंजाल में फंस गए तो समझिये कि चौदह वर्ष के लिए ये गए काम से. हाँ इतने ही बरस लगते हैं पासपोर्ट से ठप्पा हटने में. ठप्पा हटने के बाद वे किसी योग्य नहीं रह जाते. परिस्तिथियों से लड़ते लड़ते उनकी हिम्मत जवाब दे जाती है, आत्मविश्वास काम हो जाता है और एक ही ढर्रे पर चलने कि उन्हें आदत हो जाती है. नहीं नहीं निदिया अपने साथ एस कदापि नहीं होने देगी. उसे जल्दी ही अपने पाँव पे खड़ा होना होगा और माँ बाबा को बनकर दिखाना होगा. बात बात में जो माँ कहती रहती हैं, 'बेटा होता तो और बात थी.' उसे सिद्ध करना होगा कि वह किसी बेटे से कम नहीं.

एक ऐसी ही अंतर्राष्ट्रीय कंपनी में लिपिक कि एक स्थाई पोस्ट के लिए निंदिया ने आवेदन पत्र दिया था. सबसे अच्छा टेस्ट करने के बावजूद एक राजदूत कि बेटी सुमति सुब्रमण्यम का चयन कर लिया गया था. निंदिया कई हफ्तों तक हताश औउर उदास रही. दोस्ती का हाथ बढाते हुए एक प्रशासनिक अधिकारी कोडनानी ने कंधे उचकाकर अपनी मजबूरी जाहिर की तो निंदिया ने सोचा की चलो कुछ और ना सही तो इस दौरान हुई कोडनानी से उसकी मित्रता काम आयेगी. इन दफ्तरों में बिना जन पहिचान के कुछ नहीं होता और हुआ भी वही. चाहे तीन महीनके लिए ही सही निंदिया को जल्दी ही उसने अस्थाई लिपिक के तौर पर भरती करवा लिया किसी लोमिना डिसूजा की जगह जो मेटरनिटी लीव पर थी. जब छुट्टी समाप्त होने को आई तो कोडनानी ने लोमिना को छुट्टी बधन एकी सलाह दी जिसे उसने कृतज्ञता पूर्वक मान लिया. नवजात शिशु को भला वह कहाँ छोड़ती, 'ओपेयर' यहाँ इतनी महंगी हैं की बच्चे को किसी के पास दिनभर छोड़ने की वह सोच भी नहीं सकती थी. तीन महीनों की मोहलत और मिल गई थी निंदिया को. इसी बीच आपूर्ति विभाग में कोई लम्बी छुट्टी पर गया तो उसका स्थानांतरण वहां कर दिया गया. एक साल होते होते वह दफ्तर के सभी विभागों में घूम चुकी थी. वित्त विभाग में कहीं उसे ठौर मिला तो उसे लगा की अब उसे अवश्य स्थाई कर दिया जाएगा. हालाँकि उसकी तनख्वाह और काम हो गयी थी क्योंकि अब वह क्लर्क की पोस्ट पर थी. हर महीने मुश्किल से उसे सादे तीनसौ पौंड मिलते थे. जिसमे से वह सौ पौंड किराये के दे देती थी. सौ पौंड खाने पीने और रेल/बस के किराये आदि पर खर्च हो जाते थे. सप्ताह में तीन दिन वह आशुलिपि की कक्षा में जाती थी, जिसके लिए उसे पचास पौंड अलग से देने पड़ते थे पर उसे विश्वास था कि एक ना एक दिन उसे लिपिक की पोस्ट पर अवश्य रख लिया जाएगा. लिपिक का वेतन पचास पौंड अधिक था और एक साल में वह छै सौ पौंड जमा करके माँ बाबा को भेज कर चकित कर देना चाहती थी. एक साल में बीस हज़ार रुपये तो बाबा ने भी कभी नहीं कमाए होंगे.

शाम को जब घर लौटी तो मेज़ पर निंदिया को रूपा शाह का पत्र रखा मिला. उसकी अन्तरंग और धनि सहेली रूपा एकमात्र कड़ी थी जिससे जुड़ा था निंदिया का अतीत. ना जाने कब तक वह बस खड़ी रही पत्र को हाथों में संभाले. शायद इसबार माँ ने कुछ लिखवाया हो. किंतु माँओं की चिन्ताएं किसी और किस्म की होती होंगी क्योंकि निंदिया की चिंता औउर दुःख तो माँ ने कभी समझा ही नहीं. हालाँकि समझ के वह कर भी क्या सकती थी, पति के आगे उनकी एक ना चलती थी. लाड़ प्यार से पाली बेटी एकाएक उनकी जान पे बन आई थी. रुई के फाहे में रख कर पला था माँ ने उसे. सदी गर्मी में भी वह उसे गुनगुने पानी में नहलाती थीं की उनकी निन्नु को कहीं ठण्ड न लग जाए. पति से अनुनय विनय कर उन्होंने उसका दाखिला लेडी अर्विन स्कूल में करवाया था. बाबा कितना भुनभुनाये थे प्राइवेट स्कूल में पढ़ा के क्या बेटी से नौकरी करवानी है? पर माँ ने जब उनसे कहा की आजकल अच्छे स्कूलों में पढ़ी लिखी लड़कियों को ही अच्छ्हे घर वर मिलते हैं तो वह मान गए थे.

माँ से बारह साल बड़े थे बाबा. जहाँ माँ अपनी उम्र से छोटी दिखती वही बाबा कहीं बूढे. निंदिया ने बाबा को कभी मुस्कुराते नहीं देखा. उनका एक ढर्रा बंधा था,जिससे वह एक इंच भी इधर से उधर नहीं होते थे. नहाने और पूजा में ही उन्हें डेढ़ एक घंटा लग जाता था. माँ पूजा पथ नहीं करती थी किंतु दौड़ दौड़ कर बाबा के लिए पूजा की तयारी बड़ी मुस्तैदी से करती थीं. सुबह आठ बजे खाना खाकर घर से निकले बाबा रात के नौ बजे लौटते थे, थके और क्लांत. ओवरटाइम करके दहेज़ के लिए पैसा इकठ्ठा करने के अलावा उनका जीवन में शायद कोई उद्देश्य ना था. काश की निंदिया माँ बाबा जैसी होती. किंतु उसकी ख्वाहिशों का तो कोई ठिकाना ही ना था. इन ख्वाहिशों से उसका परिचय कराया था रूपा ने, कारों में घुमा कर, फिल्में दिखाकर, पौश भोजन्ग्रहों में खाना खिलाकर. घर वापस लौटती तो उसे लगता की किसी झोपडी में आ गई हो जहाँ वह केवल सपने भर देख सकती थी. हैरानी तो उसे टब होती जब वह रूपा को भी सपने देखते सुनती. भला उसे क्या कमी. किंतु 'कमी' भी एक अजीब चीज है, जिसकी कमी शायद सबको खलती है.

माँ बाबा दोनों की आशाओं पर पानी फ़िर गया था. घर में सुंदर और पढ़ी लिखी कन्या होने के बावजूद दो ढाई लाख से काम पर कोई राजी नहीं था. अब उन्हें लग रहा था की जो पैसा उसकी शिक्षा पर खर्च हुआ था वो दहेज़ पर काम आ सकता था. विवाह पर एक डेढ़ लाख का खर्च अलग होना था जबकि गहनों पर एक भी पैसा खर्च नहीं किया जानाथा. माँ के गहनों को साफ़ करा लिया गया था. बाबा ने समाचार पत्रों में से कोई बीस विज्ञापन चुने थे किंतु किसी एक का भी जवाब नहीं आया था.

राम राम करके मथुरा के एक अग्रवाल परिवार से रिश्ता आया था. हर सप्ताहांत भैंस सी श्रीमती अग्रवाल अपने केंचुए से गिलगिले बेटे पल्लव को लेकर उनके यहाँ आ टिकतीं. लिसलिसे प्रश्न पूछ पूछ कर उसे हैरान और परेशां करतीं, माहवारी कब हुई थी? समय पर होती है की नहीं? कालेज में कोई बॉयफ्रेंड तो नहीं है इत्यादि.अगली वर जब निंदिया को माहवारी हुई तो माताजी घर में मौजूद थीं ये देखने को की कहीं वह झूठ तो नहीं कह रही थी. उनका बस चलता तो वह पखाने में घुस कर निंदिया का निरिक्षण कर लेतीं.
( शेष अगली बार )

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