Thursday, April 29, 2010

इस तरह कहानी बन जाती

किस्मत की भूल सुधर जाती , जीने का अर्थ निकल आता
इस तरह कहानी बन जाती, कुछ तुम कहती कुछ मैं कहता।

तुम आये थे खुशियाँ लेकर, दिल बैठा सौ ग़म लेकर
तुमने हँसना सिखलाया था, इस दिल को नया जनम देकर

मैं उम्र बिता देता यूँ ही, तुम मुस्काती मैं हंस लेता।
इस तरह कहानी बन जाती, कुछ तुम कहती कुछ मैं कहता

मैं लड़ा बहुत इस दुनिया से, सह गया बहुत कडवे ठोकर
तुम साथ रहे मैं जीत गया, पर हार गया तुमको खोकर

तुम परस थे गर छू देते, मैं भी कंचन मन हों जाता
इस तरह कहानी बन जाती, कुछ तुम कहती कुछ मैं कहता

इक उम्र बिता दी है हमने, दिल मैं घुटकर, मन में घुटकर
इस तरह कहानी बन जाती, कुछ तुम कहती कुछ मैं कहता

- सुनील अमर
( लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं)

4 comments:

  1. किस्मत की भूल सुधर जाती , जीने का अर्थ निकल आता
    इस तरह कहानी बन जाती, कुछ तुम कहती कुछ मैं कहता।
    अति सुंदर !!

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  2. बढ़िया प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई.
    ढेर सारी शुभकामनायें.

    संजय कुमार
    हरियाणा
    http://sanjaybhaskar.blogspot.com

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  3. हर शब्‍द में गहराई, बहुत ही बेहतरीन प्रस्‍तुति ।

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  4. मैं लड़ा बहुत इस दुनिया से, सह गया बहुत कडवे ठोकर
    तुम साथ रहे मैं जीत गया, पर हार गया तुमको खोकर
    bahut pasand aayi theen ye lines jab kisi ne sunaayi theen. bahut achchha laga poori kavita padhkar yahan.. bahut bahut hi khoobsurat. aabhar

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