Saturday, February 14, 2009

एक शाम और ढली

सीमा गुप्ता की कविता " एक शाम और ढली "

राह पे टकटकी लगाये ..
अपने उदास आंचल मे
सिली हवा के झोकें ,
धुप मे सीके कुछ पल ,
सुरज की मद्धम पडती किरणे,
रंग बदलते नभ की लाली ,
सूनेपन का कोहरा ,
मौन की बदहवासी ,
तृष्णा की व्याकुलता,
अलसाई पडती सांसों से ..
उल्जती खीजती ,
तेरे आहट की उम्मीद ,
समेटे एक शाम और ढली ....

- सीमा गुप्ता

6 comments:

  1. इंतजार से लबरेज़ आँखों को बहुत खूब वर्णन किया है.

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  2. shahid "ajnabi" ji , मेरी इस कविता को यहाँ प्रस्तुत करने का बहुत बहुत आभार...."

    regards

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  3. congrates, it's natural gals always are able to describe 'hizra' better thn guys.
    regards n best wishes

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