Thursday, August 19, 2010

लम्बी लकीरें माथे पर

मित्रो वक़्त भी जो निकलने का नाम नहीं लेता, माफ़ी कहूँ तो भी शायद कम ही होगाआप सब से मुखातिब नहीं हों पाता हूँआज इक लम्बे अंतराल के बाद अपने अज़ीज़ मित्र और हमारे साथी सम्पादक दीपक चौरसिया "मशाल" साहब की इक सुन्दर रचना से रूबरू करा रहा हूँ, उम्मीद है आप जरुर पसंद करेंगेऔर हमें अपने कीमती प्रतिक्रियायों से भी नवाजेंगेवो नज़्म कुछ यूँ मुखातिब है आपसे-

डर चाहे पूरब के हों
या पश्चिम का
एक जैसे होते हैं
उनमे होता है आपस में कोई
खून का रिश्ता
तभी वो उभारते हैं
एक जैसी लम्बी लकीरें माथों पर
एक जैसा देते हैं आकार आँखों को
पप्पू, पोम, रेबेका या नाजिया की तरह
उनके नाम भले उन्हें अलग पहिचान दें

लेकिन उनका रहन-सहन, बोल-चाल
चाल-ढाल होते हैं एक से
और एक जैसा ही होता है
दिलों में उनके घर करने का तरीका
तरीका उनके रौंगटे खड़े करने का
धडकनें बढ़ाने का

उन्हें जनने वालीं परिस्थितियाँ
भले अलग हों
पर उनके चेहरे मिलते हैं बहुत

इसीलिए
डर चाहे पूरब के हों
या पश्चिम का
एक जैसे होते हैं

- दीपक चौरसिया "मशाल"

6 comments:

  1. कितना सच कहा……………कुछ शाश्वत सत्य होते हैं जो किसी भी देश या काल मे परिवर्तित नही होते।

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  2. गहरे अर्थ लिए कविता ..दीपक की कविताओं की यही खूबी है ..

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  3. डर चाहे पूरब के हों
    या पश्चिम का
    एक जैसे होते हैं
    sahi hai

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  4. दीपक मशाल की उम्दा रचना पढ़वाने के लिए
    आपका आभार!

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  5. बिलकुल सही कहा जी आप ने, धन्यवाद इस सुंदर कविता के लिये

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