Monday, August 20, 2012

आप सब को ईद की दिली मुबारकबाद ! साथ में ईदी के तौर पे पिछले दिनों लिखा हुआ आपके हाथों में सौंप रहा हूँ.

इसी मोड़ पे लहराता हाथ छोड़ आया था
हाथ क्या, यूं समझो ज़िन्दगी का साथ छोड़ आया था
शकले आसुओं में मुहब्बत की विरासत दे गयी
वरना कब का मैं वो शहर छोड़ आया था

अहदे वफ़ा, रंगे मुहब्बत सब छूट गए
इक दिल था शायद वहीँ छोड़ आया था

ये साँसों का सफ़र है जो दिन-ब- दिन चल रहा है
वरना खुद को तो कब का वहीं छोड़ आया था

बेवजह ढूंढती हैं नज़रें उन आँखों की नमी को
जिसे उसी दिन मैं खुदा के हवाले छोड़ आया था

- मुहम्मद शाहिद मंसूरी "अजनबी" 

2 comments:

  1. बेवजह ढूंढती हैं नज़रें उन आँखों की नमी को
    जिसे उसी दिन मैं खुदा के हवाले छोड़ आया था,,,,

    वाह!!!!!बहुत खूब लाजबाब गजल,,,,शाहिद जी,,,बधाई

    ईद मुबारक आपको,बधाई करे कबूल,
    जीवन सुखमय कटे,कभी न आवे शूल,,,,
    RECENT POST ...: जिला अनुपपुर अपना,,,

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  2. वाह, बेहद उम्दा लिखा है!

    आपको भी ईद बहुत-बहुत मुबारक हो!

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