Thursday, March 2, 2017

चल रे मन ...................

चल रे मन कहीं दूर चले
जहां सिर्फ प्यार का संसार हो
 ना सरहद का वार हो
ना मज़हब की दीवार हो ।
ना बिजली का करन्ट हो
ना काँटों का तार हो ।।
चल रे मन ..................

ना सियासी दांव हो
ना दुखो की बरसात हो ।
माँ का आँचल हो
बाप का प्यार हो ।।
चल रे मन ................

ना हिन्दू हो ना मुसलमान हो
जहाँ हर तरफ बस इंसान हो ।
आदमी से आदमी को प्यार हो
हर तरफ खुशियों के त्यौहार हो ।।
चल रे मन ...................

ना कोई ऊँच हो ना कोई नीच हो
ना कोई पंडित हो ना कोई अछूत हो ।
ना कोई स्वेत हो ना कोई श्याम हो
ना बात ,बात पे तकरार हो ।।
चल रे मन.............

बस चूल्हे की रोटी हो
और आम का आचार हो ।
दादी माँ की दुलार हो
और बूढ़ों की फटकार हो ।।
चल रे मन कहीं दूर चले
जहाँ सिर्फ प्यार का संसार हो

अवधेश सोनकर

1 comment:

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